संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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अवध-अवधी
डॉ. कुँवर चंद्रप्रकाश सिंह
अवध नाम का उल्‍लेख वेदों में नहीं मिलता है। अयोध्‍या का उल्‍लेख अथर्ववेद–10/3/31 में आया है, जिसका अर्थ वहाँ अयोध्‍या नगरी है। कुछ विद्वानों ने अयोध्‍या को देशवाची भी माना है, किंतु प्रमाणों से इसका अनुमोदन नहीं हो पाया है। कोशल नाम का उल्‍लेख वैदिक साहित्‍य में अवश्‍य प्राप्‍त होता है। ‘शतपथ ब्राह्मण’ और ’गोपथ ब्राह्मण’ में देशरूप में इसका उल्‍लेख किया गया है। जिस प्रदेश को अब अवध कहा जाता है, उसका यह नाम संभवतः अयोध्‍यापुरी के नाम के कारण ही प्रचलित हुआ है। अयोध्‍या का अर्थ है ‘अयुध्‍य’ अर्थात् जो युद्ध करके योद्धाओं द्वारा अजेय है। ‘अवध’ शब्‍द यदि ‘अवध्‍य’ से निष्‍पन्‍न हुआ हो तो उसका अर्थ भी प्रायः यही है। इस क्षेत्र के लिए अवध नाम कब प्रचलित हुआ, शोध की वर्तमान स्‍थिति में यह ठीक-ठीक कह पाना कठिन है। ऋग्‍वेद में नदी के रूप में ‘सरयू’ का उल्‍लेख है। इस नदी का आज का प्रचलित नाम सरयू है, किंतु ऋग्‍वेद में ‘सरयू’ शब्‍द उकारान्‍त है। ऋग्‍वेद 10/64/9 में यह कहा गया है–‘‘बड़ी से बड़ी सरस्‍वती, सरयू, सिंध इत्‍यादि इक्‍कीस नदियाँ यज्ञ में हमारी रक्षा के लिए अपनी लहरों के साथ आवें। देवी माताएँ और प्रेरणा करनेवाली ये नदियाँ अपने घृत और मधुयुक्‍त जलों को हमारे लिए प्रदान करें।’’ इस प्रकार के उल्‍लेख यह सिद्ध करते हैं कि ऋग्‍वेद में ही सरयू के तट तक वैदिक संस्‍कृति का प्रसार था। ‘सरयू’ का उल्‍लेख ऋग्‍वेद में तीन बार किया गया है। सरस्‍वती और सिंधु जैसी महान् वेदविश्रुत नदियों के साथ इसका उल्‍लेख किया जाता था। कुछ स्रोत इसे ब्रह्मसर से निकलने के कारण सरयू कहते हैं और कुछ सारस्‍वत स्रोत इसके जल का सारव कहते हैं, क्‍योंकि वह बड़ा कोलाहल करता हुआ प्रवहमान होता है। ‘वाल्‍मीकि रामायण’, ‘रघुवंश’, ‘स्‍कंदपुराण’, ‘विष्‍णु-धर्मोत्तर पुराण’ आदि में अयोध्‍या को इसके तट पर स्‍थित कहा गया है।
जब यह सिद्ध हो जाता है कि आज का अवध सरयू नदी के दोनों कूलों पर प्रसरित वह क्षेत्र था, जिसमें वैदिक संस्‍कृति का पूर्ण प्रसार था, तो यह भी अनुमान किया जा सकता है कि अवधी भाषा का स्रोत भी वैदिक भाषा अथवा उसकी कोई बोली है। अवध, जिसका प्राचीन नाम कोशल था, पूर्व में विदेह जनपद की सीमा तक प्रसरित था। दक्षिण में इसकी सीमा काशी जनपद से मिलती थी। शतपथ ब्राह्मण में कुरु-पांचाल की तरह कोशल-विदेह का एक साथ उल्‍लेख है। पश्‍चिम में इसकी सीमा ब्रह्मावर्त तक प्रसरित रही होगी। आजकल कानपुर जिले में बिठूर नाम का गंगा-तटवर्ती एक स्‍थान ब्रह्मावर्त कहलाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार बर्हिष्‍मती इसकी राजधानी थी और स्‍वायंभुव मनु इसी पुरी में निवास करते हुए ब्रह्मावर्त पर शासन करते थे। महाराज मनु ने
