संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 1 | जनवरी-मार्च 2010
 
जनवरी - मार्च, 2010
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कहानी
स्‍पेस-कहानी
मानोशी चटर्जी
cmanoshi@hotmail.com
परिचयः मानोशी जी मूलतः छत्तीसगढ़ की रहनेवाली हैं। आप व्‍यवसाय से शिक्षिका हैं एवं कला में संगीतज्ञ एवं लेखिका हैं। आपको विशेषकर गजल गाने में रुचि है। आजकल कनाडा में रहती हैं। प्रस्‍तुत है आपकी एक संवेदनशील कहानी।
जन्म : १६ जनवरी, १९७६, कोरबा, छत्तीसगढ़, शिक्षा : स्नातकोत्तर रसायन व बी.एड., गायन में विशारद, निवास : केनेडा, कार्य क्षेत्र : शिक्षिका अनेक वेब पत्रिकाओं में कहानी, कविता प्रकाशित, आकाशवाणी में गज़ल गायन
एक प्रवासी लेखकों की किताब के लिए, कहानी लिखने का हुक्म पूरा करने के लिए यह कहानी लिखी गई। प्रवास की सॆटिंग में लिखी कहानी-


स्‍पेस
‘‘बड़े दुख से गुज़री हो तुम, है न ? सच बड़ा कठिन समय रहा होगा।’’ उसे नहीं चाहिए थी सहानुभूति। साइकोथेरैपी के लिए कई जगह जा चुकी थी वो। " क्या आप मेरी मदद कर सकती हैं? मुझे आगे बढ़ना है। मैं रोने नहीं आई हूँ यहाँ।" ये कहकर हर बार वापस आ गई थी वो। क्या कोई नहीं था, जो उसकी मदद कर सकता था? उसके दर्द को समझ सकता था? आज डॉ. जोंस के साथ थी अपाइंटमेंट, थेरैपी की। फिर एक बार कहानी बयान करनी होगी....
ज़ुकाम से सर भारी था। दफ़्तर नहीं जाना चाहती थी वो। मगर मार्च का महीना था। अकाऊंट क्लो‌जिंग आदि। सभी ओवरटाइम कर रहे थे। उसका छुट्टी लेना नामुमकिन था। मनोज भी कभी-कभी बचकानी हरकतें करते हैं। सारी रात जागकर ब्रिज खेलने को विवश किया था कल। रात तीन बजे सोकर फिर सुबह ६ बजे उठ जाना पड़ा था। दफ़्तर में जाकर देखा तो ४० ईमेल आए पड़े थे। अमित का भी ईमेल था, " याद है न? आज मिलना है, स्टार्बक्स में, चार बजे।" काम के बीच से निकलकर जाना मुश्किल था उसके लिए। अमित उसके बचपन का दोस्त था। इस शहर में एक वालमार्ट में अचानक ही मुलाक़ात हो गई थी उसकी। एक पल को तो दोनों हक्के-बक्के रह गए थे, मगर फिर पुरानी खिलखिलाहट गूँज उठी थी। लगता ही नहीं था कि एक अंतराल के बाद मिले हैं दोनों। उसने झट से ईमेल का जवाब दिया, " आज नहीं हो पाएगा, काम है।"
शाम को घर पहुँचकर देखा तो अमित बैठा गप्पें लड़ा रहा था, मनोज के साथ। मनोज को जानती थी वह, किसी भी मर्द दोस्त का इस तरह घर आना उन्हें पसंद नहीं होगा। मगर दोनों बड़े मज़े से बातें कर रहे थे। हैरानी-परेशानी में वह क्या कहे समझ नहीं आया था उसे। उसके जाने के बाद कहीं मनोज उसे कुछ कहें न। खाना खाकर ही टला था अमित। मनोज के सामने ही ‘तुम’ कहकर संबोधित कर रहा था वह उसे। कैसे कहे, क्या समझाए वो किसी को।
