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अन्य
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| अवधी काव्य की बानगी |
रामचरित मानस (बालकांड) गोस्वामी तुलसीदास बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।। विधि हरि हरमय वेद प्रान सो। अगुन अनुपम गुन निधान सो।। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।। महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।। जान आदिकवि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।। सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।। हरषे हेतु हरि हर ही को। किए भूषन तिय भूषन ती को।। नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।दो.– बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। राम नाम वर बरन जुग सावन भाव मास।। 19।।आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।। सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।। कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।। बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज संघाती।। नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।। भगति सुतिय कल करन विभूषन। जग हित हेतु विमल विधु पूषन।। स्वाद तोप सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर वसुधा के।। जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।दो.– एक छत्रु एक मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुवर नाम के बरन बिराजत दोउ ।। 20।।समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।। नाम रूप दुई ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू।। देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम विहीना।। रूप विसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।। सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।दो.– राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार ।। 21।।नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। ब्रह्ममुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।। साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभूहि बिसेपि पिआरा।। चहूँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।दो.– सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।। 22।।अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।। प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की एक दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म विवेकू।। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।। व्यापकु एक ब्रह्म अविनासी। सत चेतन घन आनँद ससी।। अस प्रभु हृदयँ अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।। नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।। दो.– रगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।। 23।।राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।। नाम सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल वासा।। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी।। सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रत्रि निसि नासा।। भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।। दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।। निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।दो.– बरी गीध सुखेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।। 24।।राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।। नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न धोरा।। नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।। राजा रामु अबध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।। सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।। फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।दो.– ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।। 25।।मासपारायण, पहला विश्राम नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।। सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।। नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।। नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।। ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।। सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।। अपतु अजामिल गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। राम न सकहिं नाम गुन गाई।।दो.– नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ।। 26।।चहुँजुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव विसोका।। वेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।। ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।। कलि केबल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।। नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।। पद्मावत/मलिक मोहम्मद जायसी मैं एहि अरथ पंडितन्ह बूझा। कहा कि हम्ह किछु और न सूझा।। चौदह भुवन जो तर उपराहीं। ते सब मानुष के घट माहीं।। तन चितउर, मन राजा कीन्हा। हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा।। गुरु सुआ जेड़ पंथ देखावा। बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।। नागमती यह दुनिया धंधा। बाँचा सोइ न एहि चित बंधा।। राघव दूत सोई सैतानू। माया अलाउदीं सुलतानू।। प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु। बूझि लेहु जौ बूझै पारहु।।तुरकी, अरबी, हिंदुई, भाषा जती आहिं। जेहि महँ मारग प्रेम कर सबै सराहैं ताहि।। 1।। मुहमद कबि यह जोरि सुनावा। सुना सो पीर प्रेम कर पावा।। जोरी लाइ रकत कै लेई। गाढि प्रीति नयनन्ह जल भेई।। और मैं जानि गीत अस कीन्हा। मकु यह रहै जगत महँ चीन्हा।। कहाँ सो रतनसेन अब राजा। कहाँ सुआ अस बुधि।। कहाँ अलाउद्दीन सुलतानू। कहाँ राघव जेइ कीन्ह।। कहँ सुरूप पदमावति रानी। कोइ न रहा, जग रही कहानी।। धनि सोई जस कीरति जासू। फूल मरै पै मरै न बासू।।केइ न जगत बेंचा, कइ न लीन्ह जस मोल। जो यह पढ़ै कहानी हम्ह सँवरै दुई बोल।। 2।। मुहमद बिरिध बैस जो भई। जोबन हुत सो अवस्था गई।। बल जो गएउ कै खीन सरीरू। दीस्टि गई नैनहिं देई नीरू।। दसन गए कै पचा कपोला। बैन गए अनरुच देइ बोला।। बुधि जो गई देई हिय बोराई। गरब गएउ तरहुँत सिर नाई।। सरवन गए ऊँच जो सूना। स्याही गई सीस भा धुना।।भवँर गए केसहि देइ भूवा। जोबन गएउ जीति लेइ जूवा।। जौ लहि जीवन जोबन-साथा। पुनि सो मीचु पराए हाथा।।बिरिध जो सीस डोलावै, सीस धुनै तेहि रीस। बूढ़ी आऊ होहु तुम्ह, केइ यह दीन्ह असीस।। 3।। संत दूलनदास द्रुपदी राम कृष्ण कहि टेरी। सुनत द्वारिका तें उठि धाए जानि आपनी चेरी। रही लाज पछितात दुसासन अंबर लाग्यो ढेरी। हरि लीला अवलोकि चकित चित सकल सभा भुइ हेरी।हरि रखवार सामरथ जाके मूल अचल तेहि केरी। कबहुँ न लागति ताति बाव तेहिं फिरत सुदरसन फेरी। अब मोहिं आसा नाम सरन की सीस चरन दियो तेरी। दूलनदास के साईं जगजीवन सुनहु इतनी बिनती मेरी। संत भगवान दास हरि गुन जलधि भागवत ग्रंथा। यह प्रसिद्ध कलि कामद पंथा।। जे रसज्ञ हरि भगत सयाने। तहि बिबाद यहि सिंधु समाने।। मैं तब चरन कमल जगदीसा। तजि नहिं सकहुँ अरध छन ईसा।। तेहिं तें निज जन जानि दयाला। लेहू संग जनि तजहु कृपाला।।