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अन्य
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| बाबा भगतसिंह बिल्गा |
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वेद प्रकाश "वटुक"
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P O Box 1142, Berkeley, CA 94701 510-847-6224, vedvatuk@yahoo.com |
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शिक्षा: आगरा, लन्दन तथा हारवर्ड विश्वविद्यालय। "संस्कृत तथा ऑल्ड चर्च स्लावॉनिक भाषा का तुलनात्मक अध्ययन' पर डी. लिट्.। अध्यापन कार्य: अमेरिका में विगत 40 वर्षों से कॉलराडो, शिकागो, कैलिफॉर्निया आदि विश्वविद्यालयों में भाषा तत्व, लोकसाहित्य तथा भारतीय संस्कृति विषयों का शिक्षण कार्य। निदेशक, फॉकलोर इन्स्टीट्यूट, बरकले, कैलिफॉर्निया। लेखन कार्य: भाषा तत्व तथा लोक साहित्य पर विशेष शोध कार्य। हिन्दी अंग्रेजी में प्रचुर मात्रा में काव्य सृजन, निबन्ध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि। सम्प्रति "सीमान्तिका' (मासिक साहित्यिक पत्रिका) का सम्पादन।
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अचानक समाचार आया–‘गदर लहर’ के अंतिम योद्धा बाबा भगतसिंह बिल्गा नहीं रहे। बाईस मई की प्रातः ग्यारह बजे बर्मिंघम, ब्रिटेन के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली। जालंधर जिले का बिल्गा गाँव, जिसे ब्रिटिश सरकार ने ‘बागी’ घोषित किया था, रो पड़ा–प्रतीक्षा में कि उनका शव जालंधर होते हुए जुलूस के साथ आएगा–अंतिम दर्शनार्थ, पंचतत्त्व में विलीन होने के लिए। पंजाब भर में शोक फैल गया। देशभगत यादगार कमेटी, पंजाबी भाषा अकादमी, केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा, किसान सभा, भारतीय साम्यवादी दल, मार्क्सवादी पार्टी, अनेक सामाजिक/धार्मिक संस्थाएँ, कनाडा/अमेरिका में ‘गदर’ मेले आयोजित करनेवाली संस्थाएँ–सब शोक में डूब गईं। उस व्यक्ति की स्मृति में, जिसे कभी ब्रिटिश सरकार ने ‘सबसे खतरनाक क्रांतिकारी’ कहा था, जिसे भूतपूर्व प्रधानमंत्री गुजराल ने एक ‘मिथकीय व्यक्ति’ (Legend) की संज्ञा दी थी, केंद्रीय मंत्री रामूवालिया ने ‘अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग, सच्चे देशभक्त’ की पदवी दी थी और कुलदीप नैयर ने कहा था, ‘क्रांतिकारी, स्वप्नद्रष्टा, स्वतंत्रता-संग्राम का अविस्मरणीय दस्तावेज, गदर पार्टी का चलता-फिरता इतिहास और अंतिम क्षण तक देश की चिंता में डूबा महामानव। जो न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ा, वरन् आजादी के बाद भी हर उस तत्त्व से, जिसने अपने लाभ के लिए जनता का शोषण किया, द्वेष-घृणा के उस वर्ग से, जिसने अपने स्वार्थ के लिए खून से पंजाब की धरती रंग दी। उसका संग्राम कभी समाप्त नहीं हुआ। हमें पता था कि बाबा 102 वर्ष के हो गए थे। हमें पता था कि उनके शरीर ने धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। हमें पता था कि उनकी श्रवण-शक्ति कम हो रही है, उनकी दृष्टि मंद होने लगी है। फिर भी, जैसा कि देशभक्त यादगार कमेटी के मंत्री गुरमीत कहते हैं, हमें वे हमेशा नौजवान बाबा के रूप में दिखते थे, जिन्होंने अपनी देशभक्ति की भावना को कभी कमजोर नहीं होने दिया। कभी भी किसी भी दशा में अपने लिए कुछ नहीं माँगा। 