संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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भारत-यात्रा मोहनजोदड़ो से भी प्राचीन संस्‍कृति की झलक
डॉ. पीतांबर सोमानी
petersomani@yahoo.com
पीतांबर सोमानी राजस्‍थान में पैदा हुए थे, पर बचपन में ही उनका परिवार ग्‍वालियर आ गया था। उन्होंने ग्‍वालियर में ही पढ़ाई पूरी की तथा मेडिकल डिग्री पाकर और वे दिल्‍ली में आगे की ट्रेनिंग लेकर सन् 1962 में अपनी पत्‍नी कमलेश व एक छोटी-सी पुत्री के साथ वे अमेरिका आ गए थे। यहीं आगे की पढ़ाई की, पी-एच.डी. की डिग्री ली तथा मिलावॉकी, मायामी तथा टोलीडो के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के पद पर पहुँचे। हृदय रोग पर नई दवाइयों के ऊपर रिसर्च करते हुए नाम कमाया। पीतांबर पहले अमेरिकन-हिंदुस्‍तानी हैं, जो अमेरिका में कैबिनेट मेंबर बने, जब 1991 में ओहायो के गवर्नर ने उन्‍हें डायरेक्‍टर ऑफ हैल्‍थ बनाकर अपनी कैबिनेट में शामिल किया था। रिटायर होने के पश्‍चात् पीतांबर व कमलेश कोलंबस में रहते हैं। उनके तीन बच्‍चे तथा सात नाती-पोते भी अमेरिकावासी हैं। यह लेख उनकी हिंदी में लिखी सबसे पहली रचना है।
आप सब भी भारतवर्ष की यात्रा पर कभी तो अवश्‍य ही जाते होंगे। क्‍यों नहीं, परदेश में चाहे आप कितने ही वर्षों से रहते हों, परंतु यदि आप भारत में पैदा हुए थे और वहीं बड़े हुए थे तो अवश्‍य ही भारत आपकी नस-नस में भरा हुआ है। चाहे आप हजारों तरह से विदेशी बनने की कोशिश करें किंतु अपना देश तो आपके अंदर ही समाया रहेगा। जी हाँ, हम भी बहुत सालों से अमेरिकावासी हैं, परंतु जब भी अवसर मिलता है, हम हिंदुस्‍तान की तरफ इसी भाँति रवाना होते हैं जैसे बचपन में हर वर्ष गरमी की छुट्टी में अपने ननिहाल के गाँव में जाते थे, या यहाँ पर जैसे सेल्‍मन मछली अपनी जन्‍म नदी की तरफ। वैसे तो हम और आप सभी भारत-यात्रा का जितनी बार प्‍लान बनाते हैं उतनी ही बार यही सोचते हैं—नहीं, कसम भी लेते हैं, कि इस बार सब संबंधियों व दोस्‍तों से मिलने-जुलने के अलावा कोई पर्यटन की अच्‍छी जगह देखेंगे, किंतु हर बार यह इच्‍छा एक स्‍वप्‍न की भाँति टूट जाती है और खाली हाथ ही वापस आ जाते हैं। यद्यपि इस फरवरी में भारत-यात्रा का प्रमुख कारण कमलेश के सबसे छोटे भतीजे के विवाह में शामिल होना था, पर मन में यही विचार था कि कोई नई जगह भी देखनी चाहिए।
किसी भी भारतीय से कहना कि व‌ह अपनी पुरानी संस्‍कृति या सभ्‍यता भूल गया होगा, उसको ऐसे ही उकसा सकता है जैसे स्‍पेन में किसी बैल को लाल झंडी दिखाना। साथ में थोड़ा सोमरस का तो असर था ही। मैंने फौरन उनको चुनौती दी कि आपसे ज्‍यादा तो हम अभी भी जानते हैं। ‘‘अच्‍छा तो यह बताइए कि मोहनजोदड़ो कहाँ है और उसका क्‍या महत्त्व है?’’ आस-पास बैठे सब लोग भी चौकन्‍ने हो गए, क्‍योंकि वे हमारे शांत स्‍वभाव तथा हमारे ज्ञान से भलीभाँति परिचित थे।
थोड़ा सा सकुचाते हुए वे सज्‍जन बोले, ‘‘नहीं-नहीं, मेरा यह मतलब नहीं था।’’ मैंने भी कहा, ‘‘खैर, आपका यह इरादा नहीं था तो ठीक है, परंतु मेरे प्रश्‍न का उत्तर तो आपने अभी तक नहीं दिया।’’ थोड़ा सोचकर वे बोले, ‘‘मोहन तो भगवान कृष्‍ण का ही नाम है तो मोहन जोदाड़ो भी कृष्‍ण भगवान से ही संबं‌धित होना चाहिए। जरूर मथुरा, वृंदावन या द्वारका से पास होगा। हाँ, याद आया कि कुछ साल पहले द्वारका के पास समुद्र में कुछ खँडहर मिले थे, उसी से इसका संबंध होगा।’’
मैंने फिर पूछा, ‘‘अच्‍छा तो यह बताइए कि हड़प्‍पा क्‍या है और इसका क्‍या इतिहास है ?’’
