संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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कविता
होली गीत
वेद प्रकाश "वटुक"
P O Box 1142, Berkeley, CA 94701
510-847-6224, vedvatuk@yahoo.com
शिक्षा: आगरा, लन्दन तथा हारवर्ड विश्वविद्यालय। "संस्कृत तथा ऑल्ड चर्च स्लावॉनिक भाषा का तुलनात्मक अध्ययन' पर डी. लिट्.।
अध्यापन कार्य: अमेरिका में विगत 40 वर्षों से कॉलराडो, शिकागो, कैलिफॉर्निया आदि विश्वविद्यालयों में भाषा तत्व, लोकसाहित्य तथा भारतीय संस्कृति विषयों का शिक्षण कार्य। निदेशक, फॉकलोर इन्स्टीट्यूट, बरकले, कैलिफॉर्निया।
लेखन कार्य: भाषा तत्व तथा लोक साहित्य पर विशेष शोध कार्य। हिन्दी अंग्रेजी में प्रचुर मात्रा में काव्य सृजन, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि। सम्प्रति "सीमान्तिका' (मासिक साहित्यिक पत्रिका) का सम्पादन।

साधो, ऐसे खेलें होली।
प्रेम-पुष्‍प-दल शत रंगों से रँग दे मन की चोली।।
द्वेष-घृणा-अरिता-ईर्ष्या-अमर्ष जल प्रेम-भस्‍मी हो जाएँ।
जन्‍म-जन्‍म के बैरी मिलकर राग प्रेम का गाएँ।
प्रेम-गुलाल-अबीर विपुल से भरे हृदय-पिचकारी।
भेदभाव और ऊँच-नीच को भूलें सब नर-नारी।।
समता-न्‍याय-ऋषिमय सबका शोषणहीन बने भव।
गाएँ फगुआ नृत्‍य-वाद्य में डूबें ज्‍यों पंछी-मधु कलरव।।
नगर-नगर बरसमा होवे, जन-जन हो हरि-गोपी।
ऐसी होली मने ‘वेद’ ज्‍यों श्रेम-फसल नव रोपी।।