2 अप्रैल, 1907 में जनम (उसी वर्ष शहीदे-आजम भगत सिंह का भी जन्म हुआ था) भगतसिंह बिल्गा से मेरी पहली भेंट उस समय हुई, जब वे 90 वर्ष के हो चुके थे। 1996 में हमने सान्फांसिस्को में अमर शहीद करतार सिंह सराभा की जन्म-शताब्दी मनाई थी, जो गदर आंदोलन के प्राण थे। 19 वर्ष की आयु में जिन्होंने गदर पार्टी के हर कार्यक्रम में तन-मन-धन से पूरा योगदान देते हुए शहादत पाई थी–1915 में। भगतसिंह जिन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे और कहते हैं, फाँसी पर चढ़ने तक भगतसिंह की जेब में करतारसिंह का चित्र रहा। उस शताब्दी समारोह में हमने गदर पार्टी से संबंधित एकमात्र जीवित क्रांतिकारी बिल्गाजी से प्रार्थना की थी कि वे अपनी उपस्थिति से हमारा उत्साहवर्द्धन करें। वे नहीं आ पाए। इसीलिए मैं अगले वर्ष उनके दर्शन करने गया। शहीदे-आजम भगतसिंह के भानजे जगमोहन सिंह मुझे जालंधर छोड़ गए–पूरे ब्लॉक में बने भव्य देशभगत-यादगार भवन के सामने। बाबाजी पीछे के एक छोटे से कमरे में तब उठ ही रहे थे। सफेद कमीज और पाजामा पहनकर तैयार हो रहे थे। उनकी निजी संपत्ति कुछ विशेष नहीं थी। मैंने अभिवादन के साथ उन्हें अपना परिचय दिया। वे खुश होकर बोले, ‘‘हाँ-हाँ, जानता हूँ। इस आपाधापी के युग में जब सब देश को लूट रहे हैं, मुझे खुशी है, तुम उन शहीदों की स्मृति को जिलाने में लगे हो, जिन्हें अपने स्वार्थ के कारण प्रशासन भुलाने में लगा है।’’ उन्होंने हमारे सैनफ्रांसिस्को स्थित ‘गदर स्मारक भवन’ को जनता के लिए खुलवाने और 1990 से तब तक हर वर्ष 26 नवंबर को (जिस दिन गदर पार्टी के सात शहीदों को 1915 में फाँसी लगी थी) शहीद दिवस का आयोजन करने के लिए साधुवाद दिया। मैंने कहा, ‘‘तब आप क्यों नहीं आए विगत वर्ष करतार सिंह सराभा के शताब्दी-पर्व में ?’’ उन्होंने बड़े प्यार से उत्तर दिया, ‘‘हाँ, मुझे विदेश मंत्रालय से पत्र आया था कि उन्होंने मेरी यात्रा और निवास का प्रबंध किया है। (तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने हमारे सुझाव पर चार के बजाय छह व्यक्तियों को भेजने की व्यवस्था की थी।) मैंने समझा, यह सरकारी आयोजन है। और जिस सरकार ने आज तक गदर पार्टी के सैकड़ों शहीदों और आजाद हिंद फौज के हजारों सैनिकों की उपेक्षा की है, उसके कार्यक्रम में जाने की मेरी कोई रुचि नहीं है।’’ पर जब उन्हें पता चला कि कार्यक्रम सरकार के कारण नहीं, उसके बावजूद हो रहे हैं, तो वे बहुत खुश हुए। और मुझे याद आया कि इसी कारण तो उन्होंने अपने सम्मान में होनेवाले एक कार्यक्रम में, जिसमें स्वतंत्रता-संग्राम में उनके योगदान के लिए उन्हें ताम्रपत्र दिया जाना था, सम्मिलित होने से इनकार कर दिया था। और करोड़ों रुपए की संपत्तिवाला क्रांतिकारी शहीदों की यादगार में बना वह भव्य भवन, जिसमें हम बैठे थे, पूरा-का-पूरा जनता के अनुदान से बना है, जनता के लिए बना है। उसमें एक भी पैसा राज्य या केंद्र की सरकार का नहीं लगा है। देशभक्त यादगार हॉल का इतिहास बहुत पुराना है। वास्तव में सन् 1920 में जब गदरपार्टी के योद्धा, बाबा वसाखा सिंह, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अमेरिका में अर्जित अपनी लाखों की संपत्ति पार्टी को दान कर दी थी और जिन्हें स्वतंत्रता-संग्राम में कूदने के कारण पार्टी के अन्य अनेक सदस्यों के साथ कालापानी की सजा हुई थी, स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण छोड़ दिए गए, तो उन्होंने उन देशभक्तों के परिवारों की सहायता के लिए, जिनकी सब संपत्ति जब्त कर ली थी और जो लंबी सजाएँ काट रहे थे, देशभगत परिवार सहायक कमेटी की स्थापना की थी। देशभक्तों की सूची बनाकर उन्होंने उनके परिवारों के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा, बंदियों से मिलाई, मुकदमों की सुनवाई और जनता में उनके प्रति सद्भावना पैदा करने के उद्देश्य से यह सभा बनाई थी। यही कमेटी सन् 1955 में देशभक्त यादगार कमेटी बन गई। उसका उद्देश्य हो गया–जन सामान्य को स्वतंत्रता-संग्राम के सशस्त्र क्रांति के पक्ष के बारे में शिक्षित करने के साथ-साथ देशभक्ति की भावना से भरना। क्रांतिकारी इतिहास की विरासत को सुरक्षित रखना। गदर पार्टी, बब्बर अकाली, किस्ती-किसान पार्टी, नौजवान सभा, आजाद हिंद फौज के योद्धाओं के अतिरिक्त उन शहीदों/वीरों के इतिहास को जीवित रखना, जिन्होंने सेना की विभिन्न टुकड़ियों में रहकर विद्रोह किया था। जैसे सन् 1930 में चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्ववाली टुकड़ी का विद्रोह, जिन्होंने निहत्थे जुलूस पर गोली चलाने से मना कर दिया था। या 1940 का सैनिक विद्रोह, जिनके नायकों–अजायबसिंह, बूटासिंह, साधुसिंह आदि को 6 सितंबर को फाँसी दी गई। देशभक्त यादगार हॉल का अजायबघर वाला भाग इन सैकड़ों वीरों की चित्रावलि से पूर्ण है, जो बिल्गाजी की प्रेरणा से शहीदों के गाँव-गाँव जाकर और विदेशों में बसे वंशजों से इकट्ठे किए गए चित्रों से संपन्न है। बिल्गाजी तैयार होकर स्वयं मुझे यह सब दिखाते हैं। और दिखाते हैं लायब्रेरी, जिसमें क्रांतिकारी इतिहास पर लिखीं सत्रह हजार से ऊपर पुस्तकें तो हैं ही, अनेक क्रांतिकारियों द्वारा लिखे हस्तलिखित दस्तावेज, उनके साथ लिए साक्षात्कार, समाचार-पत्रों की कतरनें आदि अमूल्य धरोहर हैं। कई गोष्ठी-कक्ष, सम्मेलन-सभागार, अतिथि-कक्ष आदि भवन भी वे मुझे दिखाते हैं। उनसे मेरी दूसरी भेंट तब हुई, जब ऊधमसिंह फिल्म की सफलता के बाद राज बब्बर ने निर्णय लिया कि वे गदर आंदोलन पर एक फिल्म बनाएँगे। बर्फीले में मेरे घर आकर उन्होंने मुझे इस फिल्म में एक सलाहकार होने का आमंत्रण दिया और जून 2000 में बाबा बिल्गा और उनके अन्य साथियों के साथ अपने पूरे फिल्मी दस्ते के साथ मुलाकात करने के लिए मुझे भी देशभक्त यादगार हॉल में बुलाया। मैं देर से पहुँचा, वे साक्षात्कार ले ही रहे थे। मेरे पहुँचते ही बाबा बिल्गा उत्साह से खड़े हो गए, ‘लो, अब तो वेदजी भी आ गए।’ सब कार्यवाही रोककर उन्होंने मुझे अपने विचार रखने को कहा, ऐसे जैसे कि मैं इतिहास का विशेषज्ञ हूँ। मैं उनके प्रेम से अभिभूत हो गया। उसी दिन शाम वे हमें क्रांतिकारी गांधर्वसेन और उनकी बेटी सुरिंदर के घर/फार्म पर भी ले गए और अपना पुश्तैनी गाँव बिल्गा दिखाने भी। 93 वर्ष की उम्र में ऐसा युवा-हृदय, मासूम उत्साह और विनम्र भाव! उसके बाद तो उन्होंने मुझे कई आयोजनों में भाग लेने को बुलाया–गदर मेले का आयोजन किया। ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’, बचपन से सुनता आया था। किंतु कभी देखा नहीं था। कोई शहीदी मेला। 20 वर्ष पूर्व बाबा बिल्गा ने युवकों को बुलाकर ‘गदरी बाबाओं का मेला’ आयोजित करने की प्रेरणा दी। 30 अक्तूबर से 1 नवंबर तक। 1 नवंबर, 1913 को वर्कले में गदर पार्टी के साप्ताहिक क्रांतिकारी पत्र ‘गदर’ का विमोचन हुआ था–ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध अपनी भाषा में संग्राम की घोषणा के रूप में। 1992 से आयोजित इस मेले में कई नाटक, कवि-सम्मेलन, युवा-प्रतियोगिताएँ, देशभक्ति-संगीत, देश की स्थिति पर परिसंवाद आदि अनेक आयोजन होते हैं। ग्राम-नगरों से हजारों लोगों का आगमन होता है। उनके ठहरने/खाने की व्यवस्था की जाती है। सभ्यता-संस्कृति, इतिहास संबंधी प्रदर्शनियाँ लगाई जाती हैं, पुस्तक विक्रेता अपने स्टॉल लगाते हैं। मेरा खयाल है, युवा मानस को देश-समाज के प्रति अपने कर्तव्य का आभास कराने का इतना श्रेष्ठ साधन मैंने और कहीं नहीं देखा। उनकी प्रेरणा से ये मेले विगत कई वर्षों से कनाडा और कैलिफोर्निया राज्य के कई नगरों में भी लगने लगे हैं। हाँ, यह बात जरूर है कि जहाँ गदर पार्टी का दृष्टिकोण सार्वभौमिक और वैश्विक था, वहाँ ये मेले पंजाबी मूल के लोगों तक सिमटकर रह गए हैं। क्रांतिकारियों के इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए बिल्गाजी की प्रेरणा से देशभक्त यादगार हॉल की इतिहास समिति ने कई पुस्तकें प्रकाशित कीं। साथ ही पंजाबी में ‘बिरसा’ और अंग्रेजी में ‘हैरिटेज’ पत्रिकाएँ भी निकालीं। स्वयं बिल्गाजी ने चार पुस्तकें लिखी हैं गदर पार्टी, किरती पार्टी और स्वयं के बारे में। इस चिरयुवा क्रांतिकारी का जन्म नंबरदार हीरासिंह और मिलन के घर हुआ। पिता की मृत्यु के समय वे दो वर्ष के थे, माँ भी बचपन में ही चली गईं। ननिहाल में पालन-पोषण हुआ। लुधियाना स्थित मालवा खालसा हाईस्कूल से 1925 में प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल उत्तीर्ण कर वे अनेक देशों में भटकते हुए 1926 में