संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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फिल्मी गीतों में होली कहाँ-कहाँ? चलिए याद करें
लावण्‍या शाह

ऐसे बेदाग चेहरे पे, गुलाल मल दिया जाए
होली आई रे होली आई रे!

फिल्‍म ‘नवरंग’
नव रंग 9 रंग और नया रंग भी!

भविष्‍य पुराण, नारद पुराण, गृह्य सूत्र तथा जैमिनीय पूर्व मीमांसा सूत्रों में ‘होली-उत्‍सव’ का सर्वप्र‌थम वर्णन आया है। चलिए, प्राचीन काल में झाँकें–
हिरण्‍यकशिपु राक्षसराज ईश्‍वर का अस्‍तित्‍व नकारते हुए दिन-रात कुकर्म में निमग्‍न है, जबकि उन्‍हीं का पुत्र बालक प्रह्लाद अत्‍यंत पवित्र हृदय का ईश्‍वर का परम भक्‍त है।
पिता द्वारा अनेक अत्‍याचार और रोष करने पर भी प्रह्लाद की भक्‍ति अडिग रहती है। तब खीझकर पिता हिरण्‍यकशिपु बुआ ‘होलिका’ को आदेश देते हैं कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्‍नि में प्रवेश करे और बैठ जाए।
जबकि उसे पता था कि होलिका को वरदान प्राप्‍त था कि अग्‍नि होलिका को जला नहीं सकती।
राजाज्ञा का पालन हुआ। होलिका अग्‍नि में जा बैठी और गोद में ईश्‍वर नाम स्‍मरण करते बालक प्रह्लाद भी बैठे!आश्‍चर्य!
होलिका की बुरी नीयत वरदान को झुठलाती हुई उसे जलाकर भस्‍म कर गई, जबकि प्रह्लाद को तो कुछ भी नहीं हुआ।
नारायण का नाम स्‍मरण करते हुए भक्‍त प्रह्लाद ने पाप पर पुण्‍य के विजय की कथा पुनः दुहराई।
भारत में इसी कथा को याद करते हुए महिलाएँ पूर्ण चंद्र ‘राका’ की साक्षी में अपने परिवारों की सुरक्षा व खुशहाली के ‌लिए पूजा करती हैं। ग्राम-प्रांत हों या शहर, अग्‍नि प्रज्‍वलित कर उसमें नारियल, खील, बतासे, कुंकुम, अक्षत का भोग लगाकर आ‌हुति दी जाती है और नारियल की गिरी का प्रसाद खाकर असत्‍य पर सत्‍य की विजय का उत्‍सव ‘होलिका-दहन’ मनाया जाता है।
दूसरे दिन सुबह से अबीर, गुलाल (जो कभी-कभार इत्र से मिलाया हुआ भी होता है) भाल पर टीका लगाकर और गालों पर गुलाल मलकर भारतीय लोग रंगों की होली खेला करते हैं।
साथ में मूँग की दाल के गरम पकौड़े, गुझिया, ठंडाई, तरह-तरह के पकवान और मिठाइयाँ भी हँसी-मजाक भरे माहौल में खाई जाती हैं।
लोग ढोलक पर थाप देते हुए नृत्‍य-गीत से समाँ बाँधते हैं और होली रंगीन पानी, ऑयल कलर तथा तरह-तरह के रंगों से मनाई जाती है। रंग छुड़ाने नदी या समुंदर में स्‍नान किया जाता है, पर कई बार रंग चढ़ा रहता है और कुछ दिनों बाद ही छूटता है।
यह प्रथा भारतीय मूल के लोग जहाँ भी गए, जैसे–सूरीनाम, मॉ‌रिशस, जावा, सुमात्रा, फीजी, श्रीलंका, इंडोनेशिया, यूरोप और अमेरिका, वहाँ भी अब भारतीय लोग इसे मनाने लगे हैं। इस प्रकार ‘होली’ अब एक विश्‍वव्‍यापी त्‍योहार बन चुका है।
बसंत के आगमन के साथ, गुनगुनी धूप और खुशनुमा वातावरण होली के त्‍योहार को और भी रंगीन बना देता है।
हिंदी फिल्‍मों में गीतों के माध्‍यम से होली के उत्‍सव को खूब प्रचार-प्रसार मिला। होली से जुड़े कई फिल्‍मी गीत आपके जहन में इस वक्‍त उभर रहे होंगे। चलिए याद करें।
फिल्‍म ‘नवरंग’ का यह गीत, नायिका उलाहना देती है, ‘अरे जा रे हट नटखट, ना छू रे मेरा घूँघट, पलट के दूँगी आज तुझे गाली रे, मुझे समझो ना तुम भोली भाली रे’, तो नायक खिलंदड़े स्‍वर में पलटकर गाता है, ‘आया होली का त्‍योहार, उड़े रंग की बौछार, तू हे नार नखरेदार मतवाली रे, आज मीठी लगे रे तेरी गाली रे’!