‘‘हड़प्‍पा-हड़प्‍पा, अड़प्‍पा, करिअप्‍पा! ये तो सब दक्षिण भारतीय नाम हैं। जरूर यहीं आस-पास कोई जगह होगी। या फिर मद्रास... हाँ, वहीं कई सारे प्राचीन मंदिर हैं, उन्‍हीं में से कोई एक होगा। हड़प्‍पा नाम तो अवश्‍य सुना है किंतु अभी ठीक से याद नहीं आ रहा है।’’
अब आपको क्‍या बताएँ। जिन्‍हें ये ही ज्ञान नहीं है कि मोहनजोदड़ो व हड़प्‍पा सिंधु नदी घाटी के भाग में भारत की सबसे प्राचीन सभ्‍यता के जीते-जागते प्रतीक माने जाते हैं, उनको और क्‍या ज्ञान होगा! खैर, खाने-पीने का आनंद लेने के हेतु मैंने वार्त्तालाप का रुख ही बदलकर एक-दो चुटकुले सुनाए तो सब लोग इस विषय को भूल गए।
वैसे तो शादी तथा घूमने के चक्‍कर में बड़ा ही आनंद रहा, परंतु मेरे मन में सारे समय यही उथल-पुथल चलती रही कि यदि कोई विदेशी मित्र मुझसे भारत की प्राचीन संस्‍कृति के बारे में पूछे और सबूत माँगे तो मैं क्‍या बताऊँगा। मोहनजोदाड़ो व हड़प्‍पा के बारे में तो देश-विदेश के बहुत सारे लेखकों ने किताबें लिखी हैं, परंतु हर पुस्‍तक में प्रायः एक जैसा ही वर्णन मिलता है कि यहाँ की संस्‍कृति करीब पाँच हजार वर्ष पूर्व कहीं बाहर से आए हुए आर्य लोगों ने स्‍थापित की थी। हालाँकि मुझे भी बचपन में पढ़े हुए इतिहास की भूमिका ‌इसी प्रकार याद है तथा आजकल स्‍कूलों व कॉलेजों में भी यही पढ़ाया जाता है, पर सिवाय भगवान गिडवानी के, जिनकी एक किताब ‘द रिटर्न ऑफ द आर्यन’ कई वर्ष पूर्व छपी थी, किसी भी इतिहास के प्रोफेसर ने इस विषय पर आधुनिक समय में अनुसंधान या रिसर्च नहीं किया है। सभी लोग लकीर के फकीर की भाँति यही दुहराते हैं कि भारतीय संस्‍कृति यहीं से शुरू हुई थी। वैसे आजकल सिंधु घाटी तो पाकिस्‍तान में है और वहाँ की हालत देखकर पता नहीं वे देख पाएँगे या नहीं।
यही सब सोचते हुए ऐसा लगा कि भारत में रहने के चौदह दिन जो इस बार बाकी रह गए हैं वह भी पहले की भाँति शीघ्र ही निकल जाएँगे और वापस जाने का समय आ जाएगा। यही सोचते हुए कि इस मामले में ‘खाली हाथ आए थे, खाली ही लौट जाएँगे।’ हम अपने स्‍वप्‍नों की दुनिया में पहुँच गए।
मध्‍य प्रदेश की राजधानी भोपाल जो आजकल इसलामिक व नवाबी सभ्‍यता से जोड़ी जाती है, वास्‍तव में मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज ने नौवीं शताब्‍दी में पहाड़ों के बीच एक नदी पर मिट्टी का बाँध बनवाकर एक बड़ी झील के किनारे जो शहर स्‍थापित किया था, वही है। धीरे-धीरे समय के साथ इसका नाम ‘भोजपाल’ से भोपाल बन गया। यहाँ आकर यह भी पता चला कि भोपाल का यह बाँध हिंदुस्‍तान का मनुष्‍य द्वारा बनाया सबसे पहला बाँध है तथा यहाँ का तालाब भी स्‍वच्‍छ पानी का भारत का सबसे बड़ा तालाब है।
सुबह जब यह वार्त्तालाप चल रहा था कि एक दिन में भोपाल की कौन-सी प्रसिद्ध जगह हम देख सकते हैं, तब नीलम व उसके पतिदेव शशिमोहनजी ने सुझाव दिया कि आस-पास तीन चीजें देखी जा सकती हैं : साँची का विश्‍व प्रसिद्ध भगवान बुद्ध का स्‍तूप, जिसे सम्राट् अशोक ने क्राइस्‍ट से 3 सदी पूर्व बनवाया था, 1984 में हुए यूनियन कार्बाइड गैस कांड की जगह या फिर पास में ही कुछ ब‌हुत पुरानी गुफाएँ, जो एक पहाड़ी पर चट्टानों के बीच स्‍थापित हैं। साँची तथा ये गुफाएँ अलग-अलग दिशाओं में होने के कारण सिर्फ एक ही जगह देखना संभव था। शायद आप सबको तो अच्‍छी तरह ज्ञात होगा कि भोपाल भ्रमण करनेवाले विदेशी पर्यटक तो भोपाल सिर्फ साँची का स्‍तूप ही देखने के लिए आते हैं। इन स्‍तूपों के बारे में तो एक-से-एक सुंदर हजारों फोटो समेत बहुत सारी किताबें छप चुकी हैं जो समस्‍त भारत की बड़ी-बड़ी दुकानों में, होटलों में तथा हवाई अड्डों पर उपलब्‍ध हैं।
सौभाग्‍य की बात है कि इसी कारण शायद मन में अचानक विचार उठा कि साँची तो सब ही लोग जाते हैं, चलो इस बार जंगल तथा पहाड़ियों का ही सफर किया जाए और ये पुरानी गुफाएँ देखी जाएँ, क्‍योंकि इनके बारे में पहले कुछ नहीं सुना था।
यह बड़ा ही अच्‍छा निर्णय रहा, जिससे सब सहमत थे, क्‍योंकि वहाँ जाकर ऐसी अद्भुत चीजें देखने को मिलीं, जिनका वर्णन करना आसान नहीं है। हमारी हैदराबाद से शुरू हुई जिज्ञासा कि भारतवर्ष के सबसे प्राचीन इतिहास का साक्षात् प्रमाण मिले, वह भी पूर्ण हुई।
