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अन्य
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| त्रिपदी |
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आपने ‘नागार्जुन के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना’ विषय पर शोध किया है! हिंदी के प्रकांड विद्वान, शोधकर्ता एवं साधक श्री व्यथित जी ने अनेक उपन्यास एवं काव्य नाटक लिखे हैं। आप हरियाणा के साहित्यकार संघ से निकट से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में भारतीय साहित्यकार संघ के अध्यक्ष हैं। आपने हिंदी में त्रिपदी एवं व्यक्ति चित्र नामक नवीन विधा का सृजन किया है। संप्रति फरीदाबाद में रहते हैं।
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भगवान कहाँ होगा देखा है नहीं मैंने पर तुम सा ही होगा।।यह सफर अकेला है कोई साथ नहीं जाता वहाँ जाना अकेला है।।एक सुंदर गहना है इसे मौत कहा जाता यह सबने पहना है।।यह जन्म का नाता है इसे मौत कहा जाता यह लिखकर आता है।।ईश्वर की माया है हम खोये रहें इसमें यह उसकी माया है। सब मरजी है उसकी हम मात्र खिलौने हैं चाबी लगती उसकी।बातों से नहीं मरता यह पेट तो कुआँ है शायद ही कभी भरता।।कितने अच्छे दिन थे बस खेलते रहते थे और खूब झगड़ते थे।।क्या और बहाने हैं सब एक बार कह दो जितने भी बहाने हैं।।तुम्हें कह भी नहीं सकता जो मन में समाई है पर सह भी नहीं सकता।।यह आग न खो जाए दिल में ही इसे रखना यह राख न हो जाए।।दिल खूब सुलगता है ईंधन बेशक न हो वह खुद ही सुलगता है।।सब आग से जलते हैं कुछ को वो जलाती है कुछ खुद ही जलते हैं।।यह आग ही तो मैं हूँ यदि आग नहीं होगी तो खाक ही तो मैं हूँ।।दो राहें जाती हैं मैं किसी पर पैर रखूँ वो दोनों बुलाती हैं।।रास्ते तो वही रहते ये दोष है पैरों का क्यों सीधे नहीं चलते।।तुम भूल नहीं करना ये रास्ते टेढ़े हैं धीरे से कदम रखना।।बेशक वे सपने हैं कुछ देर रहेंगे वे क्योंकि वे अपने हैं।।
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