संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 25 | अंक: 4 | अक्‍तूबर - ‌दिसंबर 2009
 
अकटूबर - दिसंबर, 2009
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संपादकीय

पलक झपकते ही फिर अक्‍तूबर आ गया। अर्थात् ‘विश्‍वा’ का संपादन फिर से करना है। साथ ही समिति ने मुझे पुनः ‘विश्‍वा’ का प्रबंध संपादक नियुक्‍त किया है। विश्‍वास है, मैं इस उत्तरदायित्‍व का सफलता से वहन कर सकूँगा।
इस अंक का विषय क्‍या हो, इसके विषय में रेणुजी से चर्चा हुई। अंततः समिति के प्रमुख उद्देश्‍य–‘प्रवासी भारतीयों के मध्‍य भाषा एवं संस्‍कृति की जागृति बनाए रखना एवं भारतीय भाषाओं में निहित जीवन मूल्‍यों का प्रसार करना’ के अंतर्गत अवधी विशेषांक प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया।
अवधी का महत्त्व सुदूर देशों में रह रहे भारतवंशियों के लिए अत्‍यधिक रहा है; कारण–तुलसीकृत रामचरितमानस। भारतवंशियों के पूर्वज, जो अधिकतर कुलियों के रूप में ले जाए गए। अपनी माटी से जोड़े रखने के लिए वे अपने साथ रामचरितमानस, हनुमान चालीसा और गीता को ले गए थे। रामचरितमानस ने विश्‍व के हर कोने में बसे भारतीयों के लिए उनकी भाषा, उनके धर्म और उनकी संस्‍कृति तथा नैतिकता को जीवित रखा। अतएव इस विशेषांक की प्रथम कृति विश्‍वकवि गोस्‍वामी तुलसीदास की रामायण का एक समसामयिक अंश है। इसके साथ ही जायसी तथा अन्‍य संतों के काव्‍य की बानगी के साथ-साथ आधुनिक अवधी के कवि भारतेंदु, पढ़ीस, वंशीधर शुक्‍ल एवं रमई काका की कविताएँ हैं। अमेरिका में रह रहे अवधी रचनाकार अभिनव शुक्‍ल एवं संतोष कुमार पाल की रचनाएँ भी पाठकों के रसास्‍वादन के लिए प्रस्‍तुत हैं।
अवधी साहित्‍य एवं संस्‍कृति की झाँकी प्रस्‍तुत कर रहे हैं–समिति के संस्‍थापक डॉ. कुँवर चंद्रप्रकाश सिंह, डॉ. भगीरथ मिश्र, डॉ गणेशदत्त सारस्‍वत एवं योगेश प्रवीन के आलेख।
‘विश्‍वा’ का अगला वर्ष रजत जयंती वर्ष है। आशा और विश्‍वास है कि सुधी पाठकों के सहयोग से यह निरंतर सँवरती रहेगी, फलती-फूलती रहेगी। हाल ही में मैंने कनाडा के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डॉ. डिमिट्री किस्‍तकरु का लेख पढ़ा, जिसमें उनका संदेश था कि लोग जो अपने इतिहास एवं संस्‍कृति की उपेक्षा करते हैं, उनका भविष्‍य कतई उज्‍ज्‍वल नहीं है। इन्‍हीं उद्गारों से प्रभावित होकर हम अपने पाठकों को अपनी शाश्‍वत परंपरा का स्‍मरण कराते रहेंगे। इस शृंखला में अगले वर्षों में भोजपुरी, ब्रजभाषा आदि के विशेषांक प्रकाशित करते रहेंगे।
एक महत्त्वपूर्ण संयोग हमारे आगामी अध्‍यक्ष महाकवि गुलाब खंडेलवाल का साधना क्षेत्र अवध की भूमि रही है–प्रतापगढ़। इस अंक की सामग्री एकत्रित करने के लिए डॉ. गणेशदत्त सारस्‍वत एवं अभिनव शुक्‍ल के सहयोग के लिए आभारी हूँ।

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अवध-अवधी

अवध नाम का उल्‍लेख वेदों में नहीं मिलता है। अयोध्‍या का उल्‍लेख अथर्ववेद–10/3/31 में आया है, जिसका अर्थ वहाँ अयोध्‍या नगरी है। कुछ विद्वानों ने

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भारत-यात्रा मोहनजोदड़ो से भी प्राचीन संस्‍कृति की झलक

आप सब भी भारतवर्ष की यात्रा पर कभी तो अवश्‍य ही जाते होंगे। क्‍यों नहीं, परदेश में चाहे आप कितने ही वर्षों से रहते हों,