लाल रंग का स्कार्फ़, लाल लंबे स्कर्ट के साथ सुंदर लग रहा था। उद्देश्य भी पूरा हो रहा था। मनोज एक बार रशिया गए थे। तब लेकर आए थे वो स्कार्फ़। साथ में मोतियों की एक माला भी थी। उस वक़्त गुजरात के एक गाँव में पोस्टिंग थी मनोज की। नई शादी थी और उसका मन उड़ा ही करता था सारे दिन। एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में शादी के कुछ दिनों बाद ही रशिया जाना हुआ था मनोज का। वहाँ से आने के बाद मनोज ने ही तो अपने हाथों से पहनाई थी वो माला। लाल, झकझक करती, आईने के सामने खड़े होकर ख़ूब इतराई थी वह। आज स्कार्फ़ के साथ वो माला नहीं पहन पाई थी। सूना गला मगर स्कार्फ़ से ढका हुआ था। वो माला टूट गई थी। एक बूँद आँसू ढुलक पड़ा था अनजाने ही उसकी आँखों से। ऑफ़िस में फ़ोन पर अमित था," आज मिल रहे हैं वरना फिर आ धमकूँगा मैं।" " ऐसा मत करो अमित, प्लीज़।"
मारनिंग डेल पार्क। अकसर ही शाम को मुलाक़ात होती थी उसकी अमित के साथ यहाँ। दोनों देर तक बातें करते रहे थे। "ज़रा धीरज, ज़रा सा...फिर सब ठीक होगा, यकीन मानो।" मगर मैं खुश हूँ अमित, तुम मानते क्यों नहीं?" "हाँ जानता हूँ तुम खुश हो...ये भी कि कितना खुश।" आँखों में पानी लिए वो उठ पड़ी थी, और घर की ओर चल दी थी। 53A बस नंबर, घर जाने का रास्ता, उसे सबसे प्रिय था। रास्ते में एक सुनसान सड़क पड़ती थी, उसकी ज़िंदगी की तरह ही। चारों तरफ़ पेड़-पौधे, हरियाली, पर सड़क सुनसान। रोज़ उसे इस रास्ते से घर आना बहुत अच्छा लगता था। और सारे दिन की हँसी सहेजकर वह मनोज के हँसने का इंतज़ार करती थी। अब निर्भर करता था कि उस दिन मनोज किस मूड में है।
बस से उतरकर थोड़ी देर चलना पड़ता था उसे। आज घर का दरवाज़ा खुला हुआ था, जिसे देखकर हैरानी ही हुई थी उसे। ज़रा तेज़ क़दमों से चलकर वह जब अंदर पहुँची तो अचानक ही जैसे सारी दुनिया गोलमोल हो गई थी उसकी। मनोज सोफ़े पर लेटे थे और उनके मुँह से ख़ून...वह बौखला गई थी। ये कैसे हुआ। उसे पता नहीं था वह क्या करे। जल्दी से 911 को फ़ोन करके वह मनोज को जगाने लगी। 911 से फिर फ़ोन आ गया। वह फ़ोन पर ही थी कि एंबुलेंस और फ़ायर ब्रिगेड दरवाज़े पर खड़े थे। पुलिस भी धड़ल्ले से घुसी और थोड़ी ही देर में उसे पता चल गया कि मनोज अब इस दुनिया में नहीं है। शायद सीवियर स्ट्रोक की वजह से उसका देहांत हो गया था। वह नहीं जानती थी कि क्या करे। कैसे सँभाले अपने आपको। कैसे ज़िंदगी सँभाले। मनोज के बिना तो उसने ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं की थी।
