संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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भक्तिकाल में प्रेम और शृंगार वर्णन : एक झलक
गुलशन मधुर
वर्जीनिया
भक्तिकाल की बात चलने पर उसके ऐतिहासिक पक्ष की चर्चा में यह बात अक्सर ध्यान से उतर सी जाती है कि यह काल हिंदी काव्य में प्रेमवर्णन के अपूर्व उत्कर्ष का युग था। प्रेम और शृंगार का उल्लेख आते ही हम इस युग के बाद के समय की, रीतिकाल की बात सोचने लगते हैं, जब ब्रजभाषा ने शृंगार के वर्णन में और शैली की दृष्टि से निस्संदेह अभूतपूर्व ऊँचाइयों को स्पर्श किया। लेकिन कलापक्ष के प्रति विद्यमान सम्मोहन के कारण उस युग के काव्य में सायासता का एक तत्त्व जुड़ गया, जो प्रेम के सहज और उन्मुक्त चित्रण में बाधक बना। यदि कथ्य और कलाविधान, दोनों को मिलाकर काव्य के सर्वांगीण सौंदर्य की दृष्टि से विचार करें, और प्रेम की परिभाषा को ऐहिक सीमाओं से मुक्त करके देखें, व्यक्ति और व्यक्ति के बीच के परंपरागत प्रेम को इस भावना की परकाष्ठा न मान लें, तो तुलसी और कबीर, सूर और जायसी, मीरा और नंददास द्वारा भक्तिजनित प्रेम का चित्रण अनूठे क्षितिजों को छूता दिखाई देता है। इस प्रेम में प्रिय को पा लेने की इच्छा भी है और समर्पण की सुखानुभूति भी, मिलन की आतुरता भी है और विरह की वेदना भी। यहाँ तक कि प्रत्यक्षतः नितांत ऐंद्रिक जान पड़नेवाले शृंगार की मनमोहक छवियाँ भी।
दिलचस्प बात यह है कि इस प्रेमवर्णन की उत्कटता सगुण और निर्गुण के वर्गीकरण में बँधने से इनकार करती जान पड़ती है, ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी या रामभक्ति और कृष्णभक्ति जैसी ऐतिहासिक विभक्तियों को तोड़ती दिखाई देती है। निराकार के किसी उपासक का अपने प्रिय से मिलन की सेज सजाना कितना कल्पनातीत लगता है। यह बात और है कि यह सेज एक अनहोने स्थल पर यानी प्रेमी की मुँदी हुई आँखों में बसती है—
नैनन की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय
पलकों की चिक डारि के, पिय को लिया रिझाय
दो पंक्तियों के इस नन्हे से छंद में शृंगार की पराकाष्ठा को छूनेवाला कवि और कोई नहीं, निराकार ब्रह्म की उपासना करनेवाले मस्तमौला और फक्कड़ कबीर हैं। आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने 'हिंदी साहित्य की भूमिका' में कबीर के प्रेम की बड़ी सार्थक व्याख्या की है—
"उनके प्रेम और भक्ति में वह गलदश्रु भावुकता नहीं थी जो ज़रा-सी आँच से ही पिघल जाए। यह प्रेम ज्ञान द्वारा, नीति और श्रद्धा द्वारा अनुगमित था। वियोग की बात भी उसी मौज से कह सकते थे जिस तरह संयोग की। उनका मन प्रेमरूपी मदिरा से मतवाला था, वह ज्ञान के महुवे और गुण से बनी थी, इसीलिए अंधश्रद्धा, भावुकता और हिस्टीरिक प्रेमोन्माद का उसमें एकांत अभाव था।"
मात्र एक दोहे में संयोग शृंगार के सर्वोत्तम उदाहरणों में से इस एक को समेटनेवाले, राम-नाम का मर्म पहचाननेवाले, अपने असीम आराध्य के विरह में व्याकुल कबीर के वियोग-शृंगार में भी वैसी ही उत्कटता है, जैसी प्रगाढ़ता उनके संयोग-वर्णन में है। द्विवेदी जी के शब्दों में—"नौ खुले दरवाज़ों के घर के अंदर बंद दुलहिन के वियोग की तड़प एक रहस्यमय प्रेम-लीला की ओर संकेत करती है जहाँ सीमा असीम से मिलने को व्याकुल है और असीम सीमा को पाने के लिए चंचल।"
विछोह की ऐसी दुर्दम यातना, ऐसी आकुल तड़प—
अंखड़ियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि
जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि
जब प्रेमातिरेक में, ज्ञानाश्रयी शाखा में गिने जानेवाले, तीखे शब्दों से परहेज़ न करनेवाले सामाजिक क्रांतिकारी कबीर की विभोरता और विरहवेदना का यह हाल है, तो प्रेम को मोक्ष का मार्ग माननेवाले मलिक मुहम्मद जायसी कैसे पीछे रह जाते। इस विवाद को विद्वानों के लिए छोड़ देना उपयुक्त होगा कि जायसी और उनकी परंपरा के कवियों की निर्गुण साधना कितनी सूफ़ीवाद से प्रेरित थी और कितनी वेदांत के अद्वैत दर्शन से। यहाँ प्रासंगिक वह है, जो जायसी और उनकी परंपरा के कवियों ने अपने प्रेमाख्यानक काव्य में इश्क़े-मजाज़ी यानी लौकिक प्रेम के माध्यम से चित्रित किया है। मनुष्य और मनुष्य के बीच रागात्मक संबंध की ये कहानियाँ इश्क़े-हक़ीक़ी यानी मनुष्य और ईश्वर के बीच के अलौकिक, आध्यात्मिक प्रेम की प्रतीक हैं।
संयोग और विप्रलंभ, दोनों प्रकार के शृंगार में इस धारा के कवि, प्रेम को उसकी पूरी उत्कटता में प्रस्तुत करते हैं. प्रेममिलन का जायसी का वर्णन खुली रत्यात्मकता की ऐसी सीमाओं को छूता दिखाई देता है, जिसके उदाहरण हिंदी साहित्य में कम ही मिलेंगे। जब उनके अमर काव्य पद्मावत के नायक रत्नसेन और नायिका पद्मावती का मिलन होता है, तो उनकी प्रेमशैया का शायद ही कुछ वर्णन कल्पना के लिए बच रहता है—
भएउ जूझ जस रावन रामा । सेज बिधाँसि बिरह-संग्रामा॥
लीन्हि लंक, कंचन-गढ टूटा। कीन्ह सिंगार अहा सब लूटा॥
औ जोबन मैमंत विधाँसा। विचला बिरह जीउ जो नासा॥
टूटे अंग अंग सब भेसा। छूटी माँग, भंग भए केसा॥
कंचुकि चूर, चूर भइ तानी । टूटे हार, मोति छहरानी॥
बारी, टाँण सलोनी टूटी । बाहूँ कँगन कलाई फूटी॥
चंदन अंग छूट अस भेंटी । बेसरि टूटि, तिलक गा मेटी॥
और जब जायसी पद्मावती के विछोह को चित्रित करते हैं, तो नायिका की मर्मांतक विरहवेदना की वह तीव्रता पाठक के अंतरतम में उतर जाती है, जिसमें तड़पती उसे एक-एक पल एक-एक युग जैसा लगता है—
दहै चंद औ चंदन चीरू । दगध करै तन बिरह गँभीरू॥
कलप समान रेनि तेहि बाढी। तिलतिल भर जुग जुग जिमि गाढी॥
स्वनामधन्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल जायसी, मृगावती के रचयिता कुतुबन और मधुमालती के कवि मंझन जैसे प्रेममार्गियों को केवल अलौकिक प्रेम की अनूठी व्यंजना करने का ही नहीं, सामाजिक सद्भाव के संदेशवाहक होने का भी श्रेय देते हैं, "कुतुबन, जायसी आदि इन प्रेम-कहानी के कवियों ने प्रेम का शुद्ध मार्ग दिखाते हुए उन सामान्य जीवन-दशाओं को सामने रखा जिनका मनुष्यमात्र के हृदय पर एक-सा प्रभाव दिखाई पड़ता है। हिंदू और मुसलमान-हृदय को आमने-सामने करके अजनबीपन मिटानेवालों में इन्हीं का नाम लेना पड़ेगा।"
अजनबीपन की यह विभाजक रेखा भक्ति के उत्कर्ष के काल में किस सीमा तक लुप्त हो चुकी थी, इसके उत्कृष्ट उदाहरण किसी विशिष्ट परंपरागत भक्ति संप्रदाय से अनजुड़े कवि रसखान हैं. जिनके बिना कृष्णभक्ति शाखा का इतिहास अपूर्ण रह जाएगा। जिनके काव्य में कृष्णप्रेम अनुपमेय समर्पणभाव के साथ उमड़ता है। जो अपने आराध्य की एक छवि के लिए तन-मन-धन निछावर करने को तत्पर हैं—
या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं
आठहूँ सिद्धि नवों निधि को सुख नंद की धेनु चराइ बिसारौं
आँखिन सों रसखान कबै ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करीर के कुंजन ऊपर वारौं
यह अनहोनी बात होगी कि कृष्णभक्तों की चर्चा हो और शीर्षस्थ नामों में प्रेम-दीवानी मीरा का उल्लेख न हो। 'साँवरे के रंग रांची' इस सहज कवयित्री के भावभीने पदों के उन्मत्त सौंदर्य को डॉक्टर विजयेंद्र स्नातक की ये पंक्तियाँ नितांत सार्थक रूप से व्याख्यायित करती हैं, "मीराबाई का काव्य उनके हृदय से निकले सहज प्रेमोच्छ्वास का साकार रूप है। उनकी वृत्ति एकांततः प्रेम-माधुरी में ही रमी है। अपने आराध्य गिरिधर गोपाल की विलक्षण रूप-छटा के प्रति उनकी अनन्य आसक्ति अनेकत्र शब्द-धारा बनकर फूट पड़ी है। कृष्ण-प्रेम में मतवाली मीरा ने मन-ही-मन उनके मधुर मिलन के स्वप्न सँजोकर अनेकविध व्यंजना की है, किंतु उनकी कविता का प्रमुख रस विप्रलंभ शृंगार है।"
