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कविता
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| नववर्ष पर काव्यांजलि |
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बृजेंद्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’
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नया सबेरा नए साल का नया सबेरा, जब अंबर से धरती पर उतरे, तब शांति, प्रेम की पंखुरियाँ धरती के कण-कण पर बिखरें,चिड़ियों के कलरव गान के संग, मानवता की शुरू कहानी हो, फिर न किसी का लहू बहे, न किसी आँख में पानी हो,शबनम की सतरंगी बूँदें, बरसे घर-घर द्वार, मिटे गरीबी, भुखमरी नफरत की दीवार,ठंडी-ठंडी पवन खोल दे, समरसता के द्वार सत्य, अहिंसा और प्रेम सीखे सारा संसार,सूरज की ऊर्जामय किरणें, अंतरमन का तम हर ले, नई सोच के नव प्रभात से, घर-घर मंगल दीप जलें।।
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