|
|
|
कविता
|
| होली की फुहार |
होली होली की होती थी, महीनों तैयारियाँ घर-घर में होती लिपाइयाँ, पुताइयाँ भाभी व देवर की मस्त ठिठोलियाँ जीजा पर वार करनेवाली सालियाँ समधी को समधन की गालियाँ होली-दहन पर गेहूँ की बालियाँ फगवा गायकों की अनेक टोलियाँ बच्चे-बूढ़ों के हाथ में पिचकारियाँ बसंत का अंत, शुरू हुई दूरियाँ गले मिलकर दूर कर लो दूरियाँ दूरियाँ बन जाएँगी अब नजदीकियाँ कोयल कूकेगी, मना लो रँगरलियाँ होली पर हुआ करता था प्यार-दुलार का मिलन रंजिश, गिलवे-शिकवे मिटने, मिटाने का मिलन अबीर गुलाल लगाने का चलन रंग डालकर सोहार्द व प्यार दिखाने का चलनअब होली का बन गया है हुड़दंग दादा पोता मिलकर घोंटें भंग पीकर भंग कर रहे जंग कैसे रिश्ते हो गए बदरंग कीचड़ सस्ती महँगे हुए रंग होली के बहाने मरोड़ें अंगकुछ दिखाते तरह-तरह के स्वाँग निकाल रहे गुब्बार पीकर भाँग सभ्यता की करेंगे सीमा पार उगलेंगे ये विष के अंबार अब होली तो बन गया है, रंजिश निकालने का त्योहार होली का बहाना लेकर ही कालिख पोतने का त्योहारदारू पीकर हुए बेहाल होली का कैसा बुरा हाल कहाँ गया अबीर व गुलाल मिट्टी ही बन गया गुलालपुरानी बातें अब बन गईं पहेलियाँ कहाँ गईं वो बचपन की सहेलियाँ टेसू के रंगों को तरस रही हथेलियाँ न लालाजी कहनेवाली भोजियाँ।
|
|
|