संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
अनुक्रमणिका
 
सम्पादकीय
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कविता
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रोमिओ-जिहाद
महेश चंद्र द्विवेदी
आज दोपहर मैं कुतुबमीनार से लौटते समय एकांत में निर्मित एक मकान के पीछे से गुजर रहा था, तब मेरी दृ‌ष्‍टि किसी के लेटर-पैड के कुछ पृष्‍ठों पर पड़ी थी। जिज्ञासा के वशीभूत ही मैंने वे कागज उठा लिए थे। उनमें प्रथम पृष्‍ठ पर एक छोटा सा पत्र था, और आगे अपने पर बीती एक कहानी। इन्‍हें मैं अक्षरश नीचे दे रहा हूँ।
महोदय,
मैं यह पत्र खिड़की से बाहर फेंक रही हूँ, क्‍योंकि मेरे मकान में बाहर से ताला लगा हुआ है और इसका टेलीफोन का तार काट दिया गया है। मेरी विनती है कि इसे किसी समाचार-पत्र के संपादक को पहुँचा दें, जिससे वह इसे प्रकाशित कर अन्‍य नवयुवतियों को संसार के छल-छद्म से अवगत करा सकें। मैंने अपना जीवन नष्‍ट कर लिया है और अपने परिवार के प्रति इतना बड़ा अपराध किया है कि मैं लज्‍जावश अपना वास्‍तविक नाम नहीं बता सकती हूँ। मैं अपनी कहानी श्रद्धा के नाम से ही आगे लिख रही हूँ।
आपकी आभारी रहूँगी,
श्रद्धा

‘आइए बैठिए!’ उस सुदर्शन युवक ने अत्‍यंत शालीनता से श्रद्धा से कहा था। साथ ही अपनी सीट पर उठकर बैठ गया था। प्रयागराज एक्‍सप्रेस के स्‍लीपर कोच में बीच की बर्थ श्रद्धा के नाम आरक्षित थी। नीचेवाली बर्थ उस युवक की थी। श्रद्धा को इलाहाबाद से अलीगढ़ जाना था। श्रद्धा का मन प्रसन्‍न था, परंतु उद्वेलित था। उस युवक के सौम्‍य व्‍यवहार से श्रद्धा के हृदय को आ‌श्‍वस्‍ति मिली थी।
कुछ मिनट पश्‍चात् ही ट्रेन चल दी थी। ट्रेन की सीटी सुनकर श्रद्धा के नेत्रों में आँसू छलक आए थे। उसके पिता भी असहज हो गए थे और उसके सिर पर अपना हाथ रखकर उसे मूक-सांत्‍वना देने लगे थे। फिर वह डिब्‍बे से नीचे उतरकर हाथ हिलानेवालों की भीड़ में शामिल हो गए थे। उनके निगाह से ओझल हो जाने पर श्रद्धा का ध्‍यान डिब्‍बे के अन्‍य यात्रियों पर गया था। डिब्‍बा पूरा भरा हुआ था। ‘कोरीडोर’ में कठिनाई से चायवाले, कंडक्‍टर, टी.टी. आदि आ-जा पा रहे थे। श्रद्धा जब कुछ सहज हो गई, तब श्रद्धा के बगल में बैठा वह युवक बड़े सौम्‍य भाव से बोला था, ‘आपको कहाँ जाना है?’
‘अलीगढ़ तक।’ संकुचित-सी श्रद्धा ने संक्षिप्‍त-सा उत्तर दिया था।
‘अच्‍छा अलीगढ़ तो मुझे भी जाना है।’ संयोगजनित प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए वह युवक किंचित् मुसकराकर बोला था।
श्रद्धा ने भी मंद स्‍मित के द्वारा अपनी प्रसन्‍नता प्रकट कर दी थी। युवक ने अगला प्रश्‍न किया था, ‘क्‍या आप वहाँ पढ़ती हैं ?’
‘मैं ए.एम.यू. में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लेने जा रही हूँ।’
‘वाह! मैं वहाँ इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स में चौथी साल में पढ़ रहा हूँ। मेरा नाम समीर है। आपका नाम क्‍या है?’ कहते हुए समीर के चेहरे पर उत्‍फुल्‍लता का भाव उकेर गया था।
श्रद्धा भी इस आकस्‍मिकता से प्रभावित हुए बिना न रह सकी थी और उसने सस्‍मित समीर को देखते हुए अपना नाम बता दिया था। तभी डिब्‍बे के अन्‍य यात्री अपने-अपने केबिन की लाइट बुझाकर सोने का उपक्रम करने लगे थे और समीर व श्रद्धा भी खड़े हो गए थे। श्रद्धा की बीचवाली बर्थ नीचे गिराने में समीर ने अपनी तरफ की सिटकनी खोलकर और बर्थ को पकड़कर उसकी सहायता की थी। फिर श्रद्धा के लेटने हेतु ऊपर चढ़ते समय उसने मुसकराकर गुड नाइट भी कहा था। श्रद्धा प्रसन्‍नतापूर्वक गुड नाइट कहते हुए अपनी ‌बर्थ पर चढ़ गई थी।
