|
|
|
अन्य
|
| हिंदी राष्ट्रभाषा : एक चिंतन |
|
डॉ. मधुसूदन झवेरी
|
508-946-6091 mjhaveri@ymassd.edu |
|
|
|
सारे देश की भाषा, सारे राष्ट्र में चले ऐसी भाषा, अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी के दो विभाग हैं–पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी। पश्चिमी हिंदी शौरसेनी और पूर्वी हिंदी अर्धमागधी की वंशज है। परिणामतः मूल दृष्टि से हिंदी का एक भाग भारतीय पश्चिमी बोलियाँ राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी इत्यादि के साथ अधिक निकट हैं और दूसरा भाग पूर्वी हिंदी, पूर्वी बोलियाँ–बिहारी, बँगला, उड़िया के निकट हैं। हिंदी क्षेत्र भी अन्य भाषाओं के क्षेत्र से अधिक विस्तृत है। उसकी पश्चिमी सीमा पंजाब है और दक्षिणी सीमा मध्य प्रदेश की दक्षिणी सीमा है। इस प्रकार हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो आर्य भाषाओं में सभी के बीच की भाषा है। बँगला, पंजाबी, गुजराती, मराठी आदि बोलियाँ अर्थात् दूर की भाषाएँ हैं, कि सभी का मूल एक होने के उपरांत एक-दूसरे से नितांत दूर और अलग हैं। देश की भाषाओं में उर्दू एक ऐसी भाषा रही है, जो हिंदी की प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार थी। उर्दू वास्तव में कोई अलग भाषा नहीं, खड़ीबोली जो पश्चिमी हिंदी की उपभाषा थी, वह मुसलमानों के संसर्ग से अरबी और फारसी के शब्द भंडार और व्याकराणादि से प्रभावित हो गई। देश के एक वर्ग के लोग ऐसी खड़ी बोली का प्रयोग करने लगे, जिसमें अरबी और फारसी शब्द तथा रीतियों का आधिक्य था, खड़ी बोली की इस शैली विशेष का नाम उर्दू हो गया। (आरंभ में) प्रारंभ में हिंदी और उर्दू का कोई (आपस में) विरोध नहीं था। हिंदी की साहित्यिक भाषा में उर्दू के शब्द अनिवार्य रूप से घुसकर स्वीकृत हो चुके हैं। उर्दू के शब्दों में प्रवेश कराने का ऐसा श्रेय दूसरी आर्य भाषाओं को प्राप्त हुआ नहीं है। बँगला, मराठी, गुजराती, जो देश की श्रेष्ठ साहित्यिक भाषाएँ हैं, वे अपने में उर्दू शब्दों को बिलकुल स्थान देती नहीं हैं। केवल पंजाबी, सिंधी, कश्मीरी में ही उर्दू ने घर बनाया है। इस कारण उर्दू भाषा ऐसी भाषा है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, उड़ीसा, आसाम, बिहार और मध्य प्रदेश एवं मद्रास (सारा दक्षिण–चार प्रांत) प्रांतों में बिलकुल व्यवहार में नहीं आ सकती है। इन प्रांतों के मुसलमान भी व्यवहार में प्रादेशिक बोलियों का उपयोग करते हैं, जिसमें उर्दू की गति (चलन) नहीं। इस प्रकार हिंदी ही एक ऐसी मध्यस्था भाषा है, जो एक और सभी आर्य भाषाओं की बीच की भाषा है। डॉ. मधुसूदन झवेरी का निष्कर्ष : 1. हिंदी को ‘अपने राष्ट्र भाषा’ कहकर उल्लेख किया गया है। 2. हिंदी को आर्य भाषाओं में बीच की भाषा माना है। 3. संस्कृत प्रचुर हिंदी को ही सारे भारत में स्वीकृत कराने में न्यूनतम कठिनाइयाँ अपेक्षित हैं। (प्रचुर का अर्थ विपुलता है।)
|
|
|