रोजी-रोटी की तलाश में अर्जेंटीना पहुँचे। वहाँ ‘गदर पार्टी’ में शामिल हुए। सरदार भगतसिंह के क्रांतिकारी चाचा अजीतसिंह, जो ‘पगड़ी सँभाल जट्टा’ आंदोलन में भाग लेने के फलस्वरूप देश-निर्वासन का दंड भोग रहे थे तथा गदरी बाबा रतनसिंह, तेजासिंह सुतंतर आदि ने उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को पुष्ट किया। वे अर्जेंटीना की गदर पार्टी शाखा के प्रधानमंत्री चुने गए। ‘गदर’ पत्र का अर्जेंटीना संस्करण निकाला। सन् 1932 में पार्टी के आदेश पर 76 अन्य सदस्यों के साथ एशियाई मूल के लोगों को दिए जानेवाले बौद्धिक/सैनिक प्रशिक्षण के लिए स्थापित संस्थान में मास्को गए। सन् 1934-36 में भारत लौटकर भूगर्त रहकर कानपुर, कोलकाता आदि स्थानों में स्वतंत्रता-संग्राम के लिए काम किया। पत्रिकाएँ निकालीं। सन् 1936 में पकड़े गए। वर्ष भर की रिहाई के बाद घर में नजरबंद रहे। सन् 1938 में जालंधर जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री तथा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए। सन् 1939 से देश के आजाद होने तक कई साल कारागार में रहे। आजादी मिली, तो उनके सपने भी टूटे। अंग्रेजों की पेंशन विदेश जाती रही, देशद्रोही अफसरों की नौकरियाँ बहाल रहीं, माउंटबेटन वायसराय बना रहा, बागी फौजियों को आजाद भारत में नौकरियाँ नहीं मिलीं, न ही आजाद हिंद फौज के सैनिकों को। और देश तो बँटा ही। इसीलिए किसान-मजदूरों की अधिकारों की लड़ाई में भी वे जेल गए–आजादी के बाद भी। और खालिस्तानियों के आतंक के दिनों में, जब किसी भी सिख के लिए पंजाबी आतंकवादियों के विरोध में खड़ा होना मौत को बुलावा देना था, तब वे अकेले निहत्थे गाँव-गाँव गए बाइसिकिल पर। लगभग 200 युवा बौद्धिक साथियों को मरते देखा। उन्हीं के शब्दों में–‘‘एक बार मैं एक मारे गए हिंदू की शोकसभा में गया और सिक्खों को संबोधित किया–वहशत के विरोध में। वापिस आया, तो आँगन में बैठ गया, मृत्यु की प्रतीक्षा में। कितनी बुरी तरह चाहता था मैं उस दिन शहीद होना।’’ आजादी का जो सपना उन्होंने देखा था, उसको चूर-चूर होते देख वे व्यथित रहे। ‘‘हमें क्या पता था कि ऐसी हालत आएगी, जब मनमोहन सिंह जैसा एक ईमानदार और भला प्रधानमंत्री कुछ झूठे आँकड़ों का जादू दिखाकर दावा करेगा कि देश में सबकुछ ठीक-ठाक है। सरकारी योजनाओं को आभिजात्य वर्ग बनाता है, जिसमें गरीब पिसते हैं।’’ फिर भी सारी वेदनाओं को छिपाकर मृत्यु से पूर्व उन्होंने चुनाव के लिए संदेश भेजा था, ‘‘देश के विकास और भविष्य की कुंजी युवाओं के हाथ में है। राजनीतिज्ञों ने लोगों को काफी समय तक धोखा दिया है। अब यह जनता के हाथ में है कि वह स्वतंत्रता-सेनानियों के सपने साकार करे और देश की एकता, धर्मनिरपेक्षता और विकास के लिए मतदान करे।’’ शायद हमें उनकी वेदना को समझने की शक्ति मिले। वही तो श्रद्धांजलि होगी उस अपूर्व सपूत को–भारत माता के!
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