श्रद्धा ने इसी वर्ष इंटरमीडिएट पास किया था। वह प्रथम प्रयास में ही अलीगढ़ मुसलिम युनिवर्सिटी की इंजीनियरिंग की लिखित परीक्षा में चयनित हो गई थी, परंतु उसे साक्षात्‍कार के उपरांत अंतिम सूची में चुन लिये जाने की आशा बहुत कम थी। अंतिम सूची में नाम आ जाने पर श्रद्धा एवं उसके परिवारवालों को जितनी प्रसन्‍नता हुई थी, उतना ही आश्‍चर्य भी हुआ था। उन्‍होंने सुन रखा था कि ए.एम.यू. में मुसलिमों के अतिरिक्‍त अन्‍यों को कम ही भरती किया जाता है। उन्‍हें यह जानकर और आश्‍चर्य हुआ था कि श्रद्धा के अतिरिक्‍त अन्‍य अनेक हिंदू लड़कियों का भी चयन हुआ था।
नवयौवन की अवस्‍था में जीवन में कुछ नया घटित होने एवं कुछ नया कर गुजरने की ललक किसे नहीं होती है? श्रद्धा को भी थी। बर्थ पर लेटते ही वह कल से प्रारंभ होनेवाले अपने नए जीवन के स्‍वर्णिम विचारों में खो गई थी।
‘श्रद्धा! उठो, अलीगढ़ स्‍टेशन आ गया है।’’ श्रद्धा ने यह सुनकर अचकचाकर आँख खोली। आँख खुलते ही वह समझ गई कि यदि समीर ने उसे जगाया न होता तो वह सोती ही रह जाती। उसके मुख पर एक लज्‍जापूर्ण कृतज्ञता का भाव आया। उसने जल्‍दी-जल्‍दी अपना खुला सामान बाँधना प्रारंभ किया और समीर श्रद्धा का सामान बाँधने में उसकी सहायता करने लगा था। समीर ने उसका सामान प्‍लेटफार्म पर रखने में भी उसकी सहायता की। यह ब्राह्मवेला थी और प्‍लेटफार्म पर जहाँ यह डिब्‍बा रुका था, वहाँ अँधेरा सा था तथा उतरकर जानेवाले यात्रियों के ‌अतिरिक्‍त सुनसान था। समीर वहीं रुककर श्रद्धा का रक्षक बनकर तब तक खड़ा रहा, जब तक उसे लेने के लिए उसके पापा के मित्र नहीं आ गए थे। उनके दिखाई पड़ते ही वह ‘आई हार्टिली इंजोयेड योर कंपनी, सो लोंग।’ कहकर चला गया था। श्रद्धा उसे जाते हुए पीछे से देखती रही थी।
रिक्‍शे से उतरकर ए.एम.यू. के रजिस्‍ट्रार ऑफिस की तरफ बढ़ते हुए श्रद्धा की घबराहट बढ़ रही थी–एक तो इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी और फिर इतनी भीड़!
रजिस्‍ट्रार ऑफिस में जिस काउंटर पर एडमीशन फार्म मिल रहे थे, वहाँ लंबी लाइन लगी हुई थी। श्रद्धा उस लाइन का अंत बनकर खड़ी हो गई थी। लगभग आधे घंटे तक धीरे-धीरे आगे सरकते हुए उसने काउंटर पर बैठे बाबू से एडमीशन फॉर्म माँगा, तो वह झुँझलाहट के साथ बोला था, ‘अपना क्‍लास तो बताइए।’
श्रद्धा ने अपने को संयत कर कहा था, ‘सिविल इंजीनियरिंग फर्स्ट इयर।’
फॉर्म लेकर वह एक सीढ़ी पर आकर बैठ गई थी। मन पर एक नियंत्रणविहीन घबराहट हाबी हो रही थी। साहस बटोरकर उसने फॉर्म पर अपना नाम लिखना प्रारंभ किया ही था कि सामने से आवाज आई, ‘अरे श्रद्धा, तुम!’
समीर का स्‍वर उसे ग्रीष्‍म में तपते व्‍यक्‍ति को शीतल पुरवाई के झोंके के समान लगा था। मुँह उठाकर वह उसकी ओर देखकर मुसकरा दी थी। समीर फिर बोला था, ‘तुम खूब मिल गईं।’ फिर उसके हाथ में फॉर्म को देखकर बोला, ‘अच्‍छा, तो फार्म भरने में कठिनाई हो रही है। लाओ मैं भरवा दूँ।’
उसने बिना कोई ना-नुकूर किए फॉर्म समीर की ओर बढ़ा दिया था। समीर उससे उसका विवरण पूछकर फॉर्म पर चुपचाप लिखने लगा था। जन्‍मतिथि बताने पर वह उसके नेत्रों में देखकर मंद स्‍मित के साथ बोला था, ‘अभी तुम अठारह साल की ही हो! लगता है फर्स्ट अटेंप्‍ट में ही आ गई हो।’
श्रद्धा नहीं समझ पाई कि समीर के स्‍वर में कितना प्रशंसा का भाव था और कितना प्रसन्‍न करने का, परंतु वह समीर को देखते हुए मुसकराकर बोली थी, ‘हाँ’। समीर ने न केवल फॉर्म भरा वरन् फॉर्म को रजिस्‍ट्रार ऑफिस में जमा कर रसीद प्राप्‍त कर श्रद्धा के हाथ में थमाने के पश्‍चात् ही उसने विदा ली थी। श्रद्धा समीर के प्रति कृतज्ञता से अभिभूत हुए बिना न रह सकी थी।
होस्‍टल में श्रद्धा की रूममेट आयशा थी–बड़े हँसमुख स्‍वभाव की चंचला। श्रद्धा के कमरे में घुसते ही चहककर बोली थी, ‘अरे श्रद्धा! मैं पिछले दो दिन से तुम्‍हारा इंतजार करते-करते बोर हो चुकी हूँ। इब्‍तिदा से ही इस तरह सताने लगना कहाँ की शराफत है?’
