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अन्य
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| संस्कृति : विकास या विनाश ? |
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बचपन अपने ननिहाल मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के सैलाना में गुजरा। भारत, कनाडा और अमेरिका के विभिन्न शहरों में रहते हुए आजकल सिएटल में। कविताएँ लिखने का शौक है, जिनमें या तो एन.आर.आई. की त्रासदी का वर्णन होता है या फिर जीवन की विडंबनाओं में हास्य ढूँढ़ने का प्रयास। शब्दों से खेलना अच्छा लगता है। कविता लिखने की प्रेरणा संत कबीर के दोहों से मिली। छोटी कविता, शब्दों का खेल और बात की बात।
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एक साल पहले मेरे छोटे पुत्र मिहिर की अध्यापिका ने मेरी पत्नी मंजू से अनुरोध किया कि वे भारतीय संस्कृति की झलक उनकी कक्षा के सामने प्रस्तुत करें। मिहिर तब छह वर्ष का था और किंडरगार्टन में पढ़ता था। उसकी कक्षा में विश्व की अन्य संस्कृति से जुड़े हुए बच्चे भी थे। और ऐसा अनुरोध उनकी माताओं से भी किया गया था, ताकि हर संस्कृति की झलक पूरी कक्षा को मिल सके। आजकल कोई भी प्रस्तुति बिना पावरपॉइंट के संभव नहीं है। लिहाजा मंजु ने भी पावरप्वॉइंट का स्लाइड शो तैयार किया। पिछले कई वर्षों में हमने भारत की कई बार यात्रा की और हर बार वहाँ से कुछ-न-कुछ सामान लाते रहे। उनमें से कुछ वस्तुओं की प्रदर्शनी भी लगाई गई। वे मिहिर के सहपाठियों को भारत की संस्कृति की झलक दिखाने में उपयोगी साबित हुई। इस घटना को लेकर मेरे मन में एक जिज्ञासा जागी कि आखिर संस्कृति किसे कहते हैं ? भाषा, धर्म, खान-पान, वस्त्र-परिधान, कला, दर्शन, खेलकूद, रस्म-रिवाज, मिलने-जुलने के तरीके और रहने का ढंग। शायद इन सबको मिलाकर ही बनती है संस्कृति। जब मैंने अपने इर्द-गिर्द देखा तो नजर आया कि मैं कितना दूर चला आया हूँ अपनी संस्कृति से। मेरी मातृभाषा मालवी है। जब से रतलाम-सैलाना छोड़ा, उसे भी छोड़ दिया। इंजीनियरिंग की शिक्षा अंग्रेजी में हुई और फिर अमेरिका में कार्यरत होने की वजह से दिन में तो अंग्रेजी बोलने के अलावा कोई चारा नहीं था। मगर धीरे-धीरे परिवेश और संगत की वजह से हर वक्त अंग्रेजी ही बोलने लगा। गैर-भारतीय मित्रों के साथ तो अंग्रेजी बोलता ही था, भारतीय मित्रों के साथ भी अंग्रेजी बोलने लगा। उसकी वजह पहले तो यह थी कि हर भारतीय हिंदी नहीं बोल सकता। और अगर कोई हिंदी भाषी हो भी तो माहौल की वजह से अंग्रेजी बोलने में आसानी होती थी। जैसे कि आप कहना चाहें कि आज ऑफिस में क्या हुआ, तो उसे अंग्रेजी में बताना ज्यादा आसान लगता है। या अगर आप राजनीति के बारे में चर्चा करना चाहें तो जो टिप्पणी आपने अखबार में पढ़ी या टी.वी. पर सुनी, उसे ही कमोबेश दोहराएँगे। जाहिर है, अमेरिका में आप अंग्रेजी का अखबार ही पढ़ेंगे और टी.वी. पर भी अंग्रेजी में ही टिप्पणी सुनेंगे। तो आपकी चर्चा भी अधिकांश रूप से अंग्रेजी में ही होगी। यह तो रही दफ्तर और दोस्तों की बात। मगर धीरे-धीरे आप अपनी पत्नी से भी अंग्रेजी में ही बात करने लगते हैं। अगर कोई मतभेद हो तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि अपनी बात को अंग्रेजी में ही कहें। ऐसा लगता है कि अगर अंग्रेजी में कहें तो बात में दम होगा। 