संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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उत्तर प्रदेश की होली
सुरेंद्रनाथ ‘नूतन’
‘नूतन’ जी हिंदी कविता, गीत, गजल में जाना-पहचाना नाम है। वर्षों कवि मंच से जुड़े रहने के पश्‍चात् अब प्रयाग (इलाहाबाद) में साहित्‍यिक समाज से जुड़े हुए हैं। निरंतर साहित्‍य-सृजन में लगे हुए हैं। नूतनजी की कलम से झलकारी (झाँसी की रानी लक्ष्‍मीबाई की सैनिक) एवं अमर शहीद मंगल पांडे पर काव्‍य लिखे गए हैं, जो कि हिंदी साहित्‍य को उनकी अनुपम भेंट है। प्रस्‍तुत हैं, उत्तर प्रदेश की होली परंपरा पर उनका लेख।
उत्तर प्रदेश भारत के कुछ बड़े प्रदेशों में से एक है। जिसकी सांस्‍कृतिक धरोहर अक्षुण्‍ण है। यहाँ का त्‍योहार, जिसे रंगों का त्‍योहार कहा जाता है, राधाकृष्‍ण के शृंगार रस से ओत-प्रोत है। प्रेम व शृंगार रस की धार जो भगवान कृष्‍ण ने बहाई, वह इस प्रदेश की जनचेतना को आदि से आज तक सराबोर किए हुए है। इस त्‍योहार का रंग केवल सांसारिक न होकर अध्‍यात्‍म में डूबा है। कृष्‍ण के प्रतीक से जो राधारानी तथा गोपियों ने ब्रज मंडल में प्रेम व समर्पण का आदर्श रखा, वह आज भी जन-जन के मानस को भिगो रही है। इस त्‍योहार को मनाने का स्‍वरूप व जो परिपाटी इस प्रदेश में प्रचलित है, हम उसे तीन मुख्‍य खंडों में देखते हैं। इसमें अग्रणी ब्रजमंडल की होली है, जो गोकुल से लेकर बरसाने तक फैली है और जिसमें गोपियों का सौंदर्य तथा ग्‍वालों का उनके प्रति समर्पण इतना रससिक्‍त है कि शृंगार रस सजीव स्‍वरूप धारण कर लेता है। भगवान कृष्‍ण इसके नायक हैं और राधिका, जो भक्‍ति स्‍वरूपा हैं, इसकी अराध्‍य देवी हैं, जिसके आसपास गोपियों की रँगरलियाँ बिखरी पड़ी हैं। इस बसंत के मादक त्‍योहार का स्‍वरूप न केवल ब्रज में अपितु बुंदेलखंड, अवध के प्रेम व समर्पण का प्रतीक बना है। प्रारंभ में कचनार के फूलों से बनाया गया सुवासित रंग तन व मन को भिगो जाता था। आज भी ब्रज में इन बाजारी रंगों की अपेक्षा ‘टेसू के रंग’ की वरीयता दी जाती है।
गोकुल जो भगवान कृष्‍ण का गाँव है और बरसाना राधा रानी का नैहर, इन दोनों गाँव में ससुराल का माधुर्य और भावों की कोमलता को रखकर इस त्‍योहार को मनाया जाता है। यहाँ मथुरा की होली देखने दूर-सुदूर देशों से यात्री आते हैं और इनके आनंद में पूर्णतः भागीदारी करते हैं। गोकुल से ग्‍वालों की टोली बरसाने जाती है, जहाँ एक दिन फूलों की होली होती है। एक दिन ‘लट्ठमार’ होली होती है। फूलों की होली में केवल रंग-बिरंगे फूल ही बरसाने की स्त्रियाँ गोकुल के ग्‍वालों पर डालती हैं। दूसरे दिन ‘लट्ठमार’ होली होती है, जिसमें बरसाने की सुंदरियाँ लट्ठों से गोकुल के रसीले गोपों पर प्रहार करती हैं और गोकुलवासी सर पर साफा बाँध तथा कवच लेकर अपना बचाव करते हैं, पर सुंदरियों के प्रेम दिखाने की अद्भुत परंपरा है। मथुरा शहर के बड़े-बड़े बरतनों में रंग लेकर टोलियाँ चलती हैं और पूरे शहर को रंगों से रस रंजित कर देती हैं। अब माखन की मटकी भी टाँगी जाने लगी है, जिसे ग्‍वाले ‘पिरामिड’ बनाकर ऊपर जाकर फोड़ते हैं और उसमें से दही व माखन का रसास्‍वादन करते हैं। वहाँ के नागरिक इस साहसिक कार्य के लिए टोलियों को पुरस्‍कृत भी करते हैं। ब्रजमंडल की होली का वर्णन कवियों ने इतने मनमोहक रूप में किया है कि उनको पढ़कर आत्‍मा भीग जाती है। एक उदाहरण देखें–

‘‘आई बरसाने ते बुलाई बृषभान सुता
निरखि प्रभानि प्रभा मनु की अथै गई
चक चकवानि के चकाए चक चोरनि सी
चौकत चकोर चक चौधी से चके गई’’ या