आयशा के मुख पर स्‍वागत का खिलंदड़ी भाव इस तरह नाच रहा था कि श्रद्धा के चेहरे पर आश्‍वस्‍ति एवं प्रसन्‍नता का भाव प्रस्‍फुटित हुए बिना न रह सका था। पहले दिन ही आयशा श्रद्धा की हृत्‍सहचरी बन गई थी। दोनों बड़ी रात तक आपस में बतियाती रही थीं। अगली प्रातः कक्षा में जाने के लिए तैयार होते समय श्रद्धा का मन उद्विग्‍न था–वह अभी तक लड़‌कियों के विद्यालय में पढ़ी थी और उसके मन में सबसे बड़ा भय था कि वह लड़कों से कैसे व्‍यवहार करेगी? वह कंघी से अपने बाल सँवारते हुए इन्‍हीं विचारों में खोई हुई थी कि आयशा की आवाज ने उसे झकझोरा, ‘अमाँ क्‍या बाल ही काढ़ती रहेगी? क्‍या पूरे क्‍लास पर बिजली गिरानी है?’
श्रद्धा ने जल्‍दी से चोटी गूँथ ली और आयशा के पीछे चल दी थी। आयशा के प्रति सखीभाव के अतिरिक्‍त एक अभिभावक जैसा भाव भी श्रद्धा के मन में अंकुरित होने लगा था। कक्षा में पहुँचते ही आयशा थोड़े से समय में ही सहपाठियों में घुल-मिल गई, परंतु संकोची स्‍वभाव के कारण श्रद्धा उनसे खुलकर बात नहीं कर पा रही थी। आयशा उसकी मनोदशा को समझते हुए उसे सबसे परिचित कराती रही थी।
दिन बीतने लगे और श्रद्धा आयशा के प्रति अधिकाधिक प्रेम, कृतज्ञता एवं निर्भरता के भाव से भरती गई।
‘श्रद्धा!आज की रात इंट्रोडक्‍शन नाइट है। मैंने सुना है कि इंट्रोडक्‍शन के नाम पर सीनियर्स खूब रैगिंग करते हैं और दूसरी तमाम ओछी हरकतें भी करते हैं। मुझे तो बड़ा डर लग रहा है और मैं तो अपनी खालाजात बाजी, जो यहीं शहर में रहती हैं, के यहाँ जा रही हूँ। मैं तो कहूँगी कि तुम भी वहीं चलो। बाजी तुम्‍हें देखकर खुश ही होंगी। उस दिन क्‍लास से लौटने के बाद आयशा ने जब श्रद्धा को यह सूचना दी थी, तो उसकी जान सूख गई थी। फिर भी किसी अजनबी मुस‌लिम के घर में रात बिताने का साहस वह नहीं जुटा पा रही थी। ‘परिचय-रात्रि’ के भय के बावजूद श्रद्धा ने आयशा का आमंत्रण स्‍वीकार नहीं किया था। वह अपने मन के भय को छिपाने हेतु अपनी चारपाई पर तकिए से मुँह ढँककर लेट गई थी। आयशा अपने जाने की तैयारी करती रही थी। सायंवेला होते-होते श्रद्धा तंद्रित हो गई थी, जब उसने आयशा की चहकती आवाज सुनी, ‘अरे बाजी आप!’
श्रद्धा अचकचाकर अपनी चारपाई पर उठ बैठी थी। प्रथम दृष्‍टि में बाजी श्रद्धा को अच्‍छी लगी थीं–विशेषतः इसलिए भी कि उसने कल्‍पना की थी कि बाजी कोई दुबली-पतली पान से काले हुए दाँतोंवाली और सूखे से चेहरेवाली महिला होंगी, परंतु बाजी तो एक हँसमुख युवती थीं। बाजी ने आयशा का उत्तर देने के बजाय श्रद्धा की आँखों में प्‍यार से निहारते हुए कहा था, ‘अच्‍छा, तो यह है श्रद्धा।’
अब आयशा ने उत्तर दिया, ‘यही है श्रद्धा, जो आपके यहाँ न चलने की कसम खाए बैठी है।’
‘भई, ऐसी क्‍या नाराजगी है हमसे? हम भी तो जानें।’ कहते हुए बाजी श्रद्धा की चारपाई पर बैठ गई थीं और उसका हाथ अपने में ले लिया था। बाजी के खुले एवं प्‍यार भरे व्‍यवहार से श्रद्धा अभिभूत हो रही थी। उससे बन नहीं पड़ रहा था कि वह क्‍या उत्तर दे और उसके अंतर्द्वंद्व को भाँपते हुए आयशा बोल पड़ी थी, ‘बाजी, नाराजगी नहीं, नखड़े हैं। हमें तो साफ मना कर दिया है। अब आप मना सकें तो बात और है।’
बाजी श्रद्धा की आँखों में झाँकती हुई बोलीं, ‘श्रद्धा, तुम्‍हें अंदाजा नहीं है कि कभी-कभी सीनियर लड़कियाँ फ्रेशर्स की क्‍या दुर्गत कर देती हैं। मेरी मानो तो आज बचकर ही रहो।’ श्रद्धा को सोच में पड़ा देखकर बाजी आगे कहने लगीं–
‘‘शायद तुम्‍हें यह झिझक हो कि मेरे मियाँ पता नहीं क्‍या सोचेंगे, तो मैं बता दूँ कि अख्‍तर मियाँ ‌नोएडा में नौकरी करते हैं और मैं अपने मकान में अकेली रहती हूँ।’’
बाजी यह सब इतने अपनेपन से बता रही थीं कि श्रद्धा को ना-नुकुर करने की कोई गुंजाइश ही नहीं रही और वह मुसकराकर अपना सामान इकट्ठा करने लगी थी।
बाजी का घर यद्यपि घनी आबादीवाले मुहल्‍ले में था, परंतु स्‍वयं में खुला हुआ और हवादार था। बाजी आयशा की अपेक्षा उसका अधिक खयाल रख रही थीं–बाजी ने चाय के साथ खाने के लिए मठरी, दालमोठ और बिस्‍किट भी निकाल दिए थे तथा श्रद्धा को ऐसी मनुहार के साथ खिलाने लगी थीं कि आयशा बोल पड़ी थी, ‘श्रद्धा! यह नहीं चलेगा। मैं इसलिए थोड़े ही तुम्‍हें यहाँ लाई हूँ कि तुम बाजी को अकेले अपना बना लो।’
उत्तर बाजी ने दिया था, ‘आयशा! मुझे तो श्रद्धा इतनी अच्‍छी लग रही है कि लगता है तुम्‍हारे दिन सचमुच लद गए।’
यह सुनकर आयशा ने रूठने का चेहरा बना लिया था और फिर तीनों हँस पड़ी थीं।
तीनों की वह रात्रि बातों-ही-बातों में कट गई थी।
आगे से बाजी प्रायः रविवार के पहले दोनों को अपने घर ले जाने लगी थीं।
‘सुनिए, गर्ल्स होस्‍टल किधर है?’ श्रद्धा और आयशा दोनों को उस दिन प्रैक्‍टिकल क्‍लास में देरी हो गई थी और अँधेरा घिर रहा था। जब वे अपने होस्‍टल को जा रही थीं, तभी रास्‍ते में खड़े दो लड़कों में से एक ने उनसे पूछा था। श्रद्धा ने हाथ उठाकर उस ओर इशारा करते हुए कहा था, ‘उधर’, और आगे बढ़ने लगी थी। तभी उनमें से दूसरा आगे आकर खड़ा हो गया था और धृष्‍टता से बोला था, ‘अरे, ऐसी क्‍या जल्‍दी है?’