'Don't touch me.' ' Fine.' 'I don't know.' आदि-आदि। जब देश छोड़ा था, हवाई जहाज पकड़कर छोड़ा था। जाहिर है, हवाई जहाज में तो पेंट-शर्ट ही पहनकर चढ़ना था। उस दिन के बाद से पेंट-शर्ट-जैकेट उतरे ही नहीं। कभी किसी को सलवार-कमीज या कुरते-पाजामे में दूकान पर दूध-सब्जी-भाजी खरीदते देख लें तो शर्म आने लगती है–‘कैसे जाहिल इनसान हैं। हमारी नाक कटवा दी। जैसा देश, वैसा भेस।’ वगैरह, वगैरह। एकाध बार अगर किसी होली-दीवाली पर कुरता-पाजामा पहन भी लिया तो यह एहतियात जरूर रखा जाता है कि सीधे-सीधे वापस घर आया जाए। अगर किसी वजह से वहीं से सीधे ऑफिस जाना हो या बाजार जाना हो तो पेंट-शर्ट साथ में रखकर चलते हैं, ताकि ऐन-मौके पर परिधान बदल सकें। इस तरह भाषा त्याग दी संगत की वजह से। और कपड़े पहले त्यागे थे ठंडे मौसम की वजह से। मगर धीरे-धीरे उनकी वजह बदलती जाती है। अच्छी खासी गरमी होती है अमेरिका में भी। हम टी-शर्ट-शॉटर्स पहन सकते हैं, मगर कुरता-पाजामा नहीं। हर शादी में दुलहन खूब गहने पहनती है। मगर उसके बाद वे सीधे बैंक के लॉकर में शरण लेते हैं। साल में एक बार भी निकल आए तो गनीमत है। घर में रखें तो चोरी का डर है। घर में कोई भी व्यास रचित महाभारत नहीं रखता है। बहाना यह कि अगर इसे रखा तो घर में महाभारत हो जाएगी। रामायण भी नहीं रखते हैं। न गीता, न उपनिषद्, न वेद, न सूरदास, न रसखान। कई बहाने हैं। एक तो भाषा या तो हिंदी नहीं है और है तो वह क्लिष्ट है। हम कॉन्वेंट पढ़े-लिखे बच्चों को कहाँ समझ में आनेवाली है। और अगर गलती से किसी ने हमें रामायण, गीता आदि पढ़ते देख लिया तो क्या कहेंगे कि ये हिंदू फंडामेंटलिस्ट है या फिर जरूर हिंदू मदरसा चला रहा है। घर में पूजा-पाठ का भी नित्यकर्म नहीं है। घर खरीदने पर लोग गृहप्रवेश जरूर करवाते हैं किसी स्थानीय पंडित को पैसे देकर। उसके बाद तो बस दिन-रात की भागा-दौड़ी। पूजा करने के लिए नहाना जरूरी है। और यहाँ तो कई बार ऑफिस में मीटिंग इतनी जल्दी होती है कि बस हाथ-मुँह धोकर जाने में भी देर हो जाती है। नहाना-पूजा-नाश्ता तो दूर की बात है। और फिर पूजा में दीप-अगरबत्ती जलाई तो डर है कि कहीं मिलियन डॉलर में लकड़ी का बना घर जल-जलाकर राख न हो जाए। घंटी और शंख बजाने से अड़ोसी-पड़ोसी शिकायत करते हैं कि आप शोर कर रहे हैं। इसलिए कुछ लोग भगवान को किचन की अलमारी में बंद कर लेते हैं। कभी-कभी दरवाजा खोलकर हाथ जोड़ लिया, वही पूजा है उनके लिए। बाकी इस बैसाखी का सहारा लेते हैं कि ‘भगवान तो मेरे अंदर है। घंटी बजाना, दीप जलाना, भगवान की तसवीर-मूर्ति को तिलक लगाना सब पाखंड है।’ और एक हद तक यह बात सच भी है। मगर किसी कार्य का अगर नियम न हो तो वह कार्य कभी पूरा नहीं होता है। बच्चे नियम से स्कूल जाते हैं, इसीलिए शिक्षा पाने में सफल होते हैं। घर पर भी उन्हें शिक्षा दी जा सकती है, जो स्कूल में मिलती है। परंतु घर पर नियम-अनुशासन के अभाव में यह मुमकिन नहीं हो पाता है। यही बात व्यायाम पर भी लागू होती है। जब तक आप तय न कर लें कि मुझे हर सोम, बुध और शुक्र को 6 से 7 बजे तक दौड़ने जाना है, तो यह संभव ही नहीं है कि आप महीने में 4-5 बार से ज्यादा दौड़ पाएँगे। इसी तरह, भगवान तो आपके अंदर है, मगर आप नियमपूर्वक ध्यान करें, तो एक महीना बीत जाएगा और आप पाएँगे कि आपने भगवान् को याद ही नहीं किया। आजकल घरों में गणेशजी और नटराज की मूर्तियाँ खूब नजर आती हैं। मगर इन्हें साज-सजावट की वस्तु माना जाता है। इनके सामने आप जूते उतार सकते हैं। ये आपकी पीठ पीछे हो सकते हैं। आप इनके सामने शराब पी सकते हैं और जो चाहे खा सकते हैं। खाने की झूठी प्लेट रख सकते हैं। और उनके सामने ही टी.