संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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ऐसी थी वो होली
डा. सरोज अग्रवाल
हम आपका परिचय हिन्दी के महान साहित्यकारों से करवा रहे हैं। डा. सरोज अग्रवाल, मद्रास में हिन्दी की अध्यक्ष पद पर रह चुकी हैं। आपने हिन्दी लेखन मे भी विशेष योगदान दिया है। सरोज जी इस अंक में पाठकों से रामधारी सिंह दिनकर एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (इतिहासकार-उपन्यासकार)
होली मिलन एवं सौहार्द का, रंगों एवं भावनाओं का त्‍योहार है। रिश्‍तों को सँजोना, ठिठोली, हँसी एवं मजाक करना आदि ये सब इसी के तो अंग हैं। होली के गहराते रंग, अबीर-गुलाल, खिलते टेसू के रंग व्‍यक्‍ति के उत्‍साह को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं। पूरा फाल्‍गुन माह होली की छटा बिखेरे रहता है। होली में उत्‍फुल्‍लता तो रहती ही है, पर कभी-कभी नवीनता लाने के चक्‍कर में लोग नादानियाँ कर बैठते हैं और हँसी में खसी हो जाती है। ऐसी ही एक होली वह भी थी।
बात सन् 1961 की होली की है। हमारे एक जीजाजी (संबंधी) को होली खेलने का बड़ा शौक था, साथ ही दूसरों को जबरदस्‍ती भाँग पिलाने का भी। मैं आपको बता दूँ कि होली पर भाँग खाने-खिलाने का विशेष आग्रह रहता था। वे मुझसे बोले, अबकी तो तुझे भाँग खिलाकर ही रहूँगा। उनकी गुब्‍बारे की फैक्‍टरी थी, सो उन्‍होंने अपने कर्मचारियों से भाँग घुटवाकर अपने मालवाही ट्रक में लादकर अपने रिश्‍तेदारों को लेकर दल-बल सहित हमारे यहाँ आ धमके और हम सभी को भाँगवाली ठंडाई जबरदस्‍ती पिलाने पर उतारू हो गए। चूँकि उन्‍होंने पी रखी थी, सो हमारी न पीने की ट्रिक समझ न सके। मैं, मेरे पति और दो महिला, जो भाभी और देवरानी लगती हैं, हम चार जनें उनकी जिद से किसी प्रकार बच गए। बाकी सबने जमकर चढ़ाई।
अब तमाशा शुरू होने लगा। हम सभी ट्रक पर लदे-फँदे चैंबूर से जुहू की ओर जा रहे थे। जुहू सागर के तट पर अंतिम पड़ाव था। बीच-बीच में स्‍थान-स्‍थान पर वे अपने रिश्‍तेदारों एवं मित्रों से होली खेलते हुए, भाँग पिलाते हुए और अपने इस कारवाँ में शामिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। अभी हम थोड़ी ही दूर गए थे कि साधन में वे ट्रक से उतरकर अपने मित्र से होली खेलने उतरे और वापिस आने पर जैसे ही ट्रक चलने लगा, उनका एक भतीजा जो बाल-बच्‍चोंवाला था, चलते ट्रक को खोलकर कूदने लगा। खैर, उसे किसी तरह काबू किया। उसमें तो बला का बल भरा था, सो सोचा माटुंगा उतरकर उसे घर पर छोड़ देंगे। घर से भी तो बाल-बच्‍चों व पत्‍नी को लेना था। घर पहुँचकर तो उसके तमाशे और बढ़ गए। उसने डंडा उठाया और अलमारी के शीशे में अपनी ही छवि देखकर शीशे पर डंडा मारना प्रारंभ किया। यह दृश्‍य देखकर उसे घर में अकेले छोड़ना उचित न समझा और उसे साथ लेकर चल पड़े। खार पहुँचते-पहुँचते और लोगों पर भी भाँग प्‍यारी का असर दिखने लगा। सोचा, थोड़ी देर में असर कम होने पर आगे बढ़ेंगे। खार में उनकी बहन का घर था। सो उसे विश्राम स्‍थल बनाया। कोई कहता बरफी घोलकर पिलाओ, कोई कहता नीबू चढ़ाओ, पर भाँग रानी कहाँ रुकनेवाली थी। वह सज्‍जन जिनका नाम सुरेंद्र था, बड़ी अजीबोगरीब स्‍थिति से गुजर रहे थे। वे किसी भी बच्‍चे को हाय मेरा बेटा कह दौड़कर सीने से लगाते, कभी खूब रोते, कभी इस प्रक्रिया में कुछ क्षण को चेतना खो बैठते। कभी उल्‍टियाँ करते। बाकी लोग भी जिन्‍होंने भाँग ली थी, अजीबोगरीब हरकतें कर रहे थे और हम हँस-हँसकर आनंद ले रहे थे। (नादान उम्र थी न) खैर, जुहू जाने का विचार तो अब छोड़ दिया। जुहू पर पानी में जाना तो खतरनाक या इस हालत में। अब शाम हो आई, अपने घर तो जाना ही था, सो हम छह लोग यानी हम दोनों भाई-भाभी, देवर-देवरानी टैक्‍सी लेकर अपने घर चल पड़े। मार्ग में हम डरे हुए थे नशा निषेध के कारण। (भाई और देवर ने भाँग ले रखी थी) उनको नीचे की ओर झुकाकर भगवान का नाम लेते-लेते हम किसी प्रकार अपने घर पहुँचे।
घर आकर भी अजीबोगरीब किस्‍सा। जितना खाना बनाकर रखा था वे दोनों ही खा गए। त्‍योहार पर तो खाना भी ज्‍यादा बनता था उन दिनों। हमने और बनाया, वह भी चट कर गए। राम जाने कहाँ से इतनी भूख आ गई। खैर, ये दोनों तो दूसरे दिन सामान्‍य हो गए, पर जीजाजी व उनका परिवार सामान्‍य न हो सका। जीजा की जबान भी लगभग एक माह तक लड़खड़ाती रही और बात करते हुए बीच-बीच में चुप हो जाते तथा सिर को झटका देते थे। वे तो खैर जैसे-तैसे कु‌छ दिनों में ठीक हो गए, पर उनका भतीजा तो इस संकट से उबर ही न पाया और थोड़े दिनों में काल का ग्रास बन गया। एक दिन जब जीजाजी की तबीयत सामान्‍य हो गई, तो उन्‍होंने बताया कि उनके कामगारों ने भाँग को अधिक असरदार बनाने के लिए उसमें धतूरा व ताँबा घिस दिया था। वे लोग तो इसके आदि थे, पर सामान्‍य जन पचा न सके। भाँग में ताँबा घिसने से वह विषैली हो जाती है। इस घटना के बाद जीजाजी ने अपने कान पकड़े और सदा-सदा के लिए होली खेलने का विचार भी त्‍याग दिया।
प्रस्‍तुत संस्‍मरण एक शिक्षाप्रद संस्‍मरण है, जिससे अति की वर्जना दृष्‍टिगोचर होती है, ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’। यों हँसी-मजाक, आनंद ये तो जीवन के मूलभूत तत्त्व हैं, जिन पर जीवन की भित्ति टिकी है–