‘‘लागी प्रेम डोरि खोरि साँकरी है कढ़ी आई
नेह सो निहोरि जोरि आली मन मानती।’’

रस मधुर छेड़छाड़ गोपियों के मदमाते यौवन का रंग यही है ब्रज की होली–

‘‘प्‍यारी कहयो फेरि मुख हेरि जू चले जाहु
हमें तुम जानत तुम्‍हें हम जानती।’’
यूँ तो हर ऋतु और मौसम का प्रभाव हर मानव पर पड़ता है, पर सर्वाधिक आकर्षण फागुन का होता है।
‘‘रूप मकरंद बरबस पिलाने लगे
प्रीत के गीत मन गुनगुनाने लगे।
बावरी हो गईं गाँव की गोपियाँ’’

गोपियों के रूप-वर्णन का आनंद इस फागुनी ऋतु में दर्शनीय है–

‘‘बाँसुरी जब से कर कान्‍ह गही
शुभ राग बसंत बज्‍यो सुररी
सुनि के धुनि धूम मची ब्रज में
निकसी बनिता भ्रम हूँ कररी
सब दौरि अटारि से भू पर री
बरसी बरसाने की गोरिघटा
नंदगाँव के साँवरे ऊपर री!’’

बुंदेलखंड की होली भी रंग से भरे ड्रमों और ढोल-ताशे बजाते मस्‍त तरुणों की टोली सारे वातावरण को रससिक्‍त कर देती हैं; अधिकांशतः यहाँ की टोलियाँ अलग-अलग मार्ग से होकर किसी देवस्‍थान पर मिलती हैं और ढोल के बुलंद तालों पर थिरकता जन मानस कृष्‍ण के गीत गाकर आनंद विभोर हो जाता है।

‘‘कुंडल कलंगी सिर मोर पछतावे वीर
बैठे ब्रजराज आज आय के दरीच में
सैन ते बुलाय लाई होरी खेलिबे के मिस
रँगन ने बोरि दई केसर के कीच में
करि के चालाकी छैल कंचुकी मरोरी मेरे
ऊपर सुजान कान्‍ह भये परी नीच में
अब तो बिकानी हाथ साँवरे के महादेव
राखूँगी चुराय नैन पूतरी के बीच में।’’

इस मिलन के बाद होली के रंग में डूबे रंगीले घरों पर जाकर मिलन करते हैं, जहाँ उनका स्‍वागत ‘गुझिया’ मिष्‍टान्‍न आदि से गृह स्‍वामी करते हैं तथा ‘गुलाब पाश’ से या पिचकारी के केवड़ जल लोगों पर डालते हैं‌, जिसकी सुगंध लोगों के मन पर महीनों रची बसी रहती है तथा भाईचारे और मिलन व एकता का संदेश निरंतर देता रहता है। इसमें अन्‍य धर्मावलंबी भी भागीदारी हैं, जो हमारे देश की सरसता और सांस्‍कृतिक एकता का अटूट प्रतीक है।
इसी तारतम्‍य में अवध में होली अपने पूर्ण गौरव व परंपरा से मनाई जाती है।
‘होली खेले रघुवीरा अवध में’
भगवान श्रीराम आज होली के रंग में डूबे हैं और उनके भक्‍त उनकी जन्‍मभूमि अयोध्‍या की गलियों में भाँग छानकर मस्‍त घूमते गीत गाते होली के इस महकते रंग में डूब जाते हैं और एक अद्वितीय आनंद का अतिरेक वहाँ देखने को मिलता है। इस महान् प्रदेश के हर क्षेत्र में यह त्‍योहार ‘होलिका दहन’ से लेकर रंग खेलते दिन बीत जाता है और अंत में मंदिरों-शिवालों में ‘चौताल’ व फाग के स्‍वर गूँजते रहते हैं। अवध की होली पकवानों की महक से सराबोर रहती है।
अंत में हम ‘बाबा भोलेनाथ’ की नगरी काशी की छटा देखते हैं। यहाँ रंग भरी एकादशी से ही रंग-गुलाल की महक छा जाती है। भोले भंडारी को भाँग-धतूरा चढ़ाकर नाचती-गाती आत्‍मा परमानंद के सुख को पहुँच जाती है, जहाँ एक अजब मस्‍ती एक अजब अल्‍हड़पन एक अजीब वैराग्‍य का दर्शन होता है। यह सत्‍य ही कहावत चरितार्थ होती है कि
‘‘तीन लोक से न्‍यारी काशी’’
इस तरफ डफ ढोल और होली, चौताल, पूर्वी, भादल के स्‍वरों को छोड़कर विलीन हो जाती है, जिसकी महक, जिसकी खुमारी ‘सत्‍यनारायण’ जी के मंदिर पर काशी के श्रेष्‍ठ कत्‍थकों के तबला वादन, सारंगी पर मनमो‌हनी रागिनी, शहनाई के ललित स्‍वरों में रच-बसकर सदैव के लिए रह जाती है।