संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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हास्‍य कविताओं की तरंगें
माइक से प्‍यार

सुरेश शर्मा


कुछ दिनों से मुझे माइक से प्‍यार हो गया है
दोस्‍तो! अब यह भोंपू ही मेरा यार हो गया है
बोलने के बाद तालियाँ बज जाएँ तो जोश बढ़ता है
जितनी जोर से बजे उतना ही ज्‍यादा नशा चढ़ता है
ताली न बजे तो समझ लो कि श्रोता नासमझ हैं
ऊँची बात झेल नहीं पाते वे कम समझ हैं
पते की बात कहने को दस मिनट का समय कम है
घंटी बीच में ही बज जाए इसका बड़ा गम है।


शशिभूषण त्‍यागी, दिल्‍ली


: 1 :
सास को घर आई देख
बहू बोली, ‘‘बुढ़िया, तेरी
दाल यहाँ नहीं गलेगी’’
सास ने सोचा, या तो
पानी खराब होगा
या कच्‍ची रहेगी या जलेगी।
सास बोली, कोई बात नहीं
सब तरह निभा लूँगी
तेरी बनाई तो गलेगी
वो ही खा लूँगी।

: 2 :
मेरी पत्‍नी ने जाकर
अपनी माँ से करी शिकायत
‘‘अम्‍मा, इनके कानों पर तो
नहीं रेंगती जूँ तक’’
माँ बोली, ‘‘बेटी, हाय-हाय,
क्‍यों इतनी बरस रही है,
मेरी बेटी होकर तू,
जूँ को तरस रही है।
आने दे दामाद को
अपने पास बिठाकर
उसका सिर अपने सिर से
थोड़ी देर भिड़ाकर
फिर देखें, कैसे उसके
सिर में जूँ न रेंगे,
हम माँ बेटी के तो इतनी
उसके मुँह तक भर देंगे।
और याद कर बेटी,
जब तेरा ब्‍याह किया था
मैंने तुझको दहेज में
और दिया ही क्‍या था।’’



बिल गेट्स

देवेंद्र शुक्‍ल, सैन फ्रांसिस्‍को, कैलिफोर्निया


माइक्रोसॉफ्ट के प्रेसीडेंट हैं मिस्‍टर बिल गेट्स
नई-नई कंपनियों का नित मर्जर करते गेट्स
युवकों के अरमान और आदर्श बने बिल गेट्स
हर अमरीकी नौजवान बनना चाहे बिल गेट्स
विंडो देकर कंप्‍यूटर का किया बहुत कल्‍याण
घर-घर विंडो बिन विंडो के चले ना कोई काम
पूछें एक सवाल ‘गेट’ जी समझ ना आए हमको
नाम आपका गेट बनाते हैं विंडो

अमरीका के लड्डू


अमरीका में हमको आए अपने ऊपर हँसी
भारत में साहब थे अमरीका में चपरासी
चौका-बरतन और रसोई करते अपने हाथ
ड्राइवर भी हम माली भी हम धोबी-नाई साथ
भारत से अमरीका आए भाग्‍य हमारा ओछा
अपने ही हाथों झाड़ू और लगाया पोंछा
सावन के अंधे को जैसे हरा-हरा ही सूझे
अमरीका में दीवाने सब हरे रंग के पीछे
हरे रंग के डॉलर देखो कैसा इसका जलवा
ग्रीन कार्ड के लिए मचा है रोज यहाँ पर बलवा
अमरीका है ऐसा लड्डू जो भी इसको खाए
खाए सो पछताए और जो ना खाए पछताए।


ठेंगा

कांति प्रकाश, गाजियाबाद (यू.पी.)


जब तक था उनको काम, पैरों
का छूते थे वो अँगूठा
अब मतलब निकल गया, तो
दिखा रहे हैं वो अँगूठा
अँगूठे को, आम भाषा में
कहते हैं ठेंगा
नहीं मालूम, कौन किसको
दिखाता ठेंगा?