लोकगीत और लोकदृश्‍य यहाँ कितने सजीव हो उठे हैं।
फिल्‍म ‘मदर इंडिया’ के गीत में ‘होली आई रे कन्‍हाई, रंग छलके, सुना दे जरा बाँसुरी’ हमारे प्रिय कन्‍हैया को, जन-मन के संग, नृत्‍यरत पाते हैं तो फिल्‍म ‘गोदान’ का कलावती राग आधारित गीत ‘बिरज में होरी खेलत नंद लाला’ भी ब्रजभूमि की लट्ठमार होली की याद दिलाता है।
फिल्‍म ‘फागुन’ में नायिका ‘पिया संग खेलूँ होली’ की चाहत में रंगों के खेल में निमग्‍न है, तो फिल्‍म ‘आखिर क्‍यूँ’ में ‘सात रंग में खेल रही है, दिलवालों की होली रे’ का समूह गान दरशाया गया है।
फिल्‍म ‘कटी पतंग’ में ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली’ हमजोलियों का मस्‍ती भरा गीत उभरता है।
अन्‍य कई गीत हैं, जिनके मुखड़े याद आ रहे हैं, ‘तन रंग लो जी, आज मन रंग लो’ और ‘होलिया में उड़े रे गुलाल’ और ‘लाई है हजारों रंग होली’ जो लोक त्‍योहार होली का एक और रूप ‘फगवा’ याद दिलाते हैं।
‘जय-जय शिव शंकर, काँटा लगे ना कंकर, एक प्‍याला तेरे नाम का पिया’ गीत होली के संग जुड़ी एक और प्रथा ठंडाई और भाँग पीने का दृश्‍य उजाकर करते हैं, जहाँ राजेश खन्‍ना और मुमताज भंग के रंग में डोलते-भागते, धूम मचाते हैं। सन् 1970 में ‘होली आई रे’ नाम से पूरी फिल्‍म बनी। जिसका संगीत कल्‍याणजी आनंदजी की जोड़ी ने दिया था।
फिल्‍म निर्माता यश चोपड़ा ने अपनी कई फिल्‍मों में होली के दृश्‍य प्रस्‍तुत किए हैं।
फिल्‍म ‘मशाल’ गीत : ‘होली आई, होली आई, देखो होली आई रे’ फिल्‍म ‘डर’ में गीत : ‘अंग से अंग लगाना सजन, मोहे ऐसे रंग लगाना’, फिल्‍म ‘मोहब्‍बतें, गीत : ‘सोहनी सोहनी अँखियोंवाली’ गीत दरशाए थे, परंतु सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्‍म ‘सिलसिला’ का गीत ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे’, जिसे डॉ. हरिवंश राय बच्‍चनजी ने लिखा है और उनके सुप्रसिद्ध अभिनेता पुत्र अमिताभ बच्‍चनजी ने अपनी प्रेयसी बनीं सिनेतारिका रेखा के साथ होली के उत्‍सव में, जहाँ हँसी-ठट्ठा, मजाक-मस्‍ती का संगम निहित है, बखूबी परदे पर निभाया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। आनेवाले समय में शायद यही सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना रहेगा।
ऐसे भी भारत में 25 साल पहले और आज ‘होली’ का रूप बदला है। फिल्‍में समाज का दर्पण तो कभी आनेवाले समय का आईना दिखलाती हैं।
फिल्‍म ‘गाईड’ में एक गीत में कुछ पंक्‍तियाँ होली पर ली गईं ‘आई होली आई, सब रंग लाई, बिन तेरे होली भी ना भाए, हाए,’ गीत लताजी के स्‍वर में भीगा रस विभोर करने में सफल हुआ।