वी. पर हर तरह की फिल्म देख सकते हैं। भारतीय भोजन भी बहुत कम बनता है घरों में। जो कुँवारे लड़के हैं, उन्हें तो बना-बनाया बहाना मिल जाता है कि हमने कभी बनाया नहीं तो अब क्यों बनाएँ? और जो शादी-शुदा हैं, उनका यह तर्क कि भारतीय खाना बनाने में कई इल्लत हैं, अड़चने हैं। आटा गूँधो, रोटी बेलो, उसे तवे पर सेंको और फिर आग पर। बाप रे बाप! इतना काम ? ब्रेड में क्या बुराई है? सैंडविच सबसे अच्छी। सस्ती, सुंदर और टिकाऊ। और पास्ता भी बहुत अच्छा है। दफ्तर ले जाओ तो गर्व से सबके साथ मिल-बैठ के खा सकते हो। अगर दाल-रोटी हुई तो छुपकर अकेले, एक कोने में बैठकर खाना होगा। ऊपर से किचन में गरम करते वक्त दुनिया भर की बदबू जो फैलेगी, सो अलग। शर्म के मारे किसी को मुँह दिखाने के लायक नहीं बचेंगे। हाँ, ऑफिसवालों को भारतीय होटल में लंच करने के लिए जरूर ले जाएँगे और शान से बताएँगे कि ये क्या है और कैसे बनती है। और खुद भी एकाध बार शनिवार को छोले-भठूरे, आलू-टिक्की खाने के लिए किसी होटल में चले जाएँगे। मगर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे डायटिंग और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए वह भी कम हो जाता है। तो कुल मिलाकर हम न तो अपनी भाषा बोलते हैं, न अपनी संस्कृति के कपड़े पहनते हैं, न अपनी संस्कृति का खाना खाते हैं, न अपनी संस्कृति की किताब पढ़ते हैं, न अपनी संस्कृति के हिसाब से नित्यकर्म करते हैं। आखिर क्यूँ? वजह कई हैं। बहाने कई हैं। मगर सच पूछिए तो हमें अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं है। उलटा हमें लाज आती है। सामनेवाला सोचेगा कि हम अभी-अभी गाँव से आए हैं। इसकी जड़ क्या है? सोचता हूँ, कहाँ से शुरू करूँ? चलिए शुरू करता हूँ बच्चे के जन्म से। जच्चा यानी बच्चा की होनेवाली माँ, एक कामकाजी औरत है आजकल। उसका भी एक कैरियर है। वह बच्चे की डिलिवरी को भी एक प्रोजेक्ट की डिलिवरी की तरह देखती है। कलेंडर में एक दिन, एक समय निश्चित कर लिया जाता है। उस दिन वह पूरी तैयारी के साथ जाती है अस्पताल डिलिवरी के लिए। वहाँ से घर भी आती है तो जैसे कि कोई खास बात नहीं। कोई औपचारिकता नहीं। घर पर कोई स्वागत के लिए नहीं। एक कमरा जरूर सजा दिया जाता है बच्चे के लिए। वह लड़कों के लिए अलग होता है और लड़कियों के लिए अलग। रंगभेद यहीं से शुरू होता है। और फिर डिस्ने के जाने-पहचाने कार्टून चरित्रों से कोना-कोना सजा दिया जाता है। जैसे ही मेटर्निटी छुट्टी खत्म होती है, माँ तुरंत पहुँच जाती है काम पर। कैरियर जो चलाना है। और फिर घर के खर्चे कैसे पूरे होंगे? बच्चे को डे-केयर में डाल दिया जाता है। डे-केयर की सुविधा सुबह 6 से लेकर शाम की 6 बजे तक ही उपलब्ध होती है, पर इन 12 घंटे के एक-एक मिनट का पूरा-पूरा लाभ उठाया जाता है। और फिर रात को वही खाना बनाने-खाने की परेशानी तथा घर को सम्हालने की जिम्मेदारी। इन सबके बीच माहौल शांतिमय नहीं रह पाता। आदमी हाँफता ही रहता है हफ्ते भर। और फिर यही क्रम दुबारा अगले हफ्ते। बच्चा झूला झूलता है, पर माँ-बाप इतने व्यस्त हैं कि बैटरी का सहारा लेना पड़ता है। बच्चों को लोरियाँ अच्छी लगती हैं, पर वह भी सी.