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कविता
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| डॉ. केदार वर्मा का हास्य संसार |
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केदारजी व्यवसाय से डॉक्टर हैं। वे लंबे समय से कविता लेखन में रत हैं, परंतु सामने कम ही आते हैं। केदारजी की कविता आरंभ होती है सामान्य कविता की तरह, परंतु अंत तक पहुँचते-पहुँचते गहरे व्यंग्य की पैनी छुरी हो जाती है। श्रोताओं को लंबे समय तक हँसाती रहती है। केदारजी मूलतः बिलासपुर के रहनेवाले हैं। लंबे समय से सिनसिनॉटी ओहायो में रह रहे हैं। प्रस्तुत है उनकी हास्य रचनाएँ।
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अपनी-अपनी ‘रीजनिंग’ एक दंपती की अजीब सी ध्यानाकर्षिता अपूर्व सी जोड़ी थी, पति साढ़े 6 फुटिया, बीवी 4 फुट की, बड़ी छोटी थी।उत्सुकतावश पार्टी की गैदरिंग में, एक मित्र ने पूछा, आप लोगों की लंबाई में इतना अंतर, शादी को ऐसा क्या सूझा?पत्नी ने मुसकराकर देखा, फिर कहा, सुनिए जनाब, पति हमेशा सिर झुकाकर और आँखें नीची कर बात करे। यही था मेरा ख्वाब। जब मित्र ने पति की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से निहारा, तब पति ने कहा, पत्नी के छोटी कद की तरफ करके इशारा।मानो या न मानो, मगर बात यही सच्ची है, मुसीबत जितनी छोटी हो, उतनी ही अच्छी है। आशा मेरा मालिक बड़ा निर्दयी, एक गधे ने दूसरे से अपना दुखड़ा रोया। अल्पाहार, और हर आधे घंटे में डंडे की मार, इसके बावजूद, तिगुने वजन का बोझा मैंने ढोया।।तो एक दिन, मौका देख दूर भाग जाओ, दूसरा गधा बोला। भाग तो जाऊँ, मगर एक आशा में यह नर्क झेल रहा हूँ मित्र, पहले ने अपना राज खोला।। मालिक की नवयौवना लड़की, है बड़ी ही खूबसूरत। लगता है भगवान ने बड़े फुरसत में गढ़ी है उसकी मूरत।। जब कभी वह करती शरारत, तब मालिक गुस्सा कर कहते हैं कि मारूँगा। और तब भी नहीं सुधरी तो एक दिन इस गधे से तेरी शादी कर दूँगा।।गठिया (अरतहरतिसि) पार्क के बेंच पर बैठे पादरी की शांति हुई भंग, जब एक शराबी आकर बैठ गया उसके संग।पादरी ने किया मुआयना उस विचित्र का, जो आ बैठा पास, आँखें लाल, मुँह से बदबू, फटे कोट की जेब से छलकती बोतल, हालत बदहवास।शराबी अपनी धुन में मस्त, एक लंबी सी, ली खट्टी सी डकार, फिर पास पड़े जमीन पर से उठाकर, पढ़ने लगा किसी का छोड़ा हुआ अखबार।पादरी नाक में लगाए रूमाल, आकाश की तरफ रहे निहार, सोचते, इस निकृष्ट प्राणी का भगवन्, कैसे होगा उद्धार?थोड़ी देर बाद अचानक, यह गठिया रोग कैसे और किन कारणों से होता ? शराबी ने पादरी ने पूछा। कुढ़े हुए पादरी ने हेठी से उसको देखा, और दिया जवाब बड़ा ही रूखा।शराब पीना, चोरी-चकारी, लड़कीबाजी, टेन कमांडमेंट्स को भूल, जो भगवान को छलते हैं, उनसे होती आर्थराइटिस, गठिया का दुख, कि शरीर के जोड़-जोड़ में सूजन और दर्द उतरते हैं।हे भगवान कहकर, शराबी ने आह भर ली, वह चुप हो गया और धीरे से आँख बंद कर ली।पादरी को हुई ग्लानि और फिर थोड़ा बहुत हुआ पछतावा, कि इस गठिया दर्द से परेशान बिचारे को व्यर्थ में हड़काया।जबान में भरकर मिठास, थोड़ी देर बाद, बड़े अपनेपन से पादरी बोला, बेटे, कितने लंबे अरसे से, तुमने यह गठिया का महान दुख है झेला?मैं शराबी चौंका, मुझे कुछ नहीं हुआ, मेरी तो मस्ती के हैं संजोग, अभी पढ़ी मैंने खबर अखबार में, कि पोप को डायग्नोस हुआ गठिये का रोग।आशामय साल दो हजार दस आता नूतन वर्ष, बिखरा चहुँओर हर्ष कहीं पार्टी, नाच-संगीत और सोमरस कहीं प्रार्थना कि हो विश्व-शांति, मानवता का उत्कर्ष काल मंच पर अपनी भूमिका निभाने, आता साल दो हजार दस।बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, मगर वाल-स्ट्रीट में बँटते बोनस इधर H1N1फ्लू फैलता, उधर आतंकवादी तुले करने तहस-नहस मगर हिम्मत रख, मत समझ अपने को लाचार, कमजोर और बेबस कर्तव्यनिष्ठ हो, सन्मार्ग पर चलता रह अडिग, होकर चौकस धैर्य बँधाने, आशान्वित करने को आया साल दो हजार दस।लोग जाते वैटिकन, मक्का, अमृतसर या बनारस पुण्य कमाने, शांति पाने या करने प्रभु दरस मगर जब तक निकले नहीं अंतर्मन का भरा तमस मानव जीवन रहेगा वैसा ही दुखमय और नीरस शाश्वत सुख के लिए, तज अहंकार, कहता साल दो हजार दस।नए साल की शुभकामनाएँ, जीवन आपका रहे सरस मिले सुख, शांति, समृद्धि सुस्वास्थ्य और जस विश्व में संवेदना, करुणा और उदारता की हो बरस ‘ विश्वा’ की तरफ से मुबारक हो, साल दो हजार दस।
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