यह सुनकर श्रद्धा का चेहरा भय से लाल हो गया था। फिर भी साहस कर उसने कहा था, ‘मेरे सामने से हटिए।’
परंतु उस धृष्‍ट लड़के ने हटने के बजाय उसका हाथ पकड़ लिया था और उसे अपनी ओर खींचते हुए कहने लगा था, ‘जरूर हटूँगा, पर जानम, जरा प्‍यार तो कर लूँ।’
श्रद्धा आतंकित होकर काँपने लगी थी, पर तभी आयशा जोर-जोर से चिल्‍ला उठी थी, ‘बचाओ, बचाओ! गुंडों से बचाओ!’ और द्रौपदी के चीरहरण के समय प्रकट होनेवाले कृष्‍ण की भाँति दाईं ओर से समीर आ गया था और उस लड़के से भिड़ पड़ा था। उसको देखकर उसका साथी पहले ही भाग लिया था और एक-दो मुक्‍के खाकर वह भी अपने को छुड़ाकर भाग लिया था। श्रद्धा की आँखों में आँसू छलछला रहे थे। तभी समीर उसे आश्‍वस्‍त करता हुआ बोला था, ‘श्रद्धाजी!अब इन मोतियों को बेकार न बहाइए। बड़े कीमती हैं।’
तब श्रद्धा ने सहज होकर समीर को थैंक्‍स कहा था और आयशा की ओर देखकर बोली थी, ‘यह आयशा है–मेरी रूममेट।’ और फिर समीर का परिचय आयशा से कराया था। आयशा ने आदाब के अंदाज में अपना हाथ उठाया था और समीर उसी अंदाज में हाथ उठाकर बोला था, ‘चलो, मैं तुम दोनों को होस्‍टल तक पहुँचा देता हूँ।’
तीनों साथ-साथ चल दिए थे। आयशा समीर से बातों में व्‍यस्‍त हो गई थी और श्रद्धा यह सोचने में कि यदि आज समय पर समीर न आ गया होता तो पता नहीं क्‍या होता। होस्‍टल आने पर समीर ने विदा लेते समय श्रद्धा को संबोधित कर मुसकराते हुए कहा, ‘आगे से अँधेरे में न आया-जाया करें, नहीं तो मुझे आपका परमानेंट एस्‍कोर्ट बन जाना पड़ेगा।’
आयशा हास्‍यभाव से बोली थी, ‘गालिब, दिल बहलाने को खयाल अच्‍छा है, पर अगर बुरा न मानें तो मेरी एक राय है–श्रद्धा से जरा दूर ही रहना।’

समीर हँस दिया था और श्रद्धा के कपोलों पर लालिमा झलक आई थी। उस रात अप्रयास ही श्रद्धा के मन में अनेक बार समीर का खयाल आया था।
‘श्रद्धा, तुम यहाँ हो!’ लाइब्रेरी में पढ़ती हुई श्रद्धा को समीर के कंठध्‍वनि को पहिचानने में पल भर का भी बिलंव नहीं हुआ था। अपनी प्रसन्‍नता छिपाने में अवश वह रोमंचित हो उठी थी। समीर उस रोमांच का अर्थ समझते हुए बोला था, ‘‘आज पता नहीं किस फरिश्‍ते का चेहरा देखकर उठा था।’ और फिर शेल्‍फ से एक किताब उठाकर श्रद्धा के बगल में बैठ गया था। श्रद्धा का रोमांच द्विगुणित हो गया था। अब उसका मन किताब में कम और समीर द्वारा बीच-बीच में उसकी ओर कनखियों से देख लेने की ओर अधिक लग रहा था। लगभग घंटे भर की इस प्रकार की पढ़ाई के बाद समीर ने कहा था, ‘मैं जब फर्स्ट इयर में यहाँ आया था, तो मुझे फिजिक्‍स और मैथ्‍स समझने में बड़ी कठिनाई होती थी। अगर तुम्‍हें कोई दिक्‍कत हो तो बेहिचक मुझसे पूछ सकती हो।’
श्रद्धा ने कहा कि उसे तो क्‍लास में इन विषयों में बहुत कम ही समझ में आ रहा है और पता नहीं वह फर्स्ट सेमेस्‍टर में पास भी होगी या नहीं। तब समीर ने दिलासा देते हुए कहा था, ‘श्रद्धा, मैं हर संडे तुम्‍हें पढ़ा दिया करूँगा। यहाँ तो दूसरे लोग डिस्‍टर्ब होंगे, चलो बाहर कहीं एकांत में बैठकर तुम्‍हारी आज की प्रॉब्‍लम्‍स को सॉल्‍व कर दूँ।’
यह कहकर समीर उठ पड़ा और श्रद्धा उसके पीछे-पीछे चल दी थी। समीर युनिवर्सिटी के एक पार्क में श्रद्धा को ले गया और एक कोने में झुरमुटों के बीच रखी बेंच पर बैठ गया था। श्रद्धा कुछ सकुचाते हुए बगल में बैठ गई थी और उसने फिजिक्‍स की कॉपी निकाल ली। समीर ने उसके प्रश्‍नों को न केवल आसानी से हल कर दिया वरन् बड़े सहज ढंग से उनकी पेचीदगियों को भी समझा दिया था। पढ़ाई समाप्‍त होने पर समीर श्रद्धा से उसकी रुचियों के विषय में और फिर उसके माँ-बाप, भाई-बहिन आदि के विषय में अनेक प्रश्‍न पूछता रहा था। श्रद्धा द्वारा यह बताने पर कि उसकी एक उससे छोटी बहिन भी है, समीर शरारत के अंदाज में बोल पड़ा था, ‘क्‍या उसकी भी तुम्‍हारी जैसी बला की खूबसूरत आँखें हैं?’