डी. के द्वारा ही सुनाई जाती है। ऐसा नहीं है कि माँ अच्छी गायक नहीं है, इसीलिए नहीं गाती है। वजह सिर्फ वक्त की है और अहमियत की है। कैरियर बनाना है तो बच्चे के लिए ये इलेक्ट्रॉनिक उपाय जरूरी हैं। शनि-रवि को जब डे-केयर बंद होता है तो टी.वी. का सहारा लिया जाता है–जो बच्चे को बहला सके, रिझा सके, और माँ-बाप के रास्ते से उसे हटा सके। सोचता हूँ कि जब बच्चा बड़ा होगा तो उसे बचपन कैसे याद आएगा? झूला जो अपने आप चल रहा था? लोरी जो दीवारों से आ रही थी? टी.वी. जो उसके अकेलेपन का साथी था? जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों की ओर मोहित होते चले जाते हैं–कभी वीडियो गेम्स, कभी एक्स-बॉक्स, कभी गेम-बॉय, कभी निनटेनडो। और तब जाकर माँ-बाप, जो तब तक बूढ़े होने लग जाते हैं, सोचते हैं कि बच्चे आखिर हमसे बात क्यों नहीं करते हैं? कोई घर आता है तो उनसे दुआ-सलाम क्यों नहीं करते हैं? बच्चे माँ-बाप के ही कदमों पर चलते हैं। आजकल चरण-स्पर्श का रिवाज खत्म हो चुका है। फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह में नए सितारे अमिताभ आदि के चरण-स्पर्श का अभिनय जरूर करते हैं। पर उसे घुटना-स्पर्श कहना उचित होगा। चलिए चरण-स्पर्श छोड़ दिया, पर क्या आपने हाथ मिलाना या गले लगाना सीख लिया? जी नहीं। अपनी संस्कृति तो हम भूल रहे हैं, पर साथ में ऐसा नहीं है कि हम किसी और संस्कृति को अपना रहे हैं। पूजा-पाठ करना छोड़ दिया पर ये नहीं कि चर्च जाना शुरू कर दिया। हमने अपना सांस्कृतिक ग्रंथ पढ़ना बंद कर दिया, पर यह नहीं कि किसी और ग्रंथ में रुचि जागी हो। वास्तव में हम संस्कृतिहीन होते जा रहे हैं। हमारे कोई उसूल नहीं हैं, कोई नियम नहीं हैं, कोई धर्म नहीं है, कोई दर्शन नहीं है, कोई अध्यात्म नहीं है, कोई नीति नहीं है, कोई कला नहीं है। गाना कोई सीखता नहीं, चित्रकारी करना कोई सीखता नहीं, नाटक कोई देखता नहीं, वाद्ययंत्र बजाना कोई सीखता नहीं, कविता-कहानी में कोई रुचि नहीं। फिल्में 3 घंटे की होती हैं तो वे जरूर देखी जा सकती हैं। किसी की मदद भी करने जाता नहीं। हर जरूरत के लिए ‘सर्विस’ जो तैयार है। एयरपोर्ट जाना हो तो शटल है, टैक्सी है। कार खराब हो तो ट्रिपल-ए है। बीमार हो तो डॉक्टर है। भूख लगे तो होटल है। कहीं रुकना हो तो मोटल है। सबसे कटे-कटे से रहते हैं। स्विच दबाते ही हो जाती है रोशनी सूरज की राह मैं तकता नहीं। गुलाब मिल जाते हैं बारह महीने मौसम की राह मैं तकता नहीं।इंटरनेट से मिल जाती है दुनिया की खबरें टी.वी. की राह मैं तकता नहीं।ई-मेल-मैसेंजर से हो जाती हैं बातें फोन की राह मैं तकता नहीं।डिलिवर हो जाता है बना बनाया खाना बीवी की राह मैं तकता नहीं।होटलें तमाम हैं हर एक शहर में लोगों के घर मैं रहता नहीं।जो चाहता हूँ वो मिल जाता है मुझे किसी की राह मैं तकता नहीं।किसी की राह मैं तकता नहीं, कोई राह मेरी भी तकता नहीं।कपड़ों की सलवट की तरह रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं रिश्ता यहाँ कोई कायम रहता नहीं।तत्काल परिणाम की आदत है सबको माइक्रोवेव में तो रिश्ता पकता नहीं।किसी की राह मैं तकता नहीं, कोई राह मेरी भी तकता नहीं।