औरत व आदमी की, पहचान
करता रहा है ठेंगा
किसी को बाएँ हाथ का
लगाना पड़ता ठेंगा
किसी को दाएँ हाथ का
लगाना पड़ता ठेंगा
अदालत में पढ़े-लिखों को
लगाना पड़ता ठेंगा?

जो हैं बिलकुल अँगूठा छाप
वही हैं, आज के माई-बाप
अगर वे पैरों का भी लगाए
तो भी उनकी ही जमेगी धाक

भूख से व्‍याकुल पुत्र
चूस रहा है अँगूठा
इसीलिए गुरु ने
गुरुदक्षिणा में माँगा अँगूठा
एकलव्‍य ने, काट पैरों
में रखा अँगूठा
वन-वन भटका बेचारा लिये
कटा अँगूठा
गुरु ने अगर न माँगा
होता उसका अँगूठा
हस्‍तिनापुर द्रोण को
अवश्‍य दिखाता अँगूठा
चक्र चलाते हुआ घायल
कृष्‍ण अँगूठा
साड़ी वस्‍त्र से
द्रौपदी ने रक्‍त को रोका

अगर ऊपर उठाया ठेंगा, तो
जीत समझो
अगर झुका दिया ठेंगा, तो
हार समझो
पकड़नी है कोई चीज, काम
आ रहा ठेंगा
आपके दृढ़ इरादे, बता
रहा है ठेंगा
कार्यालयों में
उपस्‍थि‌‌ति दिखा रहा ठेंगा
मिलेगा नहीं वेतन, यदि
नहीं दिखाया ठेंगा
विद्युत धारा समझाने
में काम आता ठेंगा
दुनियाँ के अच्‍छे-बुरे
काम कराता ठेंगा
कहीं कोई दिखा रहा है ठेंगा
कहीं कोई लगा रहा है ठेंगा
कही कोई बजा रहा है ठेंगा
कहीं कोई कटा रहा है ठेंगा
न होता अँगूठा, तो कैसे
बजती चुटकी
चुटकी भर नमक, फिर क्‍यूँ
माँगे छुटकी
बिना अँगूठे, दुलहन
कैसे पहनाती अँगूठी
बिना अँगूठी बदले शादी
फिर होती अनूठी।

मोटापा : एक वरदान

डॉ. नीलू गुप्‍ता, कैलिफोर्निया



मन रहता था मेरा बहुत अशांत
रहती थी मैं बहुत क्‍लांत
मिला है मुझे यह वरदान या अभिशाप
सहसा हुआ मुझे अहसास कहना अभिशाप तो होगा पाप

मिला है मुझे यह वरदान
तो क्‍यों न करूँ मैं इसका बखान
आप हों न हों मैं तो हूँ इसकी कद्रदान
हाथ कंगन को आरसी क्‍या भाईजान

स्‍थूलकाय होना तो है बड़ा भारी सम्‍मान
हम तो हैं सत्‍यवादी हरिश्‍चंद्र की संतान
जो हम खाते वही दिखाते न हम लजाते
न हम शरमाते न हम छिपकर खाते

स्‍थूलता तो हमने है विरासत में पाई
डॉक्‍टर कहते हैं यह हैरिडिटरी है आई
पर हमने दूध-मलाई और रबड़ी भी है खूब खाई
रसगुल्‍ला चमचम और रसमलाई की प्‍लेट पर प्‍लेट उड़ाई
कैलोरीज की गिनती भी तो न हमें कभी आई
न माँ न माँ की माँ नानी कभी हमें सिखा पाई

हुआ यों कि बचपन में खाने चले थे नानी संग प्रीतिभोज
लड्डू पूरी और कचौरी से सजी हुई थी मेज
नानी का जी ललचाया नानी ने जी भरकर खाया
बस फिर क्‍या था नानी का जी खूब ही घबराया


अवसर पा मैं नानी से बोली–खा लो एक चूर्ण की गोली
नानी मुझ पर खूब ही बिगड़ी और गुस्‍से से बोलीं
अरी अगर खाने की होती जगह गोली तो फिर
क्‍यों न खाती मैं एक ‌बढ़िया सा लड्डू और