श्री बराह भगवान् से भूमिरूप निवासस्‍थान प्राप्‍त कर इसी स्‍थान में कुश और काश की बर्हि अर्थात् चटाई बिछाकर श्री भगवान् की पूजा की थी। इसीलिए इस स्‍थान का नाम बर्हिष्‍मती पड़ा। मनु को जगत् का आदिराज अर्थात् सर्वप्रथम सम्राट् कहा गया है। उन्‍होंने ही मुनियों के जिज्ञासा करने पर मनुष्‍यों के तथा समस्‍त वर्ण और आश्रमों के अनेक प्रकार के मंगलमय धर्मों का भी निरूपण किया है, जो मनुस्‍मृति के रूप में उपलब्‍ध है।
अयोध्‍या भी किसी समय मनु की राजधानी रही है। वाल्‍मी‌कि रामायण में सर्पिका नदी के पास एक ऐसे प्रदेश का वर्णन है, महाराज मनु ने जिसको अपने पुत्र इक्ष्‍वाकु को प्रदान किया था। इन उल्‍लेखों से यह अनुमान किया जा सकता है कि संभवतः ब्रह्मावर्त प्रदेश भी कोशल के अंतर्गत था और बर्हिष्‍मती तथा अयोध्‍या मनु की दो राजधानियाँ थीं। गोस्‍वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में लिखा है, सम्राट् मनु अपने जीवन के अंतिम चरण में महारानी शतरूपा के साथ अवध क्षेत्र के प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्‍य में तपस्‍या करने के लिए गए। नैमिषारण्‍य को पुराणों में अट्ठासी हजार ऋषीश्‍वरों की आध्‍यात्‍मिक राजधानी कहा गया है। पश्‍चिम में ब्रह्मावर्त से पूर्व में विदेह जनपद और दक्षिण में काशी तक प्रसरित यह अवध प्रदेश सांस्‍कृतिक और आध्‍यात्‍मिक दृ‌‌ष्‍टि से प्राचीनकाल में कितना गौरवशाली रहा होगा। निश्‍चय ही यह वही प्रदेश है, जिसके विषय में मनु ने कहा है कि यहाँ के द्विजों से पृथ्‍वी के सब मनुष्‍य सदाचार सीखें। मनु के इस कथन पर मुहर लगाने के लिए ही भगवान् ने मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में अयोध्‍या में अवतार लिया।
इस क्षेत्र में एक दूसरी महान् आध्‍यात्‍मिक घटना भी घटित हुई। वस्‍तुतः गीता का जो ज्ञान स्‍वयं भगवान् ने अर्जुन को प्रदान किया, उसकी संप्रदाय-परंपरा का उद्भव और विकास भी इसी अवध क्षेत्र में हुआ था। गीता के चतुर्थ अध्‍याय के प्रथम श्‍लोक में भगवान् ने स्‍वयं कहा है–
इमं विवस्‍वते योगं प्रोक्‍तवानहमव्‍ययम्।
विवस्‍वान्‍मनवे प्राह मनुरिक्ष्‍वाकवेऽब्रवीत्।।
तात्‍पर्य है कि यह ज्ञान पहले सूर्य को प्रदान किया था। त्रेता के आरंभ में भगवान् सूर्य ने यह ज्ञान अपने पुत्र मनु को सिखाया और उन्‍होंने इसे अपने पुत्र इक्ष्‍वाकु को दिया। इन प्रमाणों से यह सिद्ध है कि अवध की यह भूमि ज्ञान और कर्म के उच्‍चतम आदर्शों की जनक और संपोषक रही है।