निष्कर्ष यह कि हमें अपनी संस्कृति पर शर्म आती है और दूसरी संस्कृति को अपनाने के लिए वक्त नहीं है। क्योंकि माँ-बाप दोनों हाथ से सोना बटोरने में लगे रहते हैं। अंत में आखिर क्या रह जाएगा, जो वे बच्चों के लिए छोड़ जाएँगे? क्या बैंक बैलेंस ही सबकुछ है? जबकि हम जानते हैं कि मुद्रास्फीति की वजह से छह शून्य का बैंक बेलेंस भी काफी नहीं रहेगा अगली पीढ़ी के लिए। एक घर खरीदने में ही खर्च हो जाएगा। और घर में हर वस्तु वैसे ही साल-दो-साल में पुरानी हो जाती है। टी.वी., बी.सी.आर., डी.वी.डी. प्लेयर, फ्रीज, कारपेट, कार, आई-पाड आदि सब बहुत जल्दी पुराने हो जाते हैं। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की किताबें चार साल बाद ही कचरे में फेंकनी पड़ती हैं। यह विचार का विषय है कि हम अपनी संस्कृति को कहाँ लेकर जा रहे हैं। क्या यह शून्य की ओर अग्रसर है? हमारे देश, हमारे संस्कृति ने विश्व को शून्य से अवगत कराया, शून्य के प्रयोग करना सिखाया। लेकिन आज हर क्षेत्र में हम शून्य हैं, नगण्य हैं। जिस पर हम गर्व कर सकते हैं, उस पर हम शर्म करते हैं। आज हर कोई जिम जाता है कसरत के लिए, जबकि घर बैठे योगासन किए जा सकते हैं। जब पश्चिम के देश इसे अपनाने लगते हैं तो हम भी इसके दीवाने हो जाते हैं। इंदीवरजी ने गीत लिखा था, फिल्म पूरब और पश्चिम में–‘भारत का रहनेवाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ।’ दूसरा गीत है राजिंदर कृष्ण द्वारा लिखा, फिल्म सिकंदर-ए-आजम का–‘जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा।’ इन दोनों गीतों में जितनी अच्छाइयाँ गिनाई गई हैं–वे सब आज नदारद हैं। हमारे देश में एक समय नालंदा विश्वविद्यालय था–जो कि विश्वविख्यात था। यहाँ दूर-दूर से लोग शिक्षा पाने आते थे। और ये उस समय जब हवाई जहाज भी नहीं थे। इंटरनेट नहीं था। तगड़ी मार्केटिंग नहीं थी। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि हमारे पास ब्रह्मास्त्र थे। आज हम अपनी सुरक्षा विदेशी ताकतों द्वारा बनाए गए हथियारों से करते हैं। कितनी दयनीय स्थिति है। दुश्मन से हम अपनी सुरक्षा के उपाय पूछते हैं। पंचतंत्र की कहानी याद आ गई कि शेर ने बिल्ली से हर तरकीब सीखनी चाही, लेकिन होशियार बिल्ली ने शेर को पेड़ पर चढ़ना नहीं सिखाया। हमारे दुश्मन भी हमें मदद तो करते हैं, पर यह ध्यान रखते हैं कि हम उन पर आजीवन निर्भर रहें। हमारे पास आयुर्वेद था। मगर हर मरीज दौड़ा जा रहा है अस्पताल, जहाँ पश्चिमी चिकित्सा अनुसार इलाज किया जाता है। नालंदा विश्वविद्यालय आज एक खँडहर है। ब्रह्मास्त्र और पुष्पक विमान काल्पनिक वस्तुएँ हैं। इंद्रप्रस्थ नगर विलीन है। हमारा दर्शन, हमारा अध्यात्म, हमारी कला, हमारी नीति–ये सब हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग थे। सब धीरे-धीरे विलुप्त हो गए और हो रहे हैं। कैसे हुआ यह सब? इतना तो मुझे ज्ञात नहीं। हो सकता है कि उस वक्त के जनसमुदाय ने भी ऐसे कदम उठाए हों, जैसे कि आज हम उठ रहे हैं। वे नालंदा, आयुर्वेद, ब्रह्मास्त्र, दर्शन, अध्यात्म, नीति से दूर होते गए। और हम भी आज इनसे और दूर होते जा रहे हैं। किसी से कहो तो कोई मानता नहीं है। सिर्फ एक जवाब–फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।
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