संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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चवालीस के चक्कर
भाऊ साहेब मराठे
मुरारी अपने बेटे रघु के अमरीका आया। उसे ढाई महीने हो गए। उसकी पत्‍नी चमेली का भी साथ आने का प्‍लान था, परंतु उनकी छोटी बेटी के फैमिली प्‍लानिंग में बाधा आई और प्रसूति का समय नजदीक आने से चमेली का आना कैंसिल हो गया।
रघु की अमरीका में अच्‍छी नौकरी थी। दो बेड रूमवाला अपार्टमेंट किराए पर लेकर बड़े ठाठ से अकेला रहता था। उसने पिताजी से कहा था कि आते समय रुपए खर्च कर डॉलर नहीं खरीदिएगा, क्‍योंकि वह खुद यहाँ के खर्च का बंदोबस्‍त करेगा। फिर भी मुरारी ने हाँ-ना करते-करते दो सौ डॉलर खरीद ही लिये। उन्‍हें उसी समय दस हजार रुपए का तगड़ा बोनस जो मिला था।
वैसे तो मुरारी को मालूम था कि अमरीकी डॉलर रुपए की तुलना में कितना भारी है। फिर भी जब करीब-करीब दस हजार रुपयों के बदले में बीस-बीस डॉलर के केवल दस ही नोट उसके हाथ में थाम दिए गए तो उसे एक झटका तो अवश्‍य लगा था। जानकारी रहना और बात थी, फिर भी उसका प्रत्‍यक्ष अनुभव दुःखदायक था। एक डॉलर का मूल्‍य चवालीस रुपए से भी अधिक! डॉलर की यह पहली पहचान मुरारी को पीड़ा देकर गई। आगे चलकर चवालीस के इस चक्‍कर में पूरी तरह फँसने की मानो यह पूर्व सूचना थी।
रघु के घर आने के बाद मुरारी के दो दिन दिमाग और घड़ी के समायोजन में बीत गए। तीसरे दिन रघु ने उसे एक सौ डॉलर जेब खर्च के लिए दे दिए और कहा, ‘‘अगर आप भारत से डॉलर लाए ही हैं तो उन्‍हें पेटी में ही बंद रखें। यहाँ के लिए मैं बराबर देता रहूँगा।’’
अपार्टमेंट बड़े रास्‍ते के नजदीक पर फिर भी थोड़ा अंदर था। पास में सभी तरह की दुकानें थीं। एक मील की दूरी पर इंडियन ग्रोसरी स्‍टोर भी था, जहाँ पर अपने काम की चीजें मिल जाती थीं। बस की सुविधा अच्‍छी थी। लेकिन डे पास की कीमत तीन डॉलर

यानी एक सौ पैंतीस रुपए थी। मुरारी उनसठ वर्ष का जो था।
मुरारी के बचपन में उसकी माँ बीच-बीच में काफी बीमार रहती थी। इसलिए मुरारी को रसोई बनाने का अनुभव बचपन से ही था। इसका उपयोग अब रघु के घर में होनेवाला था। बाजार में जाकर मुरारी भाँति-भाँति की ग्रोसरी लाने लगा। शुरू में चीजों के भाव देखते ही उसका हाथ झटक जाता था। पहले दो-तीन दिन तो वह सिर्फ आलू और प्‍याज ही खरीदकर वापिस आ गया था। भावों की तुलना तुरंत हो सके, इस‌लिए उसने चवालीस का पहाड़ा बनाकर कंठस्‍थ कर लिया था। फिर भी यहाँ पर वजन पौंड यानी रतल में होने से और दिक्‍कत होती थी। तुलना के लिए पहले चवालीस और फिर 2.2 से गुणा करने के बजाय एक साथ ही एक सौ से गुणा करने से काम बन जाता था। तब से ग्रौसरी वगैरह के भावों की तुलना आसान हो गई। माल लेना हो-न-हो, मुरारी भावों की तुलना में मगन रहने लगा।
प्‍याज 30 सेंट प्रति पौंड? अरे यह तो तीस रुपए किलो के बराबर! अरे वाह! मुंबई में तो यह साठ रुपए किलो तक बिक रहा है। आलू चालीस से पचास सेंट पौंड के हिसाब। मतलब 40 से 50 रुपए किलो। यह भी अच्‍छा है। चलो आज प्‍याज मिलाकर आलू की सब्‍जी बनेगी और कल आलू मिलाकर प्‍याज की। दो-तीन दिन ऐसा ही होता रहा और तब रघु को शक हो गया। वह बोला, ‘‘पिताजी, भावों की तरफ देखकर मत घबराइए। अपनी तनख्‍वाह मैं रुपयों में नहीं कमाता, डॉलर में कमाता हूँ।’’ मुरारी को यह मालूम तो था, पर फिर भी पुरानी आदत।
अगले दिन बाजार जाकर उसने पत्तागोभी, फेंच बीन्‍स, टमाटर, लौकी, बैंगन इत्‍यादि खरीदने की हिम्‍मत जुटाई, जो कि 60 रु किलो से लेकर 300 रुपए किलो तक मिलीं। परवल की तरकारी उसे बहुत अच्‍छी लगती थी, लेकिन उसका दाम सात डॉलर पर पाउंड यानी सात सौ रुपए प्रति किलो होने के कारण मुरारी को परवल में कड़वे करेलों का स्‍वाद आने लगा। और कढ़ी