शाम ढलने लगी थी। उसमें हिम्मत नहीं थी कि वो कुछ भी सोचे। घर से अभी ही भीड़ गई थी, पुलिस आदि। मनोज को अस्पताल ले जाया गया था। उसे भी जाना था। उसने जाने से पहले अमित के सेलफ़ोन पर काल किया। कॉल आंसरिंग मशीन पर गई। उसने उसे अस्पताल का ठिकाना दिया और ऐंबुलेंस में सवार हो गई, अस्पताल जाने के लिए। वो नहीं सोचना चाहती थी कुछ भी। मनोज के साथ गुज़रे ८ साल जैसे उसकी आँखों के सामने से गुज़रने लगे थे। लाल मोतियों की माला...अभी भी तो वो मोती बेडरूम के फ़र्श पर बिखरे पड़े हैं। उसने धीरे से अपना स्कार्फ़ खोला। और गले पर के नीले निशान उभर आए थे अब। अमित के जाने के बाद कल रात को मनोज ने हाथ से खींचकर उस माला को तोड़ दिया था। और फिर एक-एक मोती पिरोकर उसे उसके गले में बाँधने की कोशिश की थी, इतने प्यार से...मगर अचानक ही जैसे उस माला से उसका गला घुट रहा था... वो एक पल को डर ही गई थी। मोती फिर बिखर गए थे फ़र्श पर।
अस्पताल में अमित पहले से ही इंतज़ार कर रहा था उसका। सारी फ़ार्मेलिटी पूरी करते-करते देर हो गई थी। अमित से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती थी उसे। वो जैसे हर बात समझ जाता था उसकी। कितनी बार भी कहे कि वो ख़ुश है, अमित बार-बार कहता कि सब ठीक हो जाएगा। सारी रात तो था अमित उसके साथ और सुबह चार बजे तक ही आना हो पाया था दोनों का घर। अभी तक रोने तक का समय नहीं मिल पाया था उसे। घर पहुँचकर उसने अमित से पूछा, "चाय लोगे?" फिर धड़ाम से बैठ गई थी वो सोफ़े पर और अचानक ही जैसे सैलाब सा फूट पड़ा था। आँसू रुके नहीं रुक रहे थे। कल की सुबह मनोज के बिना होगी। ये कैसी कश्मकश है। वो जिस ज़िंदगी से कई बार छुटकारा पाना चाहती थी, जिस आदमी को कई बार उसने मरने की बद्दुआ दी थी, वह आज सचमुच न रहने पर उसका सम्हलना मुश्किल हो रहा था। अजीब मन:स्थिति से गुज़र रही थी वह। और मनोज के बग़ैर एक पल भी तो नहीं रही थी वह।
शादी के बाद मनोज के साथ वो एक गाँव में रहने गई थी गुजरात के। हमेशा ही एक छोटे से शहर में पली-बड़ी, वो गाँव के माहौल को बहुत पसंद करती थी। जैसे मन की ही चाह पूरी हो गई थी उसकी। कुछ दिन बड़े अच्छे से गुज़रे थे। वहीं के एक छोटे से स्कूल में पढ़ाने भी लगी थी। मनोज भी जल्दी आ जाते थे दफ़्तर से। और फिर दोनों निकल पड़ते थे गाँव की सैर को रोज़। मनोज को बच्चे पसंद थे। मगर कोई ३ साल बाद भी वो माँ नहीं बन पाई थी। स्कूल से आकर कभी-कभी वह रोने लगती थी। मनोज उसे दुलारते, सहलाते मगर ये भी न कहते कि बच्चे न हुए तो भी कोई बात नहीं। उस दिन को वो नहीं भूल सकती जब एक बार वो स्कूल से देरी से आई थी। मनोज ने आते ही एक चाँटा रसीद दिया था उसे। वह हक्की-बक्की रह गई थी। उसने आश्चर्य और दर्द से पूछा था, "मनोज?" मनोज ने तभी उसके पैरों पर गिरकर माफ़ी माँगी थी। "तुम मुझसे दूर चली जाती हो तो मुझे बहुत बेचैनी होती है, मैं पागल हो जाता हूँ।" उसके बाद ऐसे कितने ही दिन आए थे जब मनोज ने उस पर हाथ उठाया था। और हर बार माफ़ी माँगी थी, प्यार किया था। वो मानना चाहती थी कि मनोज उससे बहुत