विप्रलंभ की व्यथा मीरा को 'पी, पी' पुकारते पपीहे से भी उलहने भरी ऐसी रार करने पर विवश कर देती है—
चोंच कटाऊँ पपइया रे, ऊपर कालोर लूण
पिव मेरा मैं पीव की रे, तू पिव कहै स कूण
थारा सबद सुहावणा रे, जो पिव मेंला आज
चोंच मंढ़ाऊँ थारी सोवनी रे, तू मेरे सिरताज
लेकिन अभी हमने कृष्णभक्ति के सिरमौर उस कवि की चर्चा नहीं की है, जो वात्सल्य के अनूठे चितेरे के रूप में तो जाने जाते हैं, लेकिन शृंगार के दोनों पक्षों को चित्रित करने में भी अपने उदाहरण स्वयं है। आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी उनके प्रेम के 'साफ़ और मार्जित रूप' के चित्रण को न केवल भारतीय साहित्य में अद्वितीय मानते हैं, बल्कि उनके राधा और कृष्ण के प्रेमवर्णन में भी बालसुलभ सहजता की वही छवि देखते हैं जो उनके वात्सल्य-चित्रण में दिखाई देती है, "सूरदास का प्रेम संयोग के समय सोलह आना संयोगमय है और वियोग के समय सोलह आना वियोगमय है; क्योंकि उनका हृदय बालक का था जो अपने प्रिय के क्षणिक वियोग में भी अधीर हो जाता है और क्षणिक सम्मिलन में ही सब-कुछ भूलकर किलकारियाँ मारने लगता है।"
सूर का प्रेमवर्णन पूरी तरह भक्तिप्रधान है। उसमें शृंगारिकता तो है, किंतु सहज और निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में; जहाँ शृंगार का ऐंद्रिक पक्ष हृदय की पवित्रता के आगे गौण है। इस बेलाग प्रेम की सहज और सुंदर अभिव्यंजना 'भ्रमरगीत' में होती है. योगसाधक उद्धव का कृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों के गले ज्ञान का पाठ उतारने का सारा प्रयास किस तरह धरा-का-धरा रह जाता है, उसके चित्रण में सूरदास शब्दचातुरी का प्रयोग नहीं करते। सच तो यह है कि यह सहजता उनके सारे काव्य का लक्षण है। गोपियों के मुख से निकली बातें सीधे उनके हृदय से जिह्वा पर आती महसूस होती हैं—
उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥

सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकि रही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुंदर के, सकल जोग के ईस।
'सूरदास' रसिकन की बतियाँ पुरवौ मन जगदीस॥
यदि भक्ति-पगे सूर कवि के रूप में उन्मुक्त कृष्णप्रेम के अवतार हैं, तो अपने आराध्य को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठापित करनेवाले, राम में रमे तुलसी प्रेम की संयत और मर्यादित छवि के रचनाकार हैं। आराध्य के मधुर रूप के प्रति लोकनायक तुलसी का रुझान कम था। रामचरितमानस के रचयिता की प्रवृत्ति आस्थाहीन होते जा रहे समाज को उत्थान की ओर प्रेरित करने की अधिक थी। फिर भी तुलसी जब-जब अपने गहरे आत्मनियंत्रण को कुछ समय के लिए विश्राम देते हैं, तो मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए भी वे एक अद्भुत भावनात्मक विश्व की सृष्टि करते हैं। मानस में जनक वाटिका में राम और सीता के एक-दूसरे के पहले प्रत्यक्ष दर्शन के पल-छिन हिंदी साहित्य के अविस्मरणीय क्षण बन गए हैं—
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
उपरोक्त कुछ उदाहरण तो केवल एक संकेत भर हैं। वह परंपरा को चुनौती देनेवाले कबीर और दादू दयाल जैसे मस्तमौला हों या लौकिक के रास्ते अलौकिक की खोज के पक्षधर जायसी, कुतुबन और मंझन जैसे सूफ़ी मतवादी; सूर और नंददास जैसे अष्टछाप के कृष्णभक्त कवियों की माधुर्य से रची-बसी ब्रज पदावली हो, या फिर लोकमानस के पोर-पोर में घर कर गई तुलसी की अवधी चौपाइयाँ, पूर्व मध्यकाल कहलाने वाले इस युग के सगुण के आराधकों और निराकार के उपासकों द्वारा रचा गया समृद्ध काव्य, प्रेम और शृंगार की एक-से-एक अनन्य छवियों से सराबोर है। अनिर्वचनीय आनंद का अनूठा स्रोत, गूँगे के गुड़ की तरह।