पत्ती? तीस-पैंतीस पत्तियों के पचास रुपए? तो कढ़ी पत्तों का इस्‍तेमाल बंद। दिन-ब-दिन मुरारी चवालीस के चक्‍कर में पूरी तरह फँसता गया।
और एक दिन रघु पिताजी के लिए बस का पास खरीदकर लाया। कीमत उनतालीस डॉलर यानी लगभग सत्रह सौ रुपए। अरे! यह बस का पास है या टैक्‍सी का? इतना महँगा पास वसूल करने के लिए तो दिन-रात बस में ही गुजारने पड़ेंगे। यह तो ‘आल यू कैन इट’ वाली बात हुई। तब से मुरारी और बस का घनिष्‍ठ नाता जुड़ गया। दोपहर बारह बजे सैंडविच खाकर मुरारी बस पकड़ता और दोपहर की झपकी एक दूर तक जानेवाली बस में ही ले लेता।
चवालीस का चक्‍कर मुरारी के सिर पर से उतरना मुश्‍किल हो गया। अब वह ‘सेल’ की एड्स देखकर शॉपिंग करने लगा। इसके लिए चाहे उसे शहर के इस कोने से दूसरे कोने तक ही क्‍यों न जाना पड़े। घर के इस्‍तेमाल के लिए भाँति-भाँति की चीजें आने लगीं। टूथ पेस्‍ट, टूथ ब्रश, शेविंग नीड्स, बाथ सोप, बैटरी सेल, ऑडियो टेप, पॉपकार्न पैकेट्स, कैंड फुड के टिन, मूँगफली और कैशू पैकेट्स इतने सस्‍ते मिले कि ढेर सारा सामान घर में आ पहुँचा कि रघु को दो-तीन बरसों तक खरीदारी की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा दो-तीन गराज सेल में से भी मुरारी ने दूसरों के घर का कचरा अपने घर में सस्‍ते में मिल जाने के कारण इकट्ठा कर लिया।
रघु शनीचर-इतवार को भी थोड़ी देर के लिए काम पर जाता था। फिर भी एक वीक एंड पर पिताजी को अपनी गाड़ी में बिठाकर आस-पास की सैर करवाई। एक पंप पर रघु ने पेट्रोल खरीदा, तब पिताजी ने भाव देखा–दो डॉलर पर गैलन। गैलन का लीटर से 3.8 का संबंध था। मुँहजबानी हिसाब करके मुरारी को पता चला कि यह भाव लीटर में 22 रुपए लीटर होता है। यह तो मुंबई का ही भाव हुआ। यह सोचकर मुरारी को गाड़ी की सैर सुखद लगी। फिर दो महीने ठहरकर एक दिन जब उसे बाल कटवाने सैलून में जाना पड़ा तब उसके ‌सिर के साथ उसकी जेब की भी पाँच सौ रुपए की हजामत हो गई।
दिन बीते जा रहे थे। ढाई महीने निकल जाने पर अब सिर्फ पंद्रह-बीस दिन बाकी थे। मुरारी थोड़ा-थोड़ा बदल रहा था। बात-बात पर ‘थैंक्‍यू’ कहने की आदत पड़ रही थी। कभी-कभी ‘यू आर वेलकम’ का मंत्र भी मुँह से निकालने लगा था। वहाँ भारत में छोटी बेटी की प्रसूति हो गई थी। बेटा पैदा हुआ था। चमेली आनंद सागर में डूब रही थी। आनंद का यह भी एक कारण था कि मुरारी इस अवसर पर हजारों मील दूर था। नहीं तो मदद करने के बदले कुछ-न-कुछ तिकड़मबाजी करके सबको सता सकता था। लेकिन अब मुरारी को बार-बार घर की और चमेली की याद सताने लगी थी।
मुरारी सपत्‍नीक अमरीका जाने के बदले अकेला जा रहा है, यह समाचार जब उसके दफ्तर में फैल गया तब रूसी उदवाडिया ने उसे ‌हाथ हिला-हिलाकर कांग्रैच्‍युलेट किया था। बोला था, ‘मुरारी तमे तो तकदीरवाला छो। बैंक्‍वेट पर जाने के टाइम अपना सैंडविच साथ मे कायकू लेके जानेका? सूँ?’
मुरारी को यहाँ पर कुछ बैंक्‍वेट का पता नहीं चला था। न तो वह वैसेवाले बैंक्‍वेट की तलाश में था। अपने घर की सैंडविच पर वह संतुष्‍ट था। उदवाडिया माने या न माने।
वापिस जाने में केवल एक हफ्ता ही बचा ‌था कि मुरारी को एक भारतीय कम्‍यूनिटी सेंटर नजदीक के शहर में होने की खबर मिली। केवल एक ही बुधवार वह उस सेंटर पर जा सका। वहाँ पर उसने एक विदुषी से अपने बेटे के हिल टॉप पर के घर की दर्द भरी कहानी सुनी। रघु जिस रफ्तार से तरक्‍की कर रहा था, उस हिसाब से शायद दो-चार वर्षों में हिल हाउस के काबिल हो सकता था। मुरारी को लगा कि यदि वैसा हो जाए तो बुढ़ापे में चमेली के साथ उसकी हालत भी वैसी दयनीय हो सकती है। इस पर उसे लगा कि चवालीस के चक्‍कर में आकर हाथ अटकाने में उसने एक तरह की गलती ही की है। अगर वह दिल खोलकर धूम-धड़ाके से खर्च करता, डॉलर उड़ाता, तो शायद रघु का हिल टॉपवाला घर बनने में थोड़ी अधिक देरी लगती।