श्रद्धा कुछ बोली नहीं, बस उसके कपोलों पर एक सलज्‍ज लालिमा बिखर गई थी। यह देखकर समीर का साहस बढ़ गया था और वह श्रद्धा की लंबी, पतली और गोरी उँगलियों की ओर देखते हुए बोल पड़ा था, ‘और श्रद्धा तुमने कभी अपनी उँगलियों को ध्‍यान से देखा है? तुम्‍हें तो शायद ही पता हो कि तुम्‍हारी उँगलियाँ कितनी आर्टि‌स्‍टिक (कलात्‍मक) हैं।’’
श्रद्धा और लज्‍जावनत हो गई, परंतु उसकी झुकी हुई दृष्‍टि से समीर को यह समझने में देरी न लगी थी कि श्रद्धा उसकी प्रशंसा को हृदय से अंगीकृत कर रही है। उसने फिर इस भाँति आगे कहा था जैसे कोई भूली हुई बात याद आ गई हो, ‘हाँ, उँगलियों की बात से याद आ गया कि मुझे हस्‍तलिपि पढ़ने में भी महारत हासिल है।’
श्रद्धा को लगा कि समीर यह बात यूँ ही कह रहा है, परंतु समीर ने गंभीर मुद्रा में अपनी बात स्‍पष्‍ट करते हुए कहा कि उसने भारतीय एवं पाश्‍चात्‍य, दोनों हस्‍तरेखा विज्ञान का गहन अध्‍ययन किया है। श्रद्धा फिर भी उसकी ओर शंकापूर्ण भाव से देखती रही, तब समीर ने श्रद्धा का हाथ बड़ी कोमलता से अपने हाथ में ले लिया और उसकी अरुणाई में खंचित पतली-गहरी रेखाओं को बड़े मनोयोग से देखने लगा। श्रद्धा के लिए यह इतना अप्रत्‍याशित था कि वह किंकर्तव्‍यविमूढ़ हो गई थी और सोच नहीं पा रही थी कि अपना हाथ वापस खींचे या नहीं। यथार्थ तो यह था कि समीर के हाथ में अपना हाथ आते ही उसके शरीर में विद्युतप्रकंप-सा हुआ था, जिससे उसके तन-मन झंकृत हो रहे थे–समीर देर तक हथेली पर निगाह गड़ाए रखने के पश्‍चात् बोला था, ‘‘श्रद्धा, तुम्‍हारी दिल की लाइन से साफ है कि तुम खुले-दिल की सीधी-सच्‍ची इनसान हो।’
फिर समीर ने श्रद्धा की हथेली में अँगूठे के नीचे के उभार को हलके से दबाते हुए कहा, ‘और यह देखो अपना ‘लव-माउंड’ कितना उठा हुआ है। तुम किसी को बहुत प्‍यार करोगी और उससे उतना ही प्‍यार पाओगी। तुम्‍हारे ‘लव-माउंड’ की लाली देखकर तो लगता है कि अभी से तुम्‍हारे सपनों में कोई आने लगा है।’
समीर द्वारा हथेली सहलाए जाने से श्रद्धा को झुरझुरी आ रही थी। वह कुछ बोल न पाई, बस शर्म से लाल होती रही थी। फिर सहसा अपना हाथ खींचकर बोली थी, ‘समीर, अब चलते हैं।’
उस रात समीर श्रद्धा के जाग्रत्, तंद्रित एवं निद्रित स्‍वप्‍नों में इतनी बार आया कि श्रद्धा बहुत कम सो पाई थी।
नवयौवन का प्रथम प्रेम कूलों-कगारों को तोड़नेवाली बरसात में उफनाती पर्वतीय नदी के समान आता है–श्रद्धा के मन में अंकुरित हुआ प्रीतिभाव भी शुक्‍ल-पक्ष के चंद्रमा की भाँति दिन-प्रतिदिन प्रस्‍फुटित होने लगा। फिर शनिवार को आयशा की बाजी आ गईं और आयशा और श्रद्धा को अपने घर ले गईं। चाय-पान के पश्‍चात् बाजी मुसकराकर कहने लगीं, ‘तुम्‍हारे होस्‍टल को आते वक्‍त रास्‍ते में मुझे समीर मिल गया था और मैंने उसे भी आज की शाम हम लोगों के साथ बिताने की दावत दे दी है।’
यह सुनकर श्रद्धा के मन में लड्डू फूटने लगे। तभी दरवाजे की घंटी बजी। बाजी के दरवाजा खोलते ही सुखद मलय के झोंके सा समीर का प्रवेश हुआ था। वह आते ही बोला था, ‘वाह, मुझे नहीं पता था कि आज बाजी से एक पल की मुलाकात मेरी शाम इतनी रंगीन बनाने का बाइस बन जाएगी।’