‘‘होली हँसावे होली रुलावे, फिर भी किसी को समझ न आवे
साल भर का इंतजार, होली प्‍यारा सा त्‍योहार
होली आए बारंबार, होली यादों का त्‍योहार।
होली रंगों की बौछार, होली प्‍यार भरा उपहार।’’

होली की जीवंतता
होली मधुरता, उत्‍साह और उमंग का त्‍योहार है। उत्तर भारत में जीजा-साली, देवर-भाभी और जीजा-सलहज के होली खेलने का विशेष महत्त्व है। बाद में जीजा-साली एवं सलहज को और देवर-भाभी को साड़ी आदि उपहार देते हैं। फाल्‍गुन मास प्रारंभ होते ही होली के रंग-ढंग प्रारंभ हो जाते हैं। कहीं किसी के ऊपर चुपके से ‘मैं गधा हूँ’ का ठप्‍पा छाप दिया जाता है तो कहीं रात को ढोल-नगाड़ों की ध्‍वनि और आग जलाकर उसके चारों ओर नृत्‍य का समाँ छाया रहता है। होली में भाँग का विशेष आयोजन रहता है और उसके करतब हँसी से लोट-पोट करते हैं।
बात सन् 1971-72 हैदराबाद की होली की रही होगी। हमने अपने घर पर मित्रों और संबंधियों को एकत्रित कर सामूहिक रूप से होली खेलने का आयोजन किया। सभी बड़ी उमंग से एकत्रित हुए और खूब होली खेले। हमने विशुद्ध ठंडाई बनाई पर कुछ लोग भाँग लेना चाहते थे सो वे लोग अलग से भाँग की गोलियाँ बनाकर

