संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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सम्पादकीय
नव वर्ष 2010
रेणु `राजवंशी' गुप्ता
nishved@yahoo.com
नव वर्ष 2010 नववर्ष ही नहीं, नवदशक का भी शुभारंभ है। नववर्ष का आरंभ हँसी से हो, उल्‍लास से हो–इसी कामना से ‘विश्‍वा’ संपादन मंडल ने इस अंक में होली के रंगों के साथ-साथ हास्‍य-व्‍यंग्‍य के पुष्‍प एवं नववर्ष के गीतों की कलियाँ भी चुनी हैं। इन कलियों से हमने ‘विश्‍वा’ का वर्तमान अंक सजाया है। हमें विश्‍वास है कि हमारे सुधी पाठक इस अंक का पूरा लाभ उठाएँगे एवं इस अंक को सँभालकर रखेंगे।
‘विश्‍वा’ में निखार आए, प्रकाश आए एवं उसका स्‍तर ऊँचा उठे, इसके लिए हम तत्‍पर हैं। ‘विश्‍वा’ में हो रही त्रुटियों को भी न्‍यूनतम करने में हम प्रयासशील हैं। कृपया आप अपने लेख, कहानी, कविताएँ एवं बहुमूल्‍य सुझाव भी हमें भेजते रहें।
सन् 2009 प्राकृतिक आपदाओं की दृ‌ष्‍टि से काफी शांत रहा। परंतु मानव जीवन में निरंतर तूफान आते रहते हैं। जाते-जाते सन् 2009 कुछ प्रियजनों को हमसे विलग कर गया। भारत में हास्‍य रस के ‌तीन शिरोमणि कवियों की दुखांत मृत्‍यु का भी समाचार हमने वहन किया है। परंतु सन् 2010 का सूरज स्‍पष्‍ट दिखाई दे रहा है। आपके जीवन में भी प्रकाश फैले–यही प्रार्थना है।
जनवरी-फरवरी माह मैंने अमेरिका की शीत से बचने के लिए एवं भारत की गुलाबी ठंड का आनंद लेने के लिए भारत में बिताए। इस वर्ष भारत में भी अति शीत का प्रकोप था। 25 जनवरी तक शीत पूरा रौद्र रूप लिये थी। भारत की इस ठंड के आगे अमेरिका की ठंड इतनी पीड़ादायक नहीं है। यहाँ तापमान कभी-कभी 30 डिग्री से भी कम चला जाता है तो अधिकतम 60 डिग्री तक रहा है। कल्पना कीजिए कि घर में हीटिंग न हो और पूरे समय आपको स्वेटर, मोजे, टोपी, मफलर एवं ऊनी चादर लपेटे घर के काम करने हों तो कैसे काम चलेगा, उस पर ठंडा पानी एवं कभी-कभी बिजली भी तिरोहित हो जाती है। कभी-कभी तो मैंने लोगों को कंबल लपेटे भी देखा है। दिन में धूप के लिए सब ऐसे तरसते हैं जैसे मीन पानी के लिए तरसती है। कभी-कभी तो लोग सड़क के किनारे कंबल-रजाई लपेटे आग तापते भी मिल जाएँगे। आँगन या लॉन में धूप का अंतिम छोर तक पीछा करते हैं। भारत में कड़ाके की ठंड में रहना ऐसा ही अनुभव है मानो बर्फबारी हो रही हो और घर के बाहर खड़े हों। 25 जनवरी के बाद अचानक जानलेवा ठंड गुलाबी-गुनगुनी धूप में परिवर्तित हो जाती है। यह मौसम हम अमेरिकावासियों के लिए अति मन भावन होता है। हमने अपनी यात्रा में मौसम के अनेक रंग देखे, दिल्ली में जहाँ ठंड सिकुड़ रही थी, वहीं गोवा के बीच (समुद्री तटों) पर मौसम उष्णता के यौवन से गदराया हुआ था। कोट से लेकर बिकनी तक का आनंद तन उठा सकता था।
कुछ भी कहें, यह तो मानना ही होगा कि भारत विविधताओं का देश है—वेश-भूषा, खान-पान, बोल-चाल, पर्व-त्योहार, सभी कुछ प्रत्येक स्‍थान पर नया मिलता है। अब भोजन का उदाहरण ही लें। भारत के बाहर रहने वाले व्यक्‍ति के लिए मात्र ‘भारतीय खाना’ ही है। परंतु गोवा में एक रेस्‍त्राँ के बाहर नाम-पट्ट पर यूँ लिखा हुआ था—गोवन (गोवा का), जैन, गुजराती, पंजाबी, दक्षिण भारतीय, चाइनीज, कॉन्‍टिनेंटल एवं इंडियन खाना (फूड) यहाँ मिलता है। अब इसे हम विविध रंग मानें या मूढ़-मस्‍तिष्क का नमूना मानें? यह तो वही बात हुई कि भारत में बौद्ध, जैन, सिख, दलित, वनवासी, मुस्‍लिम, ईसाई एवं हिंदू रहते हैं एवं तथाकथित राजनेता ने यह नारा दिया था—
मुस्‍लिम-दलित भाई-भाई।
हिंदू कौम कहाँ से आई ?
इस नारे को पढ़कर दीवार पर अपना सिर फोड़ने का मन हुआ।
भारत की विविधता को हम नकार नहीं सकते हैं। भारतीय संस्कृति के इंद्रधनुष का मूल रंग तो एक ही है, परंतु विविध रंगों का आभास देता यह मनोरम एवं मनभावन दीखता है।