प्यार करता है। वो उसके बिना रह नहीं पाता। और उसने मनोज का साथ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा था। माँ के देहांत के समय भी वो भारत नहीं जा पाई थी। मनोज उसके बिना रह नहीं सकेगा, उसे पता था। छह साल बाद भी जब बच्चे नहीं हो पाए थे तो उसने सोचा था कि वो एक बच्चा गोद लेगी। और उसे याद है इस बात पर मनोज ने तीन दिन तक उससे बात नहीं की थी। अभी दो साल पहले ही तो दोनों अमेरिका आए थे। ...और वो फिर फूट-फूट कर रोने लगी। अमित के कंधे का सहारा उसे बड़ा ही अपना सा लगा था उस वक़्त।
"सुनो, आज सात बजे तैयार रहना, शाम को निर्वाण में खाना खाएँगे।" अमित को वह ना नहीं कर पाती थी। मनोज को गए हुए छह-सात महीने से ऊपर हो गए थे और अमित उसका ख़्याल रखता था। "ठीक है अमित"।
शाम के ७:३० बज गए थे। घड़ी की सूइयाँ चल रही थीं। टिक-टिक-टिक...आठ बजे अमित के आने की आहट हुई। अमित के घर में आते ही, वो उबल पड़ी थी। ऐसी तेज़ आवाज़ में बात करना अमित को पसंद नहीं था। आज वो दोनों बाहर खाना खाने जा ही नहीं पाए थे। अमित अक्सर ही ऐसे दिनों में उसके पास रुक जाया करता था। आज भी वो रोती रही थी और अमित जागता रहा था। ऐसे कई शामें गुज़री थीं कई बार। ये अमित अपना वादा निभा भी तो सकता है, वक़्त का पाबंद क्यों नहीं। दूसरे दिन उसने अमित को कहा था कि वो उसे ऑफ़िस तक छोड़ दे। आफ़िस में भी मन नहीं लगा था उसका। आज वो अमित से फिर माफ़ी माँग लेगी।
"आज टी.वी. पर मेरा फैवरिट शो है, तुम आकर पास बैठो, साथ देखते हैं।"
" हूँ।"
"अच्छा, तुम्हें क्या लगता है, आखिरी में कौन जीतेगा?"
" तुम क्या टी.वी. देखना बंद नहीं कर सकते?"
" जान, तुम पास तो हो।"
"पर मुझे कहाँ वक़्त देते हो तुम अब, जब भी आते हो टी.वी. पर ही..."
"मैं अब तुमसे बहस नहीं कर सकता...चलता हूँ, कल आऊँगा।"
वो भी मुँह बनाकर बैठी रही थी और अमित उठकर चला गया था। बात करते-करते उसने कब अमित पर मुक्कों की बरसात कर दी थी, उसे खयाल ही नहीं था। वो इतना ग़ुस्सा क्यों हो जाती है, क्या हो जाता है उसे ? ऐसी अनगिनत शामें गुज़री थीं। ओह! क्या अमित उससे प्यार नहीं करता अब ?
अगर अमित उससे प्यार करना छोड़ दे तो ? वो फिर फफककर रो पड़ी थी।
दो दिन बाद अमित का फ़ोन आया था, " कल बहरीन जा रहा हूँ, तीन साल के कण्‍ट्रैक्‍ट जॉब पर, ख़याल रखना अपना। इस बीच मेरे बग़ैर जीना सीखो। खुशी अपने में होती है, कोई और खुशी नहीं दे सकता किसी को...फिर मिलेंगे।"
वो हक्की-बक्की रह गई थी। इतिहास ने दोहराया था अपने को शायद। फ़र्क़ बस इतना था कि अमित ने जो रास्ता चुना, वो मनोज के साथ कभी नहीं कर पाई थी।
डॉ. जोंस के शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे, "स्पेस हनी, स्पेस। एंड लर्न टु लेट गो... दैट इज़ द मंत्रा।"