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कविता
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| होली गीत |
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वेद प्रकाश "वटुक"
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P O Box 1142, Berkeley, CA 94701 510-847-6224, vedvatuk@yahoo.com |
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शिक्षा: आगरा, लन्दन तथा हारवर्ड विश्वविद्यालय। "संस्कृत तथा ऑल्ड चर्च स्लावॉनिक भाषा का तुलनात्मक अध्ययन' पर डी. लिट्.। अध्यापन कार्य: अमेरिका में विगत 40 वर्षों से कॉलराडो, शिकागो, कैलिफॉर्निया आदि विश्वविद्यालयों में भाषा तत्व, लोकसाहित्य तथा भारतीय संस्कृति विषयों का शिक्षण कार्य। निदेशक, फॉकलोर इन्स्टीट्यूट, बरकले, कैलिफॉर्निया। लेखन कार्य: भाषा तत्व तथा लोक साहित्य पर विशेष शोध कार्य। हिन्दी अंग्रेजी में प्रचुर मात्रा में काव्य सृजन, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि। सम्प्रति "सीमान्तिका' (मासिक साहित्यिक पत्रिका) का सम्पादन।
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साधो, ऐसे खेलें होली। प्रेम-पुष्प-दल शत रंगों से रँग दे मन की चोली।। द्वेष-घृणा-अरिता-ईर्ष्या-अमर्ष जल प्रेम-भस्मी हो जाएँ। जन्म-जन्म के बैरी मिलकर राग प्रेम का गाएँ। प्रेम-गुलाल-अबीर विपुल से भरे हृदय-पिचकारी। भेदभाव और ऊँच-नीच को भूलें सब नर-नारी।। समता-न्याय-ऋषिमय सबका शोषणहीन बने भव। गाएँ फगुआ नृत्य-वाद्य में डूबें ज्यों पंछी-मधु कलरव।। नगर-नगर बरसमा होवे, जन-जन हो हरि-गोपी। ऐसी होली मने ‘वेद’ ज्यों श्रेम-फसल नव रोपी।।
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