समीर की बात सुनकर सब हँस दिए थे, परंतु श्रद्धा के चेहरे पर हँसी के अतिरिक्‍त एक सुखद लज्जा का भाव भी आ गया था। फिर उस शाम को समीर ने अपनी वाक् पटुता से सचमुच रंगीन बना दिया था। रा‌त्रिभोज के उपरांत समीर ने विदा ली थी, परंतु जाने से पहले बड़ी बेतकल्‍लुफी से बाजी से वादा लिया था कि आगे छुट्टी के दिन से पहले की शाम इसी भाँति बाजी के घर आकर बिताने के लिए उनकी इजाजत लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उस दिन के पश्‍चात् आयशा अकसर श्रद्धा से समीर की बात छेड़कर हँसी-मसखरी करने लगी थी।
समीर से श्रद्धा की मुलाकातों का यह सिलसिला लगभग निर्बाध चल निकला था। माता-पिता व भाई-बहिन के साहचर्य एवं प्‍यार से च्‍युत होने का श्रद्धा का यह प्रथम अवसर था और उससे उत्‍पन्‍न शून्‍य को समीर ने शीघ्र ही अपने प्‍यार से ऐसी संपूर्णता से भर दिया था कि श्रद्धा वृक्ष से विलग हुए पत्ते की भाँति उड़ने लगी थी–समीर का झोंका उसे जिधर ले जाता, वह उधर ही उड़ जाती। कभी-कभी समीर किसी-न-किसी बहाने उससे बीच में ही मिलने आ जाता। शनैः-शनैः ये मुलाकातें अंतरंग होने लगीं और आयशा से छुपाकर मिलन-कार्यक्रम बनने लगे थे। एक दिन समीर ऐसी ही एकांत मुलाकात के समय हाथ में इमरती का डिब्‍बा लेकर आया और एक इमरती श्रद्धा के मुँह में रखता हुआ मुसकराकर बोला, ‘‘रानी! बूझो तो जानें कि आज क्‍या खुशखबरी लाया हूँ?’
श्रद्धा मुँह में ठुँसी इमरती को खाते हुए बोली, ‘‘मैं क्‍यों बताऊँ? जिसकी गरज होगी, खुद ही बताएगा।’
समीर ने उसके गाल की चिकोटी काटते हुए कहा, ‘हाय, मैं तुम्‍हारी इसी अदा पर ही तो मरता हूँ। कितनी जल्‍दी तेज हो गई हो?’
श्रद्धा व्‍यंग्‍यात्‍मक मुद्रा बनाकर बोली थी, ‘पाला किससे पड़ा है?’
समीर हँसते हुए कहने लगा, ‘अच्‍छा? तब तो मैं बताए ही देता हूँ कि आज मेरा प्‍लेसमेंट रिलाइंस में हो गया है। इम्‍तिहान खत्‍म होते ही ज्‍वॉइन करना होगा और भाई नौकरी करते हुए होटल की रोटी तोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है। सो 13 मार्च को मेरी पढ़ाई खत्‍म और 14 मार्च को होगा एक रानी से मेरा ब्‍याह।’
श्रद्धा समीर को बनाने के अंदाज में बोली, ‘और भई यह रानी है कौन?’
समीर ने साहस कर श्रद्धा के गालों पर चुंबन जड़ दिया और बोला, ‘यह है मेरी रानी।’
श्रद्धा लज्‍जा से आरक्‍त हो गई।
फिर चलते-चलते समीर बोला था, ‘श्रद्धारानी, मेरे माँ-बाप ने मेरे लिए एक अन्‍य लड़की देख रखी है और वे हमारे विवाह के लिए कभी रजामंदी नहीं देंगे, पर अब चाहे दुनिया इधर-से-उधर हो जाए, मैं तुम्‍हीं से शादी करूँगा। मैं जानता हूँ कि शादी हो जाने के बाद वे तुम्‍हें अपनी बहू जरूर मान लेंगे।’ फिर कुछ रुककर समीर आगे मुसकराते हुए बोला, ‘इसमें उनका किसी पर कोई अहसान भी नहीं होगा, क्‍योंकि किसी भी सास-ससुर को तुम जैसी बहू पाकर अपने को धन्‍य समझना चाहिए।’
श्रद्धा अपने प्रति समीर के इस श्‍लाघाभाव से प्रसन्‍न हो गई, परंतु बनते हुए बोली थी, ‘अच्‍छा, तो अब आपने मस्‍का मारना भी सीख लिया है!’
समीर मुसकराकर बोला, ‘रानी, तुम्‍हें पाने के लिए तो मैं मस्‍का-शिरोमणि बनने के लिए भी तैयार हूँ।’
फिर गंभीर मुख बनाकर कहने लगा, ‘मैं आज ही अपने माँ-बाप से बात करूँगा और तुम भी अपने घरवालों से बात कर लेना, लेकिन मैं वादा करता हूँ कि मेरे और तुम्‍हारे माँ-बाप राजी नहीं हुए, तो मैं चुपचाप तुम्‍हें भगा ले जाऊँगा और रजिस्‍टर्ड मैरिज कर लूँगा।’
श्रद्धा को अपने माँ-बाप की उसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई समाप्‍त करने के पूर्व उसकी शादी हेतु राजी होने की कोई आशा नहीं थी।
अगली मुलाकात में समीर ने श्रद्धा से पूछा था, ‘तुमने अपने घरवालों से बात की?’