फिल्‍म ‘आप बीती’ में हेमा मालिनी ने गाया ‘नीला, पीला, हरा, गुलाबी, कच्‍चा-पक्‍का रंग डाला रे मेरे अंग-अंग’ तो कई रंग बिखरकर निखर गए।
‘फूल और पत्‍थर’ में गीत : ‘लाई है हजारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए’ का संदेशा गूँजा।
फिल्‍म ‘कोहिनूर’ में गीत ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ की गुहार उठी, लेकिन सुमधुर गायिका लताजी और स्‍वप्‍न सुंदरी कहलानेवाली हेमा मालिनी ने मिलकर ‘शोले’ फिल्‍म का गीत ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं, गिले शिकवे भूल करके सभी, दुश्‍मन भी गले मिल जाते हैं’ को बाजी मारने का मौका दिलाया।
असल जिंदगी में नायक धर्मेंद्र और हेमा का साथ भी इसकी सफलता का एक कोण ‌था, जिसे फिल्‍म ‘राजपूत’ में दुबारा वही

मस्‍ती उभारने का मौका दिया गया गीत था, ‘भागी रे भागी रे ब्रजबाला, कान्‍हा ने पकड़ा रंग डाला’, परंतु ‘शोले’ फिल्‍म के सामने इसका रंग फीका पड़ गया।
फिल्‍म ‘बागवान’ के निर्माता रवि चोपड़ा ने अमिताभ और हेमा मालिनी को गीत दिया, ‘होली खेले रघुबीरा, अवध में में होली खेले रघुबीरा’, जो काफी पसंद किया गया।
फिल्‍म ‘कामचोर’ में जया प्रदा ने माँग की, ‘मल दे गुलाल मोहे के आई होली आई रे’ तब फिल्‍म ‘जख्‍मी’ में सुनील दत्त ने उदास स्‍वरों में गाया कि ‘दिल में होली चल रही है’।
फिल्‍म ‘धनवान’ में ‘मारो भर-भर पिचकारी’ की पुकार हुई। फिल्‍म ‘इलाका’ में माधुरी ने ऐलान किया कि ‘आई है होली’।
‘मंगल पांडे’ में आमिर खान पर फिल्‍माया गीत भी होली से संबंधित है।
अमिताभ का एक और गीत ‘खई के पान बनारसवाला’ भी होली के त्‍योहार की मस्‍ती का एक अनूठा रंग लिये है।
किंतु आज की युवा पीढ़ी अक्षय और प्रियंका पर फिल्‍माया फिल्‍म ‘वक्‍त’ का गीत ‘डू मी ए फेवर, लेट्ज प्‍ले होली’ होली के उत्‍सव को 21वीं सदी के मुहाने पर ले आया।
हिंदी फिल्‍मों में होली पर आधारित सर्वप्रथम गीत फिल्‍म ‘ज्‍वार-भाटा’ में निर्माता स्‍व. अमिय चक्रवर्तीजी ने फिल्‍माया था। जिसमें दिलीप कुमार ने सबसे पहली बार हिंदी फिल्‍म के रुपहले परदे पर बतौर एक नायक के रूप में काम शुरू किया था और वह ऐतिहासिक समय था सन् 1944 का। आपको यह भी बतला दूँ कि फिल्‍म ‘ज्‍वार-भाटा’ के लिए कई गीत मेरे पिताजी स्‍व. पंडित नरेंद्र शर्माजी ने ही लिखे थे।
आज 2010 की होली के इस रंगारंग व पावन उत्‍सव पर आप को गुलाल और अबीर का शुभ तिलक लगाकर हम आपकी होली रंगीन हो और जीवनाकाश पर सदा इंद्रधनुष छाया रहे, यही कामना करते हैं।