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अन्य
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| नववर्ष–ऐतिहासिक तथ्य |
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विनोद बंसल
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329, द्वितीय तल, लाजपत नगर, ईस्ट टाऊन, नई दिल्ली |
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इकतीस दिसंबर के नजदीक आते ही जगह-जगह जश्न मनाने की तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। होटल, रेस्तराँ, पब इत्यादि अपने-अपने ढंग से इसके आगमन की तैयारियाँ करने लगते हैं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बैनर, होर्डिंग, पोस्टर व कार्डों के साथ दारू की दुकानों की भी चाँदी कटने लगती है। कहीं-कहीं तो जाम से जाम इतने टकराते हैं कि घटनाएँ दुर्घटनाओं में बदल जाती हैं और मनुष्य मनुष्यों से तथा गाड़ियाँ गाड़ियों से भिड़ने लगते हैं। रात-रात भर जागकर नया साल मनाने से ऐसा प्रतीत होता है मानो सारी खुशियाँ एक साथ आज ही मिल जाएँगी। हम भारतीय भी पश्चिमी अंधानुकरण में इतने सराबोर हो जाते हैं कि उचित-अनुचित का बोध त्याग अपनी सभी सांस्कृतिक मर्यादाओं को तिलांजलि दे बैठते हैं। पता ही नहीं लगता कि कौन अपना है और कौन पराया। एक जनवरी से प्रारंभ होनेवाली कालगणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं, जिसका संबंध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट् जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेजी शासकों ने सन् 1752 में किया। अधिकांश राष्ट्रों के ईसाई होने और अंग्रेजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया। सन् 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किंतु 18वीं सदी से इसकी शुरुआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेंडर के महीनों के नामों में प्रथम छह माह यानी जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट् जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितंबर से दिसंबर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गए। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे, इसलिए दोनों ही इकतीस दिनों के माने गए अन्यथा कोई भी दो मास 31 दिनों या लगातार बराबर दिनों की संख्यावाले नहीं हैं। ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारंभ हुआ, जिसके मात्र दस माह व 304 दिन होते थे। इसके 53 साल बाद वहाँ के सम्राट् नूमा पांपीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया। ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजर ने इसे 365 दिन का बना दिया। सन् 1582 में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि इस मास के 04 अक्तूबर को इस वर्ष का 14 अक्तूबर समझा जाए। आखिर क्या आधार है इस काल गणना का? यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नवंबर 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद् द्वारा स्थापित की गई समिति ने सन् 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत् को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी। किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कलेंडर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च, 1957 को इसे राष्ट्रीय कलेंडर के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ग्रेगेरियन कलेंडर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दरशाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वर्ष, रोम की 2756 वर्ष, यहूदी 5767 वर्ष, मिस्री की 28670 वर्ष, पारसी 189974 वर्ष तथा चीन की 96002304 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 108 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गई है। जिस प्रकार ईस्वी संवत् का संबंध ईसा जगत् से है उसी प्रकार हिजरी संवत् का संबंध मुसलिम जगत् और हजरत मुहम्मद साहब से है। किंतु विक्रमी संवत् का संबंध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्मांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसीलिए भारतीय काल गणना पंथनिरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परंपराओं को दरशाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्मांड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानी संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मंडल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरंतर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं। इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारंभ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और-तो-और, देश के बड़े-से-बड़े राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं, जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारंभ किया जाए तो उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं, उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगानेवाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुड़े हुए हैं। यह वह दिन है, जिस दिन से भारतीय नववर्ष पक्ष की प्रतिपदा से जुड़े हुए हैं। यह वह दिन है, जिस दिन से भारतीय नववर्ष प्रारंभ होता है। आइए, इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं–ऐतिहासिक महत्त्व 1. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन : आज से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 108 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने जगत् की रचना प्रारंभ की। 2. विक्रम संवत् का पहला दिन : उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था, जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, न भिखारी हो, साथ ही जो चक्रवर्ती सम्राट् हो। सम्राट विक्रमादित्य ने 2066 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था। 3. प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने के बाद राज्याभिषेक के लिए चुना। 4. नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन। 5. गुरु अंगददेव प्रगटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरु का जन्मदिवस। 6. आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना। 7. संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रांत के प्रसिद्ध समाज-रक्षक वरुणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए। 8. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भाँति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत के श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। 9. युगाब्द संवत्सर का प्रारंभ दिवस : युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिनः 5111 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ। 10. डॉ. केशवराव बलीराम हेडगेवार जन्मदिवस, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे।प्राकृतिक महत्त्व 1. बसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। 2. फसल पकने का प्रारंभ यानी किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। 3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए शुभ मुहूर्त होता है। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है, जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके? आइए, विदेशी को फेंक, स्वदेशी अपनाएँ और गर्व के साथ भारतीय नववर्ष यानी विक्रम संवत् को ही मनाएँ तथा इसका अधिक-से-अधिक प्रचार करें।
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