तब आचरन कृस्न जदु भूषन। मंगलकरन हरन सब दूषन।। परब्रह्म पर पुरुष तुम जगपति प्रकृति परेस। निज इच्छा धरि विमल बपु भए प्रगट भुवनेस।। संत भिखारीदास नैनन को तरसैए कहाँ लौं, कहाँ लौं हियौ विरहागि मैं तैए? एक घरी न कहूँ कलपैए, कहाँ लगि प्रानन को कलपैए?आवै यही अब जी में विचार, सखी चलि सौतिहुँ कै घर जैए। मान घटे तें कहा घटिहै, जु पै प्रानपियारे को देखन पैए। अँगरेजी संस्कृति पर एक व्यंग्य भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखाय नहिं देत्यौ, पढ़ाय नहिं देत्यौ, सैयाँ फिरंगिन बनाय नहिं देत्यौ। लहँगा, दुपट्टा नीक न लागै, मेमन का गौन मँगाय नहिं देत्यौ। हम न सोइबे कोठा अटरिया, नदिया व बँगला छवाय नहिं देत्यौ। सरसों का उबटन हम ना लगैबे, साबुन से देहियाँ मलाय नहिं देत्यौ। गोबर से ना लीपब पोतब, चूना से भितिया पोताय नहिं देत्यौ। बेगारी विलाप पं. प्रताप नारायण मिश्र सबको मिली स्वतंत्रता, अँगरेजन के राज। हमैं गुलामी ही बनी, परै भाग पर गाज।। सरकारी कछु काम जब, आय परत हा शोक। पकरन को दौरत हमें, तब बेगारि मां लोग।। एक एक के काम मा, बार बार गहि लेत। पाँय परत छाँड़त नहीं, मारत गारी देत।। घर बाहर के काम मा, हानि कैसहू होय। सीस पटकिबो रोहबो, हमरा सुनत न कोय।। काम लेत बरिआइ के, दाम देत अति थोर। कहाँ जायँ कैसी करैं, हमैं बिपत अति घोर।। पकरि गयेहूँ पर कबहूँ जो कछु होहिं न काम। तौ पहरन हैरान ह्वै, पावैं हम न छदाम।। यों तो हम सरकार के, सेबक बिना संदेह। होति जबरदस्ती बृथा, हम पर अनरथ एह।। होरी माँ फौरी बकत, सब कोउ बीच बजार। खेलि दिवाली माँ जुआँ, बहु तक होहिं खुबार।। मद्यपान गणिका गमन, बाल-ब्याह की रीति। बल करि रोकी जाति नहिं औरहु दुःखद कुरीत।। बस याही ते प्रकट है, प्रजाबछल सरकार। निधरक ही राखी चहति, परजहिं सबै प्रकार।। हमते तौ कछु काहु की, कबहुँ हानि ना होय। दिन भर श्रम करि पेट भरि, रहत रात को सोय।। पहुँचावहु सरकार लगि, कुत्सित दशा हमारि। कहँ लगि ऐसेहु राज माँ, भुगतैं विषम बेगारि।। हे माता बिक्टोरिया, अहो लाट महराज। सोये हमरी बैर कहँ, हाय गरीब नेवाज।। उचित मजूरी पाय के, पालहिं निज परिवार। जाते होइ मन-मुक्ति अति, बोलैं जै जै कार।। ‘हम कनउजिया बाँभन आहिन’ बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’ दुलहिनी तीनि लरिका त्यारह, सब भिच्छा भवन ते पेटु भरयिं। घर माँ मूसा डंडै प्यालयिं, हम कनउजिया बाँभन आहिन। चउथेपन चउथ बियाहे के, बिहकरा बयिठ घर का घेरे।चउथे दिन चउथो चातु चली, हम कनउजिया बाँभन आहिन। गायित्री मंत्रु ‘भूरभूसा’ जपि जपि रोजुइ चिल्लायिति है। हम कनउजिया हम कनउजिया, हम कनउजिया बाँभन आहिन। कवि सम्मेलन पं. वंशीधर शुक्ल कक्कू, हमका यहु जानि परा, कबिताइउ है झूँठ बिबाद। इनहुन माँ पूरि गुलामी है, इनहुन माँ है साम्राज्यवाद। है देसु सुधारब बड़ी दूरि, ई देहौं ना सुधारि पइहैं। औ यहै तना भुइँ घिसिल-घिसिल, कातिक कस केचुवा मरि जाइहैं। इनका ना कोई जानि सकी, कबिता कागद माँ छपी रही। इनते हमरे घाघै अच्छे, उनकी कबिता मँड़राय रही।उनकी टुटली दुइ सतरन का, हम खेत-पात माँ रटा करी। फिर चाहै जेत्ती बिपति परै, दुगुनी हिम्मत ते जुटा करी। अब आजु काल्हि साँचे बुंदा पर, झूँठा रंग चुवाय देय। बसि वहै सुकबि है महाकबी, जो रागु बेसुरा गाय लेय। सच्चाई हटिगै बड़ी दूरि, झूठी का भवा बोलबाला। अब सुकुल भाय कबि बना चहौ, तौ पिया करौ हाला-प्याला। अंधविश्वास चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ पूरन पाँडे सुखदीन सुकुल, कँधई काछी, किसनू कहार। बुद्धू बढ़ई, लल्लू लोहार, पूसू पासी झूरी चमार दुल्ला दीदी कनफटी बुवा, छंगों फू-फू कुंता बहिनी नित नेम पूरबक कथा सुनें ट्वाला परोस की बहुत जनी कनफटी बुवा तो जिद्दि किहे, हैं बोलि रहीं याकै बानी। ‘‘हम आजु चढ़इबे पोथी पर, चंदन ते पहिले यू पानी।’’ हम कहा बुवा जी मानि जाव, हमरी पोथी पर मया करौ। चंदनुइ देव खाली चढ़ाय, पानी की खातिन दया करौ। उइ कहेनि के पंडित वाह ! वाह!! हम अपनि करइबे नामूसी। का म्वाल बिकात वै पानी, जो करी यहू माँ कँजूसी यतना कहि हमारी पोथी पर, पानी गिलासु भरि नाय दिहिनि। हम तौ बसि-बसि कहत रहिगेन, उइ पानी पूर पिराय दिहिनि। गजल डॉ. ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी ‘शैलेश’ ‘हम का करीं जौ तोहके हमसे मलाल बाटै एहि एक जान खातिर, बहुतै बवाल बाटै। गरजै बहुत जे बादर, बरसै न बूँद भर ऊ केतना जवाब देबा, सौ-सौ सवाल बाटै। वोइसे बहुत मुहब्बत कै डींग भरत बाट्या मुल हमका समझ आवा, कुछ एहमा चाल बाटै। गलती छिपावै खातिर, हमका कहा बेजइहाँअँधेर कै इ करनी, केतन कमाल बाटै। तू दूर-दूर रहिके, पूछ्या न हमसे कुछुवै कइसे तू समझ गइला, सब ठीक हाल बाटै। नगरी के हर गली मा, तूती तोहार बोलै तोहरे खिलाफ बोलै, केहि कर मजाल बाटै। ‘शैलेश’ के बिना का बाटै तोहार घाटा मनइन क एहि शहर में, कहवाँ अकाल बाटै।’ गाँव की महिमा केदारनाथ त्रिवेदी ‘नवीन’ सकल प्रानिन के प्रान अधार, धरे काँधे पर जग का भार। जहाँ के मनईं बड़े उदार, करैं डगरोहिन का सतकार। खेत का धंधा आठौ जाम, करइँ ना छिनहू भर बिसराम। जहाँ नित सहैं सीत औ घाम, न तनिकौ तीन पाँच ते काम।सराहति है जेहि का संसार, गाँव की महिमा अमित अपार।। सुनैं सब मिलि भागवत पुरान, देइँ दसबरना गौसठु दान। ध्याइ मनहें मन मा भगवान, करइँ सब तीरथ बरत महान। जहाँ पर सतोगुनी ब्योहार, गाँव की महिमा अमित अपार।। जुगलजोड़ी-व्यंग्य पं. उमादत्त सारस्वत ‘दत्त’ तुम भुरजी के करछुला, उइ भुरकी रंगीन। तुम हाथी उइ मेढुकी, कस सुंदर यू नेह। छुई-मुई की उइ लता, तुम बबूर के बेंट।तुम गाँजर के तोंदपति, उइ लखनौवा नारि। उइ कालिज की ललमुही, तुम क्वैला अस स्याह। उइ पनो की राति, सनीचर अस तुम करिया। गजल डॉ. विंध्वेश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव नजरि का तीर जब कबौं जी के परा होई। न ऊ जिंदै बचा होई, न घैहल ऊ मरा होई। कही कैसे लगावा आगि को हमरे करेजे माँ, निकरि जाई जो उनका नाउँ तौ अति कै बुरा होई।चितै जी का लिह्यौ तौ चित्त वहिका चित्त कइ डारयों, कोई औरौ की आँखिन माँ, न अस जादू भरा होई। परखि देखौ तौ जनिहौ, कौनु असली, कौनु नकली है, निकसिहैं खोट, अन्नेगिन, कोई एकुइ खरा होई। गाँव की शोभा का वर्णन डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल ‘चंद्राकर’ प्रकृति के आँचर माँ लहराइ, हिया हरि लेइ गाँउ का हारु। भोरहवे बरसै राज सुहागु, सँवारा जुग जुग ते सिंगारु। किमरिया झाँकइ घूँघुट खोलि, ललरिया मुँह की चुइ चुइ जाइ।न जानी कौनु बड़ा असनेहु, पुरबिया बेंदी देई सजाइ। मोरला ब्वालै मिठुरस ब्वाल, बाग माँ कुहुकइँ म्याओं-म्याऊँ। संग माँ नाचति चलै पुछाड़ि, छुपहुले पखनन पर बलि जाऊँ। सूखे का संत्रास रामकृष्ण श्रीवास्तव ‘संतोष’ लइ गइ उड़ाइ बयरिया बदरा दानी। अब सूखन लागे धान देइ को पानी। ताकति अकास की ओर रूख मुँह बाए, कुछु तृसित जरे मुरझाने मुँह लटकाए। बिरवा बिरवा आपन बाहैं फैलावैं, जस कहा चहैं झोंकन ते राम कहानी।। छूँछी बदरी छुछुआनी अउतीं जउतीं, उइ और जरे माँ कसिकै लोनु लगउतीं। प्यासे प्रानन का को दुइ बूँद देवय्या, कइसे बुताइ भुइँ केरि पियास पुरानी।।
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