अवध प्रदेश की भाषा के बोलनेवालों का क्षेत्र भी पहले की अपेक्षा आज अधिक विस्‍तृत रहा होगा। इस दृष्‍टि से दो प्राचीन ग्रंथों की भाषा पर विचार किया जा सकता है। वाराणसी के गाहड़बार नरेश महाराजा गोविंदचंद्र के सभापंडित दामोदर शर्मा ने बारहवीं शताब्‍दी में ‘उक्‍ति-व्‍यक्‍ति-प्रकरण’ नामक ग्रंथ की रचना की थी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस ग्रंथ के विषय में लिखा है—‘‘उक्‍ति-व्‍यक्‍ति-प्रकरण’ एक अत्‍यंत महत्त्वपूर्ण व्‍याकरण-ग्रंथ है। इससे बनारस और आस-पास के प्रदेशों की संस्‍कृति और भाषा आदि पर अच्‍छा प्रकाश पड़ता है और उस युग के काव्‍य-रूपों के संबंध में भी थोड़ी-बहुत जानकारी प्राप्‍त होती है।’’ इस ग्रंथ की भाषा का एक उदाहरण यहाँ प्रस्‍तुत किया जा रहा है—‘‘वेद पढ़ब, स्‍मृति अभ्‍यासिब, पुराण देखब, धर्म करब।’’ इस भाषा के क्रिया-पदों में अवधी का स्‍वरूप स्‍पष्‍ट ‌ल‌क्षित होता है। इसी प्रसंग में एक अन्‍य प्राचीन ग्रंथ ‘वर्ण-रत्‍नाकर’ की भाषा पर भी विचार किया जा सकता है। इसकी रचना अनुमानतः चौदहवीं शताब्‍दी में हुई थी और उसके लेखक ज्‍योतिरीश्‍वर ठाकुर हैं। यह रचना मैथिली गद्य में हुई है। इसके क्रिया-पदों में भी अवधी का प्रभाव स्‍पष्‍ट रूप से लक्षित होता है–‘‘पुनु कयिननि नायिका। कामदेवक नगर अइसन शरीर। निष्‍कलंक चाँद अइसन मुँह। कंदल खंजीरीर अइसन लोचन। यमुना की तरंग अइसन भुजइ।’’ ‘कइसन’, ‘अइसन’ का प्रयोग आज भी अवधी के कुछ क्षेत्रों में होता है। शतपथ ब्राह्मण आदि में कोशलविदेह और कोशलकाशी का एक साथ उल्‍लेख केवल उनकी भौगोलिक निकटता को ही सूचित नहीं करता, अपितु विदेह और काशी जनपद तक कोशल की भाषा का प्रसार अथवा प्रभाव भी सूचित करता है।
आज भी भाषिक परिस्‍थिति में वाराणसी क्षेत्र में भोजपुरी का प्रभाव अधिक लक्षित होता है। किंतु वाराणसी क्षेत्र के पूर्व के मगध क्षेत्र में गया के आस-पास जो मगही बोली जाती है, वह उच्‍चारण-प्रयत्‍न और क्रिया-पदों के प्रयोग की दृष्‍टि से अवधी से साम्‍य रखती है। वाराणसी क्षेत्र में कबीर के समय में भोजपुरी का प्रभाव व्‍याप्‍त हो गया था। कबीरदास के अनेक भाषा-प्रयोग इसके प्रमाण हैं–‘सूतल रहलूँ मैं नींद भरी हो, गुरु दिहलैं जगाइ।’ इस प्रकार के प्रयोग अवधी के पूर्वी क्षेत्रों में भी मिलते हैं। अवधी, भोजपुरी और मैथिली का अंतर उच्‍चारण और ध्‍वनि के कारण पैदा हुआ है। गोस्‍वामी तुलसीदास ने हिंदी की खड़ी बोली, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि सभी बोलियों का प्रयोग ‘रामचरितमानस’ में प्रयुक्‍त अपनी अवधी में किया है। इस प्रकार उन्‍होंने यह सिद्ध किया है कि मैथिली, भोजपुरी, ब्रज, अवधी आदि सब एक ही भाषा की बोलियाँ है। अवधी ने कई शताब्‍दियों