संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित अंतर्राष्टीय हिन्दी समिति की त्रैमासिक मुख पत्रिका | वर्ष: 26 | अंक: 2 | अप्रैल-जून 2010
 
अप्रैल - जून, 2010
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श्रद्धांजलि
श्री ओमप्रकाश आदित्य : विगत वर्ष 8 जून, 2009 को एक सड़क दुर्घटना में जाने-माने हास्य कवि ओमप्रकाश आदित्य का निधन हो गया। 5 नवंबर, 1936 को गुड़गाँव (हरियाणा) में जनमे श्री आदित्य ने अनेक हास्य कृतियाँ दीं। हास्य सम्राट्, काका हाथरसी हास्य पुरस्कार सहित उन्हें दर्जनों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि-स्वरूप प्रस्तुत है उनकी यह कविता–

इतिहास का परचा

इतिहास-परीक्षा थी उस दिन
चिंता से हृदय धड़कता था
थे बुरे शकुन घर से चलते ही
दायाँ हाथ फड़कता था।

मैंने सवाल जो याद किए
वे केवल आधे याद हुए
उनमें से भी कुछ स्कूल तलक
आते-आते बरबाद हुए।

तुम बीस मिनट हो लेट
द्वार पर चपरासी ने बतलाया
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता
कमरे के भीतर आया।

परचा हाथों में पकड़ लिया
आँखें मूँदी टुक झूम गया
पढ़ते ही छाया अंधकार
चक्कर आया सिर घूम गया।

उसमें आए थे सवाल
जिनमें मैं गोल रहा करता
पूछे थे वे ही पाठ
जिन्हें पढ़ डाँवाँडोल रहा करता।

यह सौ नंबर का परचा है
मुझको दो की भी आस नहीं
चाहे सारी दुनिया पलटे पर
मैं हो सकता पास नहीं।

ओ प्रश्न-पत्र लिखनेवाले!
क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम
तू लिख दे जो तेरी मरजी
ये परचा है या एटम बम।

तूने पूछे वे ही सवाल
जो-जो थे मैंने रटे नहीं
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे
वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं।

फिर आँख मूँदकर बैठ गया
बोला–भगवान्! दया कर दे
मेरे दिमाग में इन प्रश्नों के
उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे।

मेरा भविष्य है खतरे में
मैं भूल रहा हूँ आँय-बाँय
तुम करते हो भगवान् सदा
संकट में भक्तों की सहाय।

जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया
तुमने ही उसे बचाया था
जब द्रुपद सुता की लाज लुटी
तुमने ही चीर बढ़ाया था
द्रौपदी समझ करके मुझको
मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम
मैं विष खाकर मर जाऊँगा
वरना जल्दी आ जाओ तुम।

आकाश चीरकर अंबर से
आई गहरी आवाज एक
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है
तू आँख खोलकर इधर देख।



17 जून, 2009 को हिंदी जगत् के प्रख्यात हास्य कवि श्री श्याम लाल शर्मा उर्फ अल्हड़ बीकानेरी का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। श्री बीकानेरी का जन्म 17 मई, 1937 को हरियाणा के रेवाड़ी जिला के बीकानेर गाँव में हुआ। अनेक हास्य कृतियों के लेखक-कवि बीकानेरी को अनेक पुरस्कार एवं सम्मानों से अलंकृत किया गया। दिवंगत आत्मा को भाव-भीनी श्रद्धांजलि-स्वरूप प्रस्तुत है यह कविता–

चुनाव चक्रम्

वोट माँगन निकले नेताजी।
दोउ कर जोरे, खीस निपोरे
हर वोटर पर डालें डोरे
चपरासी को बोलें चाचा
पुलिसमैन को कहें पिताजी
वोट माँगन निकले नेता जी।
चाल रेशमी, ढाल रेशमी
काँधे ऊपर शॉल रेशमी

सिर पर खादी-कैप ओढ़कर
लगें लोमड़ी के फूफाजी
वोट माँगन निकले नेताजी।
आगे झंडे, पीछे डंडे
दाएँ-बाएँ दस मुसटंडे
आरती-वंदन करे चमचियाँ
थैली भेंट करें चमचाजी