भोपाल, इंदौर, उज्‍जैन आदि शहर विंध्‍याचल पर्वत की पहाड़ियों पर ही बसे हुए हैं। विंध्‍य पर्वत पूर्व में गंगा नदी के किनारे बसे मिर्जापुर शहर से पश्‍चिम में राजस्‍थान व गुजरात तक फैला हुआ है तथा इस प्रकार भारतवर्ष को उत्तर तथा दक्षिण दो भागों में बाँट देता है। भोपाल से दक्षिण दिशा में होशंगाबाद त‌क विंध्‍य पर्वत का आखिरी हिस्‍सा है, जहाँ नर्मदा नदी है, जो जबलपुर के पास से निकलकर पश्‍चिम दिशा में बहती हुई बड़ौदा के पास अरब सागर में जा मिलती है। भारत के इतिहास में यह माननीय बात है कि उत्तर भारत की आर्य सभ्‍यता तथा दक्षिण भारत की द्रविड़ सभ्‍यता हजारों वर्ष तक इस विंध्‍याचल पर्वत शृंखला के कारण ही अलग-अलग रहकर बढ़ी थी। इसी प्रकार यह भी ज्ञात है कि मुगलों के पहले ‌जितने भी विदेशी आक्रमणकारी सदियों से भारत पर अधिकार जमाना चाहते थे, वह इन्‍हीं विंध्‍य पर्वतों तक आकर वापस चले जाते थे।
परंतु फिर भी यह सोचने की बात है कि हमारी धार्मिक संस्‍कृति पूर्ण रूप से एक समान है तथा वेदों, पुराणों व प्राचीन ग्रंथों में लिखी राम, कृष्‍ण तथा शिवजी के जीवन की घटनाओं का संबंध उत्तर व दक्षिण दोनों ही भागों में एक समान बताया गया है।
भोपाल से करीब 46 कि.मी. दक्षिण में इन्‍हीं पहाड़ियों के बीच एक जंगल में करीब 1500 फीट की ऊँचाई पर ये गुफाएँ हैं, जिनका लिखित वृत्तांत सबसे पहले सन् 1888 में अंग्रेजों ने भारत की आर्कियोलोजिक किताबों में दिया है। उन्‍हीं लोगों ने इस स्‍थान का नाम ‘भीमबटेका’ रख दिया था। उसके बाद 1957 तक इन गुफाओं पर किसी ने ध्‍यान नहीं दिया। उस वर्ष विक्रम महाविद्यालय के आर्कियोलोजी के प्रोफेसर विष्‍णु वाकनकर ने रेलगाड़ी से यात्रा करते इन चट्टानों को देखकर इन गुफाओं की खोजबीन आरंभ की तथा अपने अनुसंधान पर कई लेख लिखे तथा भाषण दिए। आज भी भारत की इस तरह की प्राचीन चित्रकलाओं के विषय में उनका नाम सबसे ज्‍यादा माननीय है। मैं भी अब सोचता हूँ कि यह क्‍या संयोग की बात है कि जिस समय प्रो. वाकनकर भीमबेटका की अँधेरी गुफाओं में चित्रकला आदि का अनुसंधान कर रहे थे, उन्‍हीं दिनों मैं भी विक्रम महाविद्यालय के ग्‍वालियर मेडिकल कॉलेज के तीसरे वर्ष की भारी-भारी किताबों की पढ़ाई में जुटा हुआ था। परंतु प्रो. वाकनकर या इन गुफाओं के बारे में उस समय कुछ नहीं सुना था।
नीलम का बड़ा सुपुत्र अंकित स्‍वयं ही कार चलाकर हम पाँचों (मैं, कमलेश, नीलम, अंकित व उसकी पत्‍नी गित्‍या) को अपनी टोयोटा करोला में बैठाकर भीमबेटका दिखाने चल दिया। वैसे तो 46 कि.मी. की दूरी तो शायद 25-30 मिनिट में पूरी हो जाती, पर इस भोपाल-होशंगाबाद राष्‍ट्रीय हाईवे पर वहाँ पहुँचने में सवा घंटा लग गया। क्‍यों नहीं, भारत की सड़कों पर हर प्रकार का ट्रैफिक जो मिलता है–कार, बस, लौरी, ट्रैक्‍टर, साइकिल, मोटर साइकिल आदि। इनके अतिरिक्‍त, सड़कों पर गाय-बैल, भैंस, बकरी, कुत्ते, मु‌रगियाँ और भी जानवर, जैसे बंदर, सभी मिल जाते हैं–क्‍यों नहीं, सभी जानते हैं कि भारत की सड़कों पर इन्‍हीं सबका पहला अधिकार है।
वैसे तो अंकित बहुत ही प्रवीण व सतर्क ड्राइवर है, फिर भी आगे की पैसिंजर सीट पर बैठे मैंने कई बार कसके ब्रेक लगाने की कोशिश की या स्‍टीयरिंग व्‍हील को चलाकर सामने से आ रही बस या ट्रक से बचाने की कोशिश की, परंतु यह तो सिर्फ कल्‍पना ही थी, क्‍योंकि भारत की कारों में ये तो सिर्फ दाहिनी तरफ ड्राइवर के साथ होते हैं। खैर, हिंदुस्‍तान में कार से सफर करने का तजुरबा कभी और बताएँगे।
नेशनल हाईवे से निकलकर हम लोग भीमबेटका की तरफ एक छोटी सड़क पर मुड़ गए। देखकर आश्‍चर्य हुआ, और अच्‍छा भी लगा, कि इस सड़क पर एक भी गड्ढा नहीं था। मैं मध्‍य प्रदेश सरकार की बड़ी सराहना करूँगा कि इतने प्राचीन गाँवों के आस-पास बसी पहाड़ी गुफाओं तक पहुँचने का यह रास्‍ता इतना आधुनिक बना दिया है। करीब दस मिनिट में सारी ऊँचाई पूरी करके हम उन गुफाओं के सामने पहुँच गए तथा कार पार्क कर दी!
