संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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कविता
होली की फुहार
डॉ. के. पी. त्‍यागी
होली


होली की होती थी, महीनों तैयारियाँ
घर-घर में होती लिपाइयाँ, पुताइयाँ
भाभी व देवर की मस्‍त ठिठोलियाँ
जीजा पर वार करनेवाली सालियाँ
समधी को समधन की गालियाँ
होली-दहन पर गेहूँ की बालियाँ
फगवा गायकों की अनेक टोलियाँ
बच्‍चे-बूढ़ों के हाथ में पिचकारियाँ
बसंत का अंत, शुरू हुई दूरियाँ
गले मिलकर दूर कर लो दूरियाँ
दूरियाँ बन जाएँगी अब नजदीकियाँ
कोयल कूकेगी, मना लो रँगरलियाँ
होली पर हुआ करता था
प्‍यार-दुलार का मिलन
रंजिश, गिलवे-शिकवे
मिटने, मिटाने का मिलन
अबीर गुलाल लगाने का चलन
रंग डालकर सोहार्द व
प्‍यार दिखाने का चलन

अब होली का बन गया है हुड़दंग
दादा पोता मिलकर घोंटें भंग
पीकर भंग कर रहे जंग
कैसे रिश्‍ते हो गए बदरंग
कीचड़ सस्‍ती महँगे हुए रंग
होली के बहाने मरोड़ें अंग

कुछ दिखाते तरह-तरह के स्‍वाँग
निकाल रहे गुब्‍बार पीकर भाँग
सभ्‍यता की करेंगे सीमा पार
उगलेंगे ये विष के अंबार
अब होली तो बन गया है,
रंजिश निकालने का त्‍योहार
होली का बहाना लेकर ही
कालिख पोतने का त्‍योहार

दारू पीकर हुए बेहाल
होली का कैसा बुरा हाल
कहाँ गया अबीर व गुलाल
मिट्टी ही बन गया गुलाल

पुरानी बातें अब बन गईं पहेलियाँ
कहाँ गईं वो बचपन की सहेलियाँ
टेसू के रंगों को तरस रही हथेलियाँ
न लालाजी कहनेवाली भोजियाँ।