ले आए और चुपचाप घर के बाहर ही आपस में गोलियाँ ले लीं। (हमारे यहाँ यह सबकुछ वर्जित है) खैर, भाँग के जोश में खूब होली खेली गई। अबीर, गुलाल एवं टेसू का गीला रंग सभी कुछ मिल-मिलाकर चेहरे की शोभा बढ़ा रहे थे। अब बारी थी गाने-बजाने की। नृत्‍य ने अपना कमाल प्रारंभ किया। ‘करेला वह भी नीम चढ़ा’ यानी भाँग का नशा और नृत्‍य। बस एक उन्‍मादित आलम छा गया, कोई मैदान से हटना ही नहीं चाहता था, बल्‍कि दूसरों को भी पकड़-पकड़कर नचा रहे थे। एक सज्‍जन को बहुत अधिक चढ़ गई तो दूसरे ने उसे सलाह दी कि नीबू का पानी लो तो तुम और भी आनंद ले सकोगे। बस फिर क्‍या था, उन्‍होंने नीबू अपनी स्‍कूटर उठाई और एक मित्र को बिठा चल पड़े नीबू लेने। सभी ने उन्‍हें इस हाल में जाने से रोका, पर वे कहाँ माननेवाले थे। पास में ही एक मंदिर या उसके गेट पर बाहर की ओर एक ओर फूलवाले बैठते थे, नीबू सहित और दूसरी ओर फलवाले। ये सज्‍जन दमदमाते हुए फलवाले के पास अंगूर देखकर इशारा करते

हुए बोले कि मुझे दो नींबू दे दे। दुकानदार बोला कि मेरे पास नीबू
नहीं है तो वे सज्‍जन अंगूर दिखाते हुए बोले, अंधा है क्‍या? ये नींबू नहीं है तो क्‍या है? देता क्‍यों नहीं नींबू? दुकानदार के समझाने पर भी वह यह नहीं मान पाए कि ये नींबू नहीं अंगूर है, और उसे धमकाते हुए बोले कि रोज तो तुम नींबू रखते हो। आज अंगूर क्‍यों? और लगे उसे धमधमाने। खैर, मित्र व अन्‍य लोगों के बीच-बचाव से उस बेचारे नीबूवाले की रक्षा हुई। दूसरे दिन भाँग रानी के विदा होने पर सच्‍चाई का ज्ञान होने पर उसने उस दुकानदार से क्षमायाचना की।
एक सज्‍जन ने इतनी चढ़ा ली कि वे हमारे ही घर में लमलोट हो गए और दूसरे दिन तंद्रा खुलने पर अपने घर गए।
और भी एक अविस्‍मरणीय घटना घटी। घटनाएँ तो बहुत थीं, पर यह भी एक विशेष थी। एक सज्‍जन अपने घर जाकर अपने मित्र सहित (बैचलर थे) ‌बाथरूम में नहाने घुस गए। नल खोला, साबुन मला तब तक वे पानी से दूर हट चुके थे। आँखों व मुँह पर भी साबुन था, सो देख न पाए। बहुत प्रयास करने पर भी जब पानी उनके ऊपर न गिरा तो वे मित्र से बोले, यार, ये कैसा सूखा-सूखा पानी है, जिसकी आवाज भी आ रही है, पर मेरे साबुन को धो नहीं रहा। मित्र का भी यही हाल था दोनों ही परेशान थे, तब तीसरा एक मित्र जो बाहर था उसे कुछ-कुछ बात समझ आई कि ये भाँग रानी के प्रभाव में हैं, अतः उसने सहायता की।
शाम को ये सभी जब होली मिलने आए तो अनूठे अनुभव सुना रहे थे और हमारे पेट में हँसी से बल पड़ रहे थे। धन्‍य हैं होली!

‘‘होली आवै, होली जावै, नए-नए कौतुक दिखलावै
साल भर करै प्रतीक्षा, हाय कैसहु होली आवै।’’