कार से निकलकर देखा तो चारों तरफ बड़े-बड़े पेड़ खड़े थे और दूर तक जंगल-ही-जंगल नजर आ रहे थे। उन्‍हीं के बीच एक छोटी सी पगडंडी बनी थी, जो दोनों तरफ पेड़ों के बीच से इन चट्टानों व गुफाओं की तरफ ले जा रही थी।
भीमबेटका देखने का कोई टि‌कट नहीं लगता है। हम पाँचों लोग इस पतली-सी पथरीली पगडंडी से गुफा की तरफ चल दिए और करीब पाँच मिनट बाद उसके मुख्‍य द्वार के पास जा पहुँचे। वहाँ हमारे सामने एक बहुत बड़ी तथा करीब 50 फीट ऊँची चट्टान थी, और दोनों तरफ जाने की पगडंडियाँ थीं—समझ में नहीं आ रहा था कि किस दशा में आगे बढ़ें क्‍योंकि सब तरफ बड़ी-बड़ी ऊँची-ऊँची चट्टानें व घने पेड़ नजर आ रहे थे। उसी समय एक गाइड नजर आ गया, जो 10-15 विदेशी पर्यटकों को बाहर की तरफ छोड़कर वापस आ रहा था। बस, उसी को अपने मार्गदर्शन के लिए साथ ले लिया।
यह गाइड यहाँ पर करीब 15 वर्ष से वन विभाग में काम कर रहा है तथा यहाँ के बारे में काफी जानकार मालूम होता है। उसने ही हमें बताया कि यहाँ पर तरह-तरह की बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं जो हजारों, लाखों या करोड़ों सालों में तेज हवा व मूसलाधार बारिश में भी, जी हाँ, चट्टानों की भाँति ही दृढ़ खड़ी हैं। उसने यह भी बताया कि यहाँ पर 240 से ज्‍यादा गुफाएँ हैं, जिनमें भाँति-भाँति की प्राचीन चित्रकलाएँ बनी हुई हैं। यह सारा हिस्‍सा पूर्ण रूप से देखने के लिए कम-से-कम एक दिन तो अवश्‍य चाहिए और यदि पूरी तरह से अनुसंधान करना हो तो हफ्ता भर भी कम पड़ सकता है। क्‍योंकि हम यहाँ पहुँचे ही थे शाम तक और हमने गाइड से यही कहा कि सूर्यास्‍त से पूर्व जितना दिखा सकते हो, दिखा दो।
सबसे पहले बाहर की उस भारी चट्टान के समीप खड़े होकर उस गाइड ने बताया कि यहाँ कुछ साल पहले जब आर्कलॉजी विभाग के लोगों ने कुछ खुदाई की थी तो एक गहरे गड्ढे में एक मनुष्‍य की अस्‍थियाँ तथा पत्‍थर के कुछ औजार मिले थे जो आजकल भोपाल के संग्रहालय में रखे हैं। इनके मिलने से यही विचार किया गया था कि यहाँ पर प्राचीन भारतीय संस्‍कृति कम-से-कम स्‍टोन-एज (पाषाण-युग) के समय की थी। यह दिखाने के बाद गाइड हमें एक 30-40 फीट ऊँचे आर्च, जो दो भारी चट्टानों के बीच एक प्राकृतिक रूप से बनाया था, के बीच से एक खुली-सी जगह में ले गया। यह जगह करीब 25-30 फीट चौड़ी तथा 50 फीट लंबी थी तथा चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानों व बहुत सारे घने पेड़ों से घिरी हुई थी। आगे एक पतली सी पगडंडी बनी हुई थी, जिस पर चलकर हम थोड़ा नीचे की तरफ उतरने लगे। इन्‍हीं पगडंडी पर ऊबड़-खाबड़ छोटी-बड़ी पथरीली सिल्‍लियों के रास्‍ते पर चलते-चलते हम एक खुली जगह पहुँचे, जहाँ से दूर-दूर तक नीचे मैदान फैला हुआ ‌था।
दो भारी चट्टानों के बीच बने इस पतले से रास्‍ते से निकलते ही जब उस दिशा में बाहर देखा तो एक बड़ा ही अद्भुत दृश्‍य नजर आया। करीब 50 फीट दूर नीचे की तरफ एक बहुत ‌बड़ी शिला के ऊपर संतुलित एक बहुत बड़े कछुए, के आकार की एक चट्टान थी। कम-से-कम 75 फीट का यह प्राकृतिक पत्‍थर का बना कछुआ, जिसका सिर व गरदन आगे, गोल शरीर व शैल बीच में तथा छोटी-सी पूँछ पीछे थी, उस बड़ी शिला पर ऐसे संतुलित बैठा नजर आ रहा था कि मानो दूर तक फैले हुए मैदान को एक सागर समझकर इस प्रकार देख रहा हो, जैसे वर्षों से बिछुड़े हुए अपने साथी को ढूँढ़ रहा हो। प्रतीत हो रहा था कि वह अपने प्रेमी के इंतजार में हजारों-लाखों वर्षों से इसी संतुलित अवस्‍था में हवा के तीव्र झोंके तथा मूसलधार बारिश सहता हुआ भी इस शिला पर अभी तक स्‍थिर है। दिखने में तो ऐसा लग रहा था कि किसी भी क्षण मंद सी हवा का झोंका भी इसे नीचे गिरा देगा, पर यह सोचकर कि ये तो अतीत से यहीं है, मन में यही विश्‍वास हो जाता है कि प्रेमी-प्रेमिका का सच्‍चा प्‍यार इन चट्टानों की भाँति दृढ़ रहता है। यह कछुआ भी जब तक उसे अपना खोया हुआ साथी नहीं मिल जाता, अपनी इसी जगह पर हमेशा की तरह डटा रहेगा।