तक देश को एकसूत्र में बाँधने का वही कार्य किया था, जो आज खड़ी बोली कर रही है। अठारहवीं शताब्‍दी तक उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की प्रमुख काव्‍य-भाषा अवधी ही थी। उत्तर प्रदेश के सूफियों द्वारा रचा हुआ विपुल सूफी साहित्‍य इसका प्रमाण है। गोस्‍वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में अवधी की भाषा-शैली को वह उदात्त और परिनिष्‍ठित रूप प्रदान किया, जो हमारी आज की राष्‍ट्रभाषा के मानक स्‍वरूप के निर्माण में आदर्श बना।
अवधी के साहित्‍य में हमारे राष्‍ट्र के जीवन की समग्रता प्रतिबिंबित हुई है। यदि गोस्‍वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में नानापुराण, निगम-आगम आदि का सारतत्त्व अंतर्निहित है, तो जायसी के ‘पद्मावत’ में सहजयान, नाथपंथ, हठयोग, तांत्रिक या कापालिक मत, निर्गुण संतमत, कुंडलिनी-साधना एवं रसायनवाद के प्रायः समस्‍त उपकरण प्राप्‍त होते हैं। जायसी के ‘पद्मावत’ में अवध में प्रचलित रामकथा-विषयक अनेकानेक उक्‍तियाँ भी मिलती हैं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने लिखा है– ‘‘जायसी ने जनता के स्‍तर से ही रामकथा का संग्रह करके लगभग सौ बार ‘पद्मावत’ में उसका उल्‍लेख किया है। इनके मिलाने से एक छोटी जायसी-रामायण भी बन जाती।’’ डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने यह भी लिखा है कि जायसी ने भाषा और साहित्‍य के छिपे हुए भंडार से एक नई सशक्‍त शैली को खोज निकाला है। जायसी ने अवधी की जिस साहित्‍यिक शैली का आविष्‍कार किया था, उसको गोस्‍वामी तुलसीदासजी ने चरम समृद्ध और सर्वांगपूर्ण बनाकर ‘रामचरितमानस’ में प्रस्‍तुत किया। काव्‍य-भाषा की समृद्धि और प्रतिपाद्य वस्‍तु के औदात्‍य की दृष्‍टि से अवधी में रचित ‘रामचरितमानस’ का स्‍थान विश्‍वसाहित्‍य में अद्वितीय है। अवधी साहित्‍य में भारतीय संस्‍कृति की दिव्‍य-विभूति के दर्शन स्‍थान-स्‍थान पर प्राप्‍त होते हैं। जिस भारतीय संस्‍कृति और सभ्‍यता का आविर्भाव वैदिककाल में हुआ था और विभूति युगों में जिसका अप्रतिहत मांगलिक विकास निरंतर होता रहा, उसका एक परिपूर्ण चित्र हमको अवधी साहित्‍य में, विशेषतः ‘रामचरितमानस’ में प्राप्‍त होता है। ‘रामचरितमानस’ विश्‍वसाहित्‍य की मूर्धन्‍य कृति है, अवध-अवधी के लिए यह गर्व का विषय है।
अवधी भाषा में काव्‍य-रचना की परंपरा मुल्‍ला दाऊद ने 1370 ई. में ‘चंदायन’ नामक प्रेमगाथा की रचना से आरंभ की थी। यह रचना शुद्ध अवधी में ‘रामचरितमानस’ से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व और ‘पद्मावत’ से पौने दो सौ वर्ष पूर्व की गई थी। इस भाषा में साहित्‍य-निर्माण की जो परंपरा आरंभ हुई, वह आज तक चली आ रही है। आज भी उसमें सभी विधाओं और शैलियों की रचना निरंतर हो रही है। स्‍वर्गीय पं. बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ और पं. वंशीधर शुक्ल ने अवधी में आधुनिक युग का प्रवर्तन किया। कुल मिलाकर अवधी में विश्‍वसाहित्‍य और राष्‍ट्रीय महत्त्व के प्रभूत साहित्‍य की रचना हुई है। आज भी पं. विश्‍वनाथ पाठक जैसे विद्वान् कवि अवधी में श्रेष्‍ठ काव्‍य-रचना कर रहे हैं। अवधी काव्‍य युगचेतना, सांस्‍कृतिक चेतना और सौंदर्यचेतना के समन्‍वय का काव्‍य है। समयाभाव के कारण इस विषय पर मैं जो कुछ लिखना चाहता था, वह लिख नहीं पाया। अभी तो केवल सुहृद्वरेण्‍य डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी के आदेश का औपचारिक पालन कर सका हूँ। अवधी भाषा और साहित्‍य के अध्‍ययन एवं अनुसंधान के केवल कुछ आयामों का संकेत ही इस लघु वक्‍तव्‍य में किया जा सका है। विशेष बल इस बात के अनुशीलन पर दिया जाना चाहिए कि काव्‍यभाषा के रूप में कलात्‍मक सज्‍जा और अभिव्‍यंजना-क्षमता की दृष्‍टि से अवधी अभूतपूर्व और अनुपम है। दूसरी बात, जिसको अतिरिक्‍त बलपूर्वक स्‍थापित किया जाना चाहिए, वह है अवधी काव्‍य में प्रतिपादित प्रेमतत्त्व। जायसी कहते हैं कि प्रेम ही विश्‍व का सबसे सुंदर और विशिष्‍ट तत्त्व है। इस प्रेम के द्वारा ही जीवन में पूर्णता प्राप्‍त होती है और पूर्ण सौंदर्य का साक्षात्‍कार होता है—
तीन लोक औ चौदह खंड, सबै परै मोंहि सूझि।
प्रेम छाँड़ि किछु और न लोना जौ देखौं मन बूझि।।
जायसी कहते हैं, मनुष्‍य इस प्रेम की साधना द्वारा ही दिव्‍यत्‍व प्राप्‍त करता है, अन्‍यथा वह मुट्ठी भर धूल-राख के अतिरिक्‍त क्‍या है ?
मानुष प्रेम भएउ बैकुंठी।
नाहिं त काह छार एक मूँठी।।
प्रेम पंथ जौं पहुँचे पाराँ।
बहुरि न आइ मिलै एहि छाराँ।।
गोस्‍वामी तुलसीदास ने भी इसी प्रेम को जीवन का परम प्राप्‍तव्‍य माना है। उन्‍होंने अपनी प्रेमनिष्‍ठा को चातक के प्रतीक के माध्‍यम से व्‍यक्‍त किया है–
एक भरोसो, एक बल, एक आस बिस्‍वास।
एक राम-घनस्‍याम हित चातक तुलसीदास।।
चातक तुलसी के मते स्‍वातिहु पियै न पानि।
प्रेमतृषा बा‌ढ़ति भली, घटे घटैगी आनि।।
रटत रटत रसना लटी, तृषा सूखिगे अंग।
तुलसी चातक-प्रेम को नित नूतन रुचिरंग।।
सारांश यह कि अवध-भूमि मानव-मूल्‍यों, मानवीय उच्‍चादर्शों और सदाचार के अन्‍यतम प्रतिमानों की जननी है। इसका साहित्‍य विश्‍वमैत्री, विश्‍वप्रेम, विश्‍वशांति का संदेशवाहक है। आज समस्‍त विश्‍व शांति की स्‍थापना के लिए विकल है। गोस्‍वामीजी ने लिखा है–
सात दीप नव खंड लौं, तीनि लोग जग माहिं।
तुलसी सांति समान सुख अपर दूसरो नाहिं।।
महा सांतिजल परसि कै, सांत भए जन जोइ।
अहं-आगनि ते नहिं दहैं, कोटि करै जो कोइ।।