श्रद्धा ने उत्तर दिया कि वह बड़ी ऊहापोह में रही और उनसे बात करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाई।
समीर ने ढाढ़स बँधाते हुए उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘रानी, सच बताऊँ? मैं भी अपने घर में बात चला पाने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया हूँ और मैंने तो सोच लिया है कि अब रजिस्‍टर्ड मैरिज ही करनी है। तुम राजी हो तो कल अपने कुछ खास साथियों के साथ तुम्‍हें लेकर रजिस्‍ट्रार ऑफिस चलूँ और मैरिज की अरजी लगा दूँ।’’
फिर कुछ रुककर श्रद्धा की आँखों में झाँकता हुआ बोला, ‘बताओ, है अपने प्‍यार पर इतना भरोसा?’
श्रद्धा को समीर पर शत-प्रतिशत भरोसा न हो, ऐसा वह सोच भी नहीं सकती थी। वह समस्‍त द्विविधाओं को बलात् मन से निकालकर बोली, ‘समीर, यह तो विवाह की बात है, तुम प्राण माँगो, तो वह भी बिना आह भरे दे दूँ।’
दूसरे दिन मैरिज-रजिस्‍ट्रार ऑफिस में समीर का एक मित्र मैरिज का फॉर्म भरकर पहले से इनकी प्रतीक्षा कर रहा था। श्रद्धा को देखते ही ‘बधाई हो, भाभीजी’ कहकर उसने फॉर्म श्रद्धा के सामने रख दिया और बोला, ‘यहाँ दस्‍तखत कर दें।’
श्रद्धा भावावेग से ग्रस्‍त थी–उसने बताए स्‍थान पर काँपते हाथों से हस्‍ताक्षर करने के उपरांत फार्म को समीर की ओर बढ़ा दिया और समीर ने उसका हाथ हलके से दबाते हुए फार्म लेकर उस पर अपने हस्‍ताक्षर कर ‌दिए। एक महीने के उपरांत समीर की परीक्षा पूर्ण हो गई और उसे मैरिज सर्टिफिकेट भी मिल गया था। वह नवेली दुलहन को लेकर अपने नियुक्‍ति के नगर दिल्‍ली चला आया।

समीर ने दिल्‍ली में एक मकान पहले से ले रखा था। मकान छोटा था परंतु एकांत में था और सुंदर था। मकान में घुसते हुए श्रद्धा के मन में एक बार यह बात अवश्‍य आई कि यदि उसने सबकी इच्‍छा से पारंपरिक ढंग से विवाह किया होता तो प्रथम बार बहू के गृह-प्रवेश के अवसर पर उसकी आरती उतारी जाती, परंतु समीर ने उसे कुछ सोचने का अवसर देने से पहले ही बाँहों में भर लिया और चुंबनों से उसके होंठ सिल दिए। श्रद्धा समीरमय होकर सातवें आसमान पर थी। दूसरे दिन से समीर अपने ऑफिस के कार्य में व्‍यस्‍त हो गया था और श्रद्धा घर सजाने में, दिन में दोनों व्‍यस्‍त रहते और रात में दोनों मस्‍त।
सात दिन बाद फोन की घंटी बजने पर श्रद्धा ने फोन उठाया तो उधर से किसी महिला की आवाज आई, ‘शमी खान हैं?’
श्रद्धा ने उत्तर दिया, ‘यहाँ कोई शमी खान नहीं रहते हैं। आप गलत नंबर मिला रही हैं।’
उसे सुनकर उधर से तल्‍ख आवाज आई, ‘श्रद्धाजी! मैं सही नंबर मिला रही हूँ। और शमी खान यानी आपके समीर से ही बात करना चाहती हूँ।’
‘मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आप क्‍या कह रही हैं?’