लड्डू कह नानी का जी फिर ललचाया
अरे नानी कुछ तो करो कैलोरीज का ध्‍यान, मैंने समझाया
नानी फिर बिगड़ीं और गुस्‍से से लाल फिर मुझसे बोलीं
कहे देती हूँ इस मुई कलोरी के चक्‍कर में न तू आना
तू तो है खाते पीते घर की संतान, है तू कुल की शान
तुझ से ही तो है कुल की पहचान इसी से तो है हमारा सम्‍मान
मैंने नानी की बात गाँठ बाँध ली और परिणाम आपको आ दिखाया

लाइन लगाकर हम थे खड़े, साथ खड़े थे एक क्षीणकाय से काका
देख रहे थे होकर मुझको हक्‍का-बक्‍का मैंने जो ली साँस लगा उन्‍हें धक्‍का
मुँह के बल गिरे दाँत हुए उनके चक्‍का-चक्‍का
मैंने धीरे से उन्‍हें उठाया और कहा मैंने तो साँस ली थी नहीं दिया था धक्‍का
हँसकर बता स्‍थूलता के कुछ नुस्‍खे किया उन्‍हें मैंने रफा-दफा

भीड़ में हम जब कहीं भी जाते लोग हमें देख रास्‍ता छोड़ हट जाते
क्‍योंकि पड़ जाए हमारा मुक्‍का तो वह सँभल नहीं पाते
फायदे तो हैं और अनेक जब भी कार में हम संग सभी के जाते
सैंडविच बने कोई पीछे हम तो आगे की सीट पर धर जाते
क्‍योंकि हम फिट बस वहीं पर आते और कहीं तो हम बैठ ही नहीं पाते

सौ दो सौ किलो वजन उठाए तो हम ऐसे घूमते
जैसे वीर हनुमान पर्वत उठाए घूमते
कहाँ तक गिनाएँ फायदे इसके, कोई बनाता है हिंदू समाज
बनाता है आर्य समाज, ब्राह्मण समाज और बिहार समाज

आओ क्‍यों न हम भी मिलकर बनाएँ एक स्‍थूल समाज
आइए हो जाइए इसमें जल्‍दी भरती, हो न जाए जल्‍द बंद भरती
अमेरिका में बाजार स्‍थूलों का गरम है, हर दूसरा आदमी स्‍थूल है
आप भी अब ध्‍यान से सोचिए आइडिया हमारा माकूल है।


होली का हंगामा


होली-होली-होली, होली खेल रहे हैं रंग-बिरंगी होली
गली-गली और बना-बनाकर अपनी-अपनी टोली।

न कोई ताला न कोई कुंडी
होली में होती है सबकी पौ बारह
शादीशुदा हो या कोई क्‍वारा
न किसी का घर न किसी का द्वारा

न कोई ताला न कोई ताली
होली खेल रहे हैं जीजा और साली
अरे साली भी तो है अलबेली
छैल छबीली और मतवाली
जीजा की साली आधी घरवाली

नाकों चने चबाएँ फिरकी सा नाच नचाएँ
अबकी बरस खेली सो खेली अब न
खेलूँ होली जीजा फिर यूँ पछताए
मतवारा जीजा कैसे जान बचाए समझ न पाए

अब तक खिड़की से जो झाँक रहे थे
आँखों से जो प्‍यार की फेंक रहे थे गोली
न कोई रोका न कोई टोका अब खेल रहे थे
उनके संग वे खुल्‍लमखुल्‍ला होली

सबसे ज्‍यादा उछल-उछलकर खेल रहा था देबू पड़ोसी गंजा
आखिर रिश्‍ते में देवर लगता था लड़ा रहा था भाभी संग पंजा
छकाछक छकाछक पिला दिया भाभी ने फिर भाँग और गाँजा
बस चारों खाने चित्त भूल गए सब पंजा-वंजा देबू गंजा

चंगुल से न कोई बच पाता जब होता होली का हंगामा
टुकड़े-टुकड़े हो जाता फिर उनका कुरता-धोती और पाजामा।