संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 3 | जुलाई-सितंबर 2010
 
जूलाई - सितंबर, 2010
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संपादकीय

जैसा कि हम सब जानते हैं, भाषा विचारों के प्रकटीकरण का सशक्‍त साधन है। यों तो विचारों को अनेक प्रकार से प्रकट किया जा सकता है, जिनमें से सांकेतिक भाषा भी एक है, किंतु आज शब्‍द, अर्थ सहित भाषा ही मुख्‍य भाषा है। यों तो भारत में अनेक प्रांत हैं और हर एक प्रांत की भाषा भी अलग-अलग है, किंतु हिंदी हमारी राष्‍ट्रभाषा के सिंहासन पर विराजमान है।
भारतेंदुजी ने कहा है, ‘‘निज भाषा उन्‍नति अहै सब उन्‍नति को मूल।’’ हमें अपनी राष्‍ट्रभाषा को संभालना है। हम किसी भी देश में रहें, हमें दूसरे की भाषा का सम्‍मान करते हुए अपनी भाषा को सुदृढ़ बनाना है। यदि हम विदेश में रहते हैं तो हिंदी की धारा जो हमारी धरोहर है, उसे अपनी संतति में प्रवाहित करना है, तभी उसकी अक्षुण्‍णता जीवित रह सकेगी।
पाठकगण हमें हर्ष है कि हमारी यह अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका ‘विश्‍वा’ दिन-प्रतिदिन लोकप्रियतर होती जा रही है। आप सभी का सहयोग इसके कलेवर को उन्‍नत बनाता जा रहा है। हमारी हार्दिक इच्‍छा है कि हम इसमें सदा नूतनता लाते जाएँ, क्‍योंकि नूतनता ही जीवंतता का सोपान है। स्‍वयं ‘प्रसादजी’ ने भी कहा है–
‘‘पुरातनता का यह निर्मोक सहन करती न प्रकृति पल एक’
नित्‍य नूतनता का आनंद किए है परिवर्तन में टेक।’’
नूतनता सदा ही विकास का परिचायक है। नए विषय, नए रूप एवं नई उद्भावनाएँ नई चेतना प्रदान करती हैं। अधिक समृद्धि
के लिए हमारे लेखक गण यदि नए विषय से इसे संपन्‍न करें तो


इसमें चार चाँद लग सकते हैं, क्‍योंकि पुरानी अन्‍यत्र छपी रचनाएँ तो कहीं स्‍थान पा ही चुकी होती हैं। हमारा प्रयास है कि एक ओर भारत से लेखक गण अपना सहयोग दें, दूसरी ओर अमेरिका एवं अन्‍य देशों के लेखक गण अपने सद्प्रयासों से इसे समृद्ध बनाएँ।
हमारे भारतीय भाई यहाँ अपनी संस्‍कृति एवं ऐतिहासिकता की रक्षा करने में संलग्‍न हैं। यहाँ प्रायः मंदिरों अथवा घरों में भी सांस्‍कृतिक एवं आध्‍यात्‍मिक कार्यक्रम चलाए जाते हैं, ताकि हमारी संतति यहाँ पर भारतीयता का पूर्ण लाभ उठा सके और उससे सर्वथा परिचित रहे। होली, दीवाली, दुर्गापूजा, रामनवमी, श्री कृष्‍णाष्‍ट्मी, देवीजागरण आदि सभी उत्‍सवों का आयोजन यथा समय होता रहता है जिससे स्‍वयं भारतीय जन समूह एक ओर भारत एवं अपनी संस्‍कृति से जुड़ा रहकर आनंद लाभ उठाता है, साथ ही बच्‍चे भी अपनी भारतीय संस्‍कृति से अपरिचित नहीं रह पाते। यह पत्रिका समय-समय पर इन त्‍यौहारों एवं कार्यक्रमों का विवरण प्रस्‍तुत कर अपनी भारतीय संस्‍कृति एवं विचारों से न केवल भारत, अमेरिका वरन् अन्‍य देशों को भी जोड़े रखती है। इतना ही नहीं, इसमें ज्ञान विज्ञान के नए विषय एवं नई खोज एवं नई उद्भावनाओं को भी प्रस्‍तुत कर पाठक गणों को समसामयिक परिस्‍थिति से भी परिचित कराना इस पत्रिका का लक्ष्‍य है। हम सभी अपने उन साहित्‍यकारों एवं लेखकों के आभारी हैं जो अपनी रचनाएँ भेजकर इसमें चार चाँद लगाते हैं।

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