‘श्रद्धा, मैं रोशन खान हूँ–समीर की तीसरी पत्‍नी। विवाह से पहले मैं भी तुम्‍हारी तरह हिंदू थी–पूजा बत्रा।’ उधर से शांत परंतु रुआँसी आवाज आ रही थी।
उस आवाज के एक-एक शब्‍द की सच्‍चाई जैसे-जैसे श्रद्धा के अंतस्‍तल में घर करने लगी थी, वह अतल पाताल लोक में गिरने लगी थी। वह अवसाद की अर्धचेतनावस्‍था में दीवाल के सहारे फर्श पर बैठ गई थी। श्रद्धा की चेतना तब लौटी जब समीर काफी देर तक दरवाजे की घंटी बजाता रहा था। बड़ी कठिनाई से उसने अपने आप को उठाया और मन-मन भर के पैरों को घसीटते हुए दरवाजा खोल दिया। समीर अकेला नहीं था–उसके साथ एक मौलवी साहब और गोल टोपी और चूड़ीदार पजामा-कुरता पहने हुए कुछ अन्‍य व्‍यक्‍ति भी थे। अंदर आते ही समीर बोला था, ‘जानम, जल्‍दी से तैयार हो जाओ। आज हम लोगों का बाकायदा निकाह होगा।’
समीर ने यह बात ऐसे कही थी जैसे कुछ अघट घटा ही न हो और श्रद्धा के स्‍तब्‍ध होकर खड़े रहने पर उसका हाथ पकड़कर उसे लगभग घसीटता हुआ कमरे के अंदर ले गया था और खुद ही अपने साथ लाया हुआ सलवार-कुरता पहनाने लगा था। श्रद्धा उसी अर्धचेतना अवस्‍था में कठपुतली सम वह सब करती रही, जो समीर उससे करवाता रहा था। फिर उस रात श्रद्धा को अपनी समस्‍त अश्रद्धा, क्षोभ एवं अवसाद के बावजूद नासिरा खान बना दिया गया था। दूसरी प्रातः श्रद्धा जब कुछ सामान्‍य हुई और उसको अपनी परिस्‍थिति का कुछ-कुछ भान हुआ तब वह क्रोधवश सोते हुए समीर उर्फ शमी खान पर झपट पड़ी थी और शमी खान ने उठकर न केवल उसकी जमकर पिटाई की थी वरन् उसे, उसके परिवारवालों एवं उसके धर्म को हर तरह के अपशब्‍द भी कहे थे। श्रद्धा पुनः निढ़ाल होकर पड़ रही थी। शमी खान घर से जाते समय बाहर ताला लगा गया था।
सायंकाल शमी खान के साथ बकरे जैसी दाढ़ी रखाए हुए सफेद रंग की गोल टोपी पहने एक मौलवी साहब भी आए थे। उस समय श्रद्धा सोफे पर बैठकर अपनी शेर के पंजे में फँसे हिरण जैसी दशा पर आँसू बहा रही थी। मौलवी साहब ने आते ही प्‍यार जताते हुए श्रद्धा को पुकारकर कहा था, ‘नासिरा बेटी! अस्‍सलामवालेकुम। मुझे पता चला है कि शमी ने आज सुबह तुम्‍हारे साथ गुस्‍ताखी की है, जिसका मुझे दिली अफसोस है। इसके लिए मैंने उसे खूब डाँटा है।’
यह कहते हुए मौलवी साहब पास के सोफे पर बैठकर अपनत्‍व दिखाते हुए आगे बोले थे, ‘बेटी! अल्‍लाह बड़ा रहमदिल है। उस पर ईमान रखो और एक नेक बीवी के फर्ज निभाओ, परवरदिगार सब मुश्‍किलें हल कर देगा।’
श्रद्धा सुबह से भरी बैठी थी, अतः क्रोध में फूट पड़ी, ‘क्‍या आपका परवरदिगार हम जैसों को धोखा देने और जबरदस्‍ती मुसलमान बनाने को हम पर मेहरबानी करना समझता है?’
मौलवी साहब का चेहरा क्रोध से तमतमा गया, पर अपने को जब्‍त करते हुए बोले, ‘बेटी, खुदा अपनी दुनिया में हर बच्‍चा उस पर ईमान रखनेवाला यानी मुसलमान पैदा करता है। यह तो उसकी बदकिस्‍मती होती है कि हिंदू माँ-बाप उसे अ‌नगिनत देवी-देवताओं की बुतपरस्‍ती सिखाकर काफिर बना देते हैं। उसको फिर मोमिन बना देना तो बड़े सबाब का काम है। फिर तुम तो बड़ी खुशकिस्‍मत हो कि तुम्‍हें ‘रोमियो-जिहाद’ से मुस‌लिम बनाया गया है, तलवार के जोर से नहीं।’
‘कठमुल्‍ले...’ श्रद्धा अपना आपा खोकर मौलवी साहब पर चिल्‍ला पड़ी, परंतु पहला शब्‍द उसके मुँह से निकलते ही शमी का एक जोरदार झापड़ उसके गाल पर पड़ा और फिर तब तक उस पर लात-घूँसे पड़ते रहे, जब तक वह बेहोश नहीं हो गई। उस दिन के पश्‍चात् श्रद्धा के साथ ऐसा व्‍यवहार उसकी दिनचर्या का अंग बन गया। और हर दुर्व्यवहार के साथ श्रद्धा के मन में निराशा का भाव और दृढ़ होता गया। घर में आनेवाला कोई व्‍यक्‍ति ऐसा नहीं होता था, जिससे श्रद्धा अपनी बात कह सकती, वरन् शमी के सभी साथी उसके द्वारा मन से ईमान अंगीकार न करने पर उसकी लानत-मलामत ही करते रहते थे।
अन्‍य कोई उपाय न देखकर श्रद्धा ने अपने जीवन की दुख भरी कहानी को रोते-सिसकते हुए कमरे में पड़े कागज के पन्‍नों पर लिखकर खिड़की के पीछे फेंक दिया था।

पत्र पढ़कर मैं वहाँ से अपने प्रेस के कार्यालय न जाकर सीधे चाँदनी चौक थाना चला गया था। थाना-प्रभारी भलेमानस थे और उन्‍होंने उसी पत्र के आधार पर रिपोर्ट लिख ली थी तथा मेरे साथ उस स्‍थान के लिए चल दिए थे, जहाँ पर यह पत्र मुझे मिला था। पत्र में लिखे अनुसार उस मकान में अभी भी बाहर से ताला लगा हुआ था। स्‍थानीय लोगों को बुलाकर उन्‍होंने मकान का ताला तुड़वाया था और श्रद्धा को फंदे से लटके हुए पाया था। सौभाग्‍यवश उसकी साँसें तब तक पूर्णतः बंद नहीं हुई थीं और उसे लेकर वह अस्‍पताल चले गए थे।
मेरा मन श्रद्धा की दुर्दशा देखकर जितना आहत हुआ था, उतना ही मानव की मजहब के विषय में निकृष्‍ट सोच पर भी हुआ था और मैं आज ही अपने समाचार-पत्र में यह ‘स्‍टोरी’ प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे सीधी-सादी नवयुवतियाँ इस धार्मिक छल-छद्म से अपने को बचा सकें।