इधर से वापस आने पर दूसरी दिशा में इससे भी बड़ी एक और 100-150 फीट लंबी लाल रंग की छिपकली के आकार की एक चट्टान थी। उसे देखकर एकदम ऐसा महसूस हुआ कि वह किसी भी क्षण मौका पाते ही अपना भोजन पकड़ने के लिए अपनी लंबी सी चीभ बाहर फेंककर अपने शिकार को ग्रसित करके अपने मुँह में खींच लेगी।
इनके अलावा भी भिन्‍न-भिन्‍न आकार की छोटी-बड़ी बहुत सारी चट्टानें नजर आ रही थीं। समय ने, हवा ने तथा बरसात के पानी ने उन्‍हें अपने प्रभाव से तरह-तरह के रूप दिए हैं। ये चट्टानें हर तरफ से बड़े-बड़े पेड़ों के साथ ऐसे ही लिपटी हुई हैं, जिस प्रकार प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के साथ आलिंगनबद्ध हों। कुछ पेड़ तो इन पत्‍थरों के ऊपर से ही बढ़ रहे थे तथा उनकी जड़ें भी चट्टानों के बीच में ही फैली नजर आ रही थीं।
प्रकृति का कितना प्‍यारा व सुंदर नजारा है, यही सोचकर बड़ी ही अच्‍छा लग रहा कि तभी गाइड ने याद दिलाया कि यदि बाहर का ही दृश्‍य देखते रहेंगे तो कहीं अँधेरा न हो जाए और फिर गुफाओं के अंदर के चित्र ठीक से देखने को न मिलें। उसके साथ वापस चलकर उस तरफ पहुँचे जहाँ जंगलों के मध्‍य में कई गुफाएँ बनी हुई थीं और उनके बीच एक बड़ा सा आँगन भी प्राकृतिक रूप से ही बना हुआ था।
फरवरी मास में संध्‍या का समय होने के कारण हलकी-हलकी हवा बहनी शुरू हो गई थी, साथ ही ढलते हुए सूरज की लाल किरणें पेड़ों के बीच होती हुई सारी चट्टानों को बड़ा ही सुंदर रूप दे रही थीं। जहाँ हम खड़े थे वहाँ जमीन पर भी छोटी-बड़ी सैकड़ों शिलाएँ रास्‍ते में बिखरी पड़ी थीं तथा चारों तरफ आस-पास के पेड़ों से गिरी पत्तियाँ फैली हुई थीं। यहाँ आने की सिर्फ एक ही पगडंडी थी और नीचे मैदान की तरफ जाने का भी एक ही टेडा-मेड़ा पथरीला रास्‍ता था। ऊपर देखने में भी इन्‍हीं ऊँचे-ऊँचे पेड़ों व चट्टानों के बीच नीला आसमान नजर आ रहा था।
मैं इस प्राकृतिक दृश्‍य का आनंद ले रहा था कि अचानक एक हलकी हवा का झोंका आया तथा मेरे शरीर में एक अजब सी सनसनी महसूस हुई। मेरे रोंगटे खड़े हो गए और ऐसा लगा कि मैं अकेला नहीं हूँ तथा मेरे चारों तरफ अच्‍छी-खासी चहल-पहल हो गई है। महसूस हुआ कि मैं दस हजार वर्ष पुरानी दुनिया में पहुँच गया हूँ, जहाँ बड़ी संख्‍या में प्राचीन भारतवासी अपनी दैनिक चर्या में व्‍यस्‍त हैं तथा संध्‍या का कार्य पूरा करने में जुटे हुए हैं। बहुत सारे पुरुष व उनकी सहायता करने में उनके बच्‍चे गायों को अपनी-अपनी जगह ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ लोग गाय व उनके बछड़ों को बाँधकर दूध निकालने का प्रबंध कर रहे हैं। घर-घर की महिलाएँ भी अपने नन्‍हे-मुन्‍ने बालक-बालिकाओं को सँभाल रही हैं तथा भोजन बनाने में लगी हुई हैं। जगह-जगह लोगों के झुंड हँसी-मजाक करते नजर आ रहे हैं।
उसी समय ऐसा लगा कि उनके मुखियाजी ने मुझे देख लिया है और पास आकर आदर सहित मुझे संबोधित करके बोले, ‘‘श्रीमानजी, हमारी इस वाटिका में आपका स्‍वागत है। हम तो हजारों वर्षों से आपके ही यहाँ पधारने का इंतजार कर रहे हैं, क्‍योंकि हम जानते हैं कि प्राचीन भारत की संस्‍कृति जानने के लिए आप कितने जिज्ञासु हैं। व‌ह आपको यहाँ देखने को मिलेगी।’’
मुखियाजी को सामने देखकर तथा उनके वचन सुनकर मैं जरा सकपका गया। मन में हजारों प्रश्‍न उत्‍पन्‍न होने के बावजूद मुँह से सिर्फ यही निकाला—‘‘आप इस स्‍थान पर कब से रह रहे हैं व क्‍या-क्‍या घटनाएँ आपने स्‍वयं अपनी आँखों से देखी हैं?’’
‘‘हम लोग तो त्रेता युग से भी हजारों वर्ष पूर्व इन गुफाओं में आ गए थे और तभी से यहाँ पर रह रहे हैं। इतनी उँचाई पर होने के कारण यह स्‍थान पूर्ण रूप से सुरक्षित है। चारों तरफ घने जंगल भी हैं, इस कारण बाहर से दूसरे लोग भी हमें आसानी से नहीं देख पाते हैं, पर हम किसी और को इधर आते हुए देख सकते हैं।
‘‘हाँ, तो आपके प्रश्‍न का पूरा उत्तर देने में तो मुझे बहुत समय लग जाएगा, क्‍योंकि भारतवर्ष का सारा इतिहास तो हमारी आँखों के सामने से तो ऐसे गुजर गया जैसे एक ही पल में कहाँ-से-कहाँ पहुँच गए हों। फिर भी आपको संक्षिप्‍त में बता देते हैं। सबसे पहले तो यही महत्त्वपूर्ण बात है कि हमने गाय-बैलों व हाथी-घोड़ों को पालतू बना लिया। साथ ही वनों में शिकार करना भी धीरे-धीरे सीख लिया। हम लोगों ने पत्‍थर के कई तरह के हथियार तथा औजार भी बना लिए हैं।
‘‘अब आपको कुछ आँखों देखी खास घटनाएँ भी बता दें। त्रेता युग में आज से करीब सात हजार वर्ष पहले राम, लक्ष्‍मण और सीता जो आप दूर नीचे मैदान देख रहे हैं, उसी रास्‍ते से पैदल दक्षिण दिशा की तरफ जाते दिखाई दिए थे, पर वापस आते नजर नहीं आए थे। द्वापर युग की कौरव-पांडवों के संघर्ष की घटना तो हमने स्‍वयं अनुभव की थी जब पाँचों पांडवों भाई अपनी पत्‍नी पांचाली के सहित इन्‍हीं गुफाओं में एक वर्ष तक गुप्‍तवास में रहे थे। हमने उनके यहाँ रहने का रहस्‍य किसी को भी न बताने की प्रतिज्ञा ली थी। कलियुग की तो बात ही एकदम निराली थी। हजारों लोग हमारे चारों तरफ से उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्‍चिम दिशाओं में आ-जा रहे थे, परंतु उनमें से सिर्फ गौतम बुद्ध, महाराजा अशोक तथा महाकवि कालिदास ही ऐसे मानव हैं, जिनका नाम आज तक हम लोग बड़े गर्व से लेते हैं।’’
‘‘कृपया यह बताएँ कि गुफाओं में जो चित्रकला है, उनका क्‍या रहस्‍य है?’’ जिज्ञासु होकर मैंने पूछा।
‘‘हमारी प्रथा के अनुसार हर सातवें दिवस संध्‍या के समय एक सभा होती थी। जिसमें यहाँ रहनेवाले सभी लोग–बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, पुरुष–भाग लेते थे। किसी भी विषय पर बात हो सकती थी। एक समय एक बालक ने प्रश्‍न किया–‘‘दादाजी, आप हमेशा यही बताते हैं कि मानव जीवन तो केवल एक सौ वर्ष तक रहता है, उसके बाद हमारा शरीर फिर से मिट्टी में मिल जाता है। तब फिर सदियों पश्‍चात् जो मनुष्‍य यहाँ आएँगे, उन्‍हें हमारे बारे में कैसे पता चलेगा? जिस प्रकार सब बालकों के प्रश्‍न बड़े सरल लगते हैं, पर उनका अर्थ बड़ा गंभीर होता है, इस बालक के प्रश्‍न ने भी सारी सभा में दीर्घ वार्त्तालाप उठा दिया। अंत में यही निर्णय लिया गया कि कुछ ऐसी निशानी अवश्‍य बनाई जाए, जो हमेशा के लिए हमारे यहाँ रहने की यादगार बनाए रखे।
‘‘वैसे तो लिखित लिपि का भी हमें ज्ञान हो गया था, परंतु लिखित भाषा तो समय के साथ बदलती रहती है। साथ ही भाषा का ज्ञान तो सिर्फ पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित रहता है। कई भाषाओं का ज्ञान तो अच्‍छे-अच्‍छे पढ़े-लिखे लोगों की भी समझ में नहीं आता है, जैसे कई बहुत पुरानी पुस्‍तकों की लिपि का मतलब या उनमें दिया संदेश बड़े-बड़े विद्वान् भी अभी तक नहीं समझ पा रहे हैं।’’
‘‘यह सब सोच-विचार करते हुए हम सबने यही निर्णय लिया कि हम अपना संदेश चित्रकला के ही माध्‍यम से भविष्‍य में आनेवाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँगे। वैसे तो हमने पत्‍थरों की मूर्तियाँ भी बनाने के बारे में सोचा था, परंतु चूँकि आपने प्रश्‍न किया था तो एक और तथ्‍य बता दें कि यह विचार क्‍यों बदल दिया? हमने यही निर्णय लिया कि जो भी चिह्न हम यहाँ छोड़ें वे ऐसे हों जो भविष्‍य में कोई भी विदेशी यहाँ से चोरी करके, डाका डालकर या धोखे से उठा न पाए, जैसा कि छोटे पत्‍थरों पर बनाई बेहतरीन मूर्तियाँ या अनगि‌नत एक-से-एक अच्‍छा सामान, जेवरात, पुस्‍तकें या चित्र आदि अपने आपको ‘सभ्‍य’ कहनेवाले लोग भारत से ही नहीं और भी सैकड़ों जगहों से ले जाकर अपने संग्रहालयों में बड़ी शान से दिखा रहे हैं, जैसे ये इन्‍हीं की धरोहर हो। साथ में यह भी कहते हैं कि हम नहीं ले गए होते तो आप लोग इनकी अच्‍छी तरह से देखभाल भी नहीं कर सकते थे! कहावत सही है कि ‘उलटा चोर कोतवाल को डाटे’।’’ मुखियाजी ने विस्‍तार से बताया।
‘‘तो फिर आपने किस व्‍य‌क्ति को सारे चित्र बनाने के लिए चुना?’’ मैंने पूछा।
‘‘यह निर्णय भी इतना सुलभ नहीं था, क्‍योंकि वैसे तो हर शक्‍य अपने आपको एक बहुत बड़ा कलाकार मान सकता है, परंतु बहुत कम लोग ही इस कला में निपुण होते हैं। एक छोटी-सी परीक्षा लेकर हमने पाँच व्‍यक्‍तियों को इस कार्य के लिए चुना।’’ मुखिया जी बोले।
‘‘इन कलाकारों ने क्‍या दृश्‍य दिखाने का निश्‍चय किया?’’
‘‘बालक के प्रश्‍न को ध्‍यान में रखते हुए हम सबने यही सोचा कि जो भी चित्र आदि बनाए जाएँ वह हमारी जीवनचर्या को इन पत्‍थरों पर उतारने में सफल रहें।’’ मुखियाजी ने बतलाया।
‘‘इन कलाकारों ने इतनी कड़ी चट्टानों पर किस प्रकार...’’ मैंने आगे की बात पूछने की कोशिश की, परंतु उसी समय हमारे गाइड की आवाज आई, जिससे हम दोनों का वार्त्तालाप अचानक भंग हो गया : ‘‘साहब, अब जरा जल्‍दी कर लीजिए, क्‍योंकि सूरज ढलता जा रहा है और अभी तक आपने एक भी गुफा नहीं देखी है। अँधेरा होने के पहले कम-से-कम ऊपर की खास-खास गुफाएँ देख लीजिए।’’
गाइड के साथ आठ-दस गुफाएँ नजदीक से देखीं। कुछ में सिर्फ दीवाल पर चित्र बने थे, कुछ में दीवाल और छत दोनों पर ही चित्रकारी थी। कहीं-कहीं एचिंग भी दिखाई दी। ये नौ से बारह हजार वर्ष पहले बनी चित्रकलाएँ अभी भी ऐसी लग रही थीं जैसे अभी कुछ वर्ष पूर्व ही इनकी रचना हुई हो। इनमें जो दृश्‍य दिए थे उनका अर्थ भी बड़ी आसानी से समझ में आ रहा था, बिलकुल वैसे ही जिस प्रकार मुखियाजी ने बतलाया था।
इन चित्रों के बारे में जो भी लिखा जाए, थोड़ा ही रहेगा; क्‍योंकि उनकी सुंदरता तथा खूबियत तो आपको स्‍वयं ही भीमबेटका जाकर देखनी होगी, तभी आपको भी इनके रहस्‍यों का आभास होगा। हाँ, यदि आप फोटो देखना चाहें तो आप मुझे संपर्क कर सकते हैं, मैं आपको सीडी भेज दूँगा। थोड़ा वर्णन तो फिर भी दे ही देता हूँ।
आपको जानकर खुशी होगी कि यूनेस्‍को ने इन गुफाओं और भीमबेटका को सन् 2003 में वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा देकर सम्‍मानित किया है।
जो चित्र हमने देखे वे तो बहुत ही सफाई से बने हुए थे, जिस कारण वह दृश्‍य बड़ी आसानी से समझ में आ रहा था। एक चित्र में, जो करीब 15 फीट ऊँचा तथा 20 फीट चौड़ा है, करीब 50-60 जानवरों का झुंड दिखाया गया है। इनमें ज्‍यादातर तो गाय, बैल व हिरण दिखते हैं, जो एक ही दिशा में जा रहे हैं। एक-दो गायें वापस भी जाती दिख रही हैं। सबसे पीछे एक किनारे पर दो हाथी भी दिख रहे हैं, जिनके हाथी दाँत भी एकदम साफ दिख रहे हैं। सबसे अद्भुत चीज जो कलाकार ने दिखाई है, वह यह है कि हाथी की गरदन के ऊपर एक मनुष्‍य बैठा है, जिसके हाथ में अंकुश रूप का हथियार भी है। इस चित्र से यही सारांश निकलता है कि भारतीय आदिमानव ने हाथी को पालतू बनाकर अपने काबू में करना सीख लिया था तथा उस पर बैठकर गाय-बैलों को इसी प्रकार जंगल या खेतों में चराने ले जाता था, जिस प्रकार आज की दुनिया में घोड़े पर सवार होकर अमेरिका, ऑस्‍ट्रेलिया आदि देशों में वहाँ के रहनेवाले ‘नेटिव अमेरिकन’ ‘एबओरीजिनल’ तथा विदेशी लोग उन्‍हें बड़े-बड़े मैदानों में ले जाते हैं।
सोचने की बात यह भी है कि जो दृश्‍य आप जॉन बेन के हॉलीवुड के ‘वैस्‍टर्न’ सिनेमा में घोड़े पर बैठा हुआ देखते हैं, वही दृश्‍य यहाँ की गुफाओं में देखने को मिलता है–फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ मनुष्‍य को हाथी पर सवारी करता दिखाया है और ये चित्र दस हजार साल पहले ही बनाए जा चुके थे। देखिए, इतना समय बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला!
इसी प्रकार, अन्‍य गुफाओं की पत्‍थर की दीवालों पर भाँति-भाँति से तरह-तरह के जानवर बनाए गए हैं।
एक गुफा की दीवाल पर तो एक अलग ही प्रकार के स्‍त्री-पुरुष तथा कुछ जानवरों के रूप देखने को मिलते हैं, जिसमें मनुष्‍य तो एक पतली सी सींख की भाँति दिखाया है, परंतु स्‍त्री को बीच में थोड़ा सा मोटा दिखाया है। ऐसी चित्रकला या तो किसी नवसिखुए की बनाई हुई है या किसी बहुत ही पहुँचे हुए कलाकार के द्वारा।
तरह-तरह के ये ‌चित्र देखकर मुझे वर्तमान समय की काफी प्रसिद्ध संग्रहालयों में टँगी एक-से-एक महँगी तस्‍वीरों की याद आ गई। न्‍यूयॉर्क, पेरिस, लंदन तथा दक्षिण फ्रांस व स्‍पेन में बीसवीं सदी के मशहूर पेंटर पॉब्‍लो पिकासो या सेल्‍वाडोर डॉली के बहुत सारे चित्र जो ‘सबस्‍ट्रेक्‍ट’ पेंटिंग कहलाते हैं, मेरी आँखों के सामने आ गए। एकदम यही खयाल आया कि इन प्राचीन भारतीय कलाकारों ने उतने ही सुंदर चित्र किस सफाई से इन गुफाओं की दीवालों पर अंकित किए होंगे।
मेरे विनीत विचार में तो इतने प्राचीन कलाकारों को भी सम्‍मानित करना चाहिए, क्‍योंकि हम भारतीयों के ‌लिए यह एक शर्मनाक बात है कि कला के नाम पर अश्‍लील चित्र बनानेवाले एक ‘मशहूर’ हिंदुस्‍तानी चित्रकार (जिसका नाम तो आप सब जानते ही होंगे) को तो लाखों लोग सम्‍मानित करते हैं तथा उनकी तसवीरें लाखों रुपए देकर खरीदना चाहते हैं, परंतु इतने सुंदर प्राचीन चित्र बनानेवाले अज्ञात कलाकारों के बारे में न तो कुछ जानते हैं, न उनकी कलाकारी का जरा भी आभास रखते हैं। उन कलाकारों को ऊँचा दर्जा प्रदान करने हेतु हम सभी को उनके बारे लेख या पुस्‍तकें लिखनी चाहिए और जब भी मौका मिले, एक-दूसरे को उनके बारे में बताना चाहिए।
अब सूर्य बिलकुल ही अस्‍त होने लगा था और हमारा गाइड हमें बाहर की तरफ वापस ले आया था। अंतिम आर्च के नीचे खड़े होकर हमने उसे धन्‍यवाद देकर विदा कर दिया और अपनी कार की तरफ प्रस्‍थान कर दिया। मैंने रुककर पीछे मुड़कर आखरी बार इन गुफाओं तथा चट्टानों की तरफ देखा और ‌जैसे ही वापस चलने का प्रयत्‍न किया, अचानक मेरे पैर ऐसे रुक गए जैसे किसी ने जबरदस्‍ती रोक लिया हो।
मुड़कर देखा तो मुखियाजी मेरे सामने ही खड़े नजर आए। मुझे खयाल आया कि मैंने न उनके आथित्‍य के लिए धन्‍यवाद दिया था, न ठीक से ‌विदाई ली थी। मन में बड़ी ग्‍लानि उठी, परंतु मुखियाजी स्‍वयं ही बोले, ‘‘श्रीमान जी, आप बिलकुल परेशान न होइए। धन्‍यवाद तो हमें देना चाहिए कि आपने हमारी संस्‍कृति व हमारे चित्रकारों को आदर दिया, उनकी सराहना की। ज्‍यादातर भारतवासी व विदेशी पर्यटक तो नई-पुरानी इमारतें देखने को उत्‍सुक रहते हैं और उन्‍हीं में भारत का पुराना इतिहास ढूँढ़ते हैं। देखिए, अब तक करोड़ों भारतीय या विदेशी लोगों ने हमारा नाम तक नहीं सुना है, न हमारी महत्ता को पहचाना है।’’
मैंने मन-ही-मन निर्णय लिया कि मैं भीमबेटका के बारे में अपने दोस्‍तों को तो अवश्‍य बताऊँगा। फिर मैंने मुखियाजी से प्रश्‍न किया, ‘‘इस स्‍थान को भीमबेटका क्‍यों कहते हैं ?’’ मुखियाजी तुरंत बोले, ‘‘आपने अच्‍छा प्रश्‍न किया, क्‍योंकि मैं यह रहस्‍य आपको बताने ही वाला था। जब एक अंग्रेज सर्वेयर ने इस स्‍थान को देखा था, तब उसने नजदीक के रहनेवालों से टूटी-फूटी हिंदी में इस स्‍थान का नाम पूछा। उन्‍होंने बताया कि यह जगह ‘भीम वाटिका’ है। उस व्यक्ति ने कई बार ‘भीम वाटिका बोलने की कोशिश की, परंतु साफ उच्‍चारण नहीं कर पाया तो अपनी पुस्‍तक में ‘भीमबेटका’ नाम लिख लिया। आश्‍चर्य तो यही है कि भारतीय लोग अभी तक यहाँ का सही नाम नहीं लेते हैं।’’
मुझे भी लगा कि मुखियाजी सही कह रहे हैं, क्‍योंकि अंग्रेजी भाषा में हिंदी के मुकाबले आधे ही अलफाबेट के लैटर हैं तथा मात्राएँ भी नहीं हैं, इस कारण शब्दों के सही हिंदुस्तानी उच्चारण करने में कठिनाइयाँ आती हैं। वैसे भी अंग्रेजी में लिखी पुरानी पुस्‍तकों में ज्‍यादातर शहरों के अंग्रेजी नाम हिंदुस्‍तानी नामों से अलग हैं।
मुखियाजी से और भी ढेर सारी बातें पूछने की इच्‍छा थी, किंतु उसी समय पीछे से अंकित की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘नाना जी, सब लोग कार में बैठे आपका इंतजार कर रहे हैं। अब नहीं चले तो भोजपुर शिवजी के मंदिर पहुँचते-पहुँचते और भी रात हो जाएगी।’’ मुखियाजी को मन-ही-मन नमस्‍कार कर विदा लेते हुए मैं भी उन सबके साथ वापस लौट चला।
रास्‍ते भर इस वर्ष की निराली भारत-यात्रा के विषय में ही सोचता रहा, खासतौर से मुखियाजी से संवाद के बारे में, जिससे मुझे एक नया ज्ञान प्राप्‍त हुआ। अमेरिका आकर उनके कथन पर ध्‍यान देते हुए मैंने गूगल पर और भी ज्‍यादा खोजबीन की तथा उनके बताए हुए तथ्‍य का समर्थन करनेवाली काफी चीजें मिलीं। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्‍य जो मुखियाजी ने अच्‍छे सामानों की विदेशियों द्वारा वहाँ से उठा ले जाने के बारे में बताया था, उसके विषय में एक नई किताब अभी शीघ्र ही छपी है। शैरन वैवसमैन ने 400 से ज्‍यादा पन्‍नों की यह किताब लिखी है, जिसका नाम है–‘लूट : द बैटल ओवर स्‍ट्रोलन ट्रेजर्स ऑफ द एनशियंट वर्ल्ड।’ इसमें विदेशियों द्वारा चुराए जानेवाले सामानों की सच्‍चाइयाँ बताई गई हैं। पर इसमें भी अधूरा ही वर्णन दिया है। सच तो यह है कि पश्‍चिमी देशों के जो संग्रहालय हैं या लंदन में, जो निजी या सामाजिक सामान है, वह देखा जाए तो सबकी आँखें खुली रह जाएँगी।
मुखियाजी का यह कथन भी कि स्‍वयं भारतीयों को इन गुफाओं तथा उनमें बनी कलाकारी का अभी तक ज्ञान नहीं हुआ है, ‌भी बिलकुल सही निकला, क्‍योंकि जितने भी व्‍यक्‍तियों से भारत की सबसे प्राचीन संस्‍कृति के बारे में मैंने पूछा तो एक से ही उत्तर मिले : अजंता-एलोरा, खजुराहो या फिर मोहनजोदड़ो हड़प्‍पा। एकाद लोगों ने राम-सेतु बंध का भी नाम लिया। पूछने पर भी किसी ने भी भीम वाटिका के बारे में नहीं सुना था। इस यात्रा के पूर्व मैं भी इतना ही अनजान था।
मेरा अनुरोध है कि यदि आपको मौका मिले तो प्राचीन मुखियाजी से भीम वाटिका में जो मेरा वार्त्तालाप अधूरा रह गया था, वह उनसे मिलकर अवश्‍य पूरा कर लीजिए, क्‍योंकि अब शायद आपके मन में भी हजारों प्रश्‍न उत्‍पन्‍न हो गए होंगे। हम सब आपके ‌वर्णन का इंतजार करेंगे। लीजिए, मैंने वहाँ से वापस चलते समय मुखियाजी को जो मानसिक वचन दिया था कि यहाँ का वर्णन भारतीयों तथा विदेशियों तक अवश्‍य पहुँचा दूँगा, वह अब पूरा हो